
Sign up to save your podcasts
Or


श्री कृष्ण: ब्रह्मज्ञानी
संपूर्ण गीता का हर एक श्लोक मंत्र स्वरूप है अब मंत्र है तो
जपना शुरू नहीं करना है , हां पहले समझेंगे फिर जीवन
मे उतारेंगे और फिर ऐसे उतारेंगे की वह वाकई में मंत्र बन
जाए, जिंदगी के बंद दरवाजों की चाबी बन जाए।
गीता में भगवान कृष्ण ने कर्म उपासना और ज्ञान को मोक्ष
का कारण बताया है इन तीनों में से किसी एक के बिना भी काम नहीं
चलता। तीनों में से यदि एक भी नहीं है तो दो का
होना अपूर्ण हो जाता है । बात करते हैं मोक्ष की
"मोक्ष" कोई अलग ग्रह या स्थान नहीं है या नर्क, स्वर्ग से ऊपर कुछ
है, हां स्वयं जन्म, कर्म, वाणी, आदि के दोष जो हमारे मन
मस्तिष्क में पलते हैं, हमारे विचारों में ईर्ष्या, द्वेष, कलह
क्लेश, आदि का कारण बनते हैं उन से ऊपर उठना है
इनसे ऊपर उठते ही मन से, आत्मा से आनंद की अनुभूति
होती है यह अनुभूति ही मोक्ष है। मैं फिर से एक बार दोहराती हुँ
कर्म उपासना और ज्ञान तीनों को साधना है तीनों को ही
साधना है ।
रुचि"हर्ष"
जिस समय अर्जुन जैसा धनुर्धर, योद्धा, शूरवीर व्याकुल हुआ एवं क्षत्रियों के कर्म को भुलकर धनुष हाथों से फिसलने लगा और रणभूमि से भागने की सोचने लगा। सोचने की बात है उस वातावरण में "श्री कृष्ण" ने अर्जुन के अति अशांत मन को स्थिर किया, तो यदि शांत और स्थिर मन से गीता के ज्ञान को समझा जाए तो समझ का दायर स्वत: ही बढ़ जाएगा और दृष्टिकोण से परे देखने और समझने की क्षमता भी बढ़ जाएगी । जैसे कि यदि मैं कहूं "अर्जुन" तो क्या वह सिर्फ महाभारत का पात्र है या फिर पांडवों मे तीसरे भाई हैं या फिर कह सकते हैं, कि अर्जुन बलशाली है परंतु भावुक है गुणी भी है और व्यवहारिक भी है, और परम भक्त हैं क्योंकि उन्होंने भगवान की वाणी को चरितार्थ किया नहीं तो भगवान के शब्द भी व्यर्थ हो जाते।
यदि कहे कृष्णा तो क्या वह सिर्फ विष्णु के अवतार हैं इनका नाम जपने से ही कष्ट दूर हो जाएंगे हां हो सकती हैं बिल्कुल सभी के कष्ट दूर हो सकते हैं परंतु चरित्र की परिपूर्णता को समझना बहुत आवश्यक है और ऐसे परिपूर्ण चरित्र, परमात्मा, परमज्ञानी जब भी कोई शरीर धारण करके धरती पर अवतरित होती है तो एक दिव्य रोशनी सरीखे ज्ञान को पीछे छोड़ जाते हैं हमें तो सिर्फ उस पथ पर चलना है शांति और प्रेम खुद-ब-खुद साथ हो जाएगा।
ऐसी परमआनंद, परमात्मा, परमेश्वर कृष्ण को नमन।
रुचि"हर्ष"
From the publisher's feed