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UrduShahkar episodes

  • Khamoshi m’eN zabaaN hoti hai-baam dev sharma rishi paTialavi

    https://urdushahkar.org/wp-content/uploads/2026/09/bdshrp-Khamoshi-meN-zabaaN-hoti-hai-audio.mp3

    Recitation

    • اُردو
    • تشریح
    • देवनागरी
    • व्याख्या
    • Roman
    • Explanation
    • خموشی  میں  زباں  ہوتی  ہے  ۔  بام  دیو  شرما  رشیؔ  پٹیالوی

      ۱

      دل  کی  رُوداد  نگاہوں  سے  بیاں  ہوتی  ہے

      درد  مندوں  کی  خموشی  میں  زباں  ہوتی  ہے

      ۲

      خود  فراموش  نہ  جب  تک  ہو  کوئی  کیا  سمجھے

      بے  نِشانی  بھی  محبت  میں  نِشاں  ہوتی  ہے

      ۳

      نقشِ  امید  ہیں  بن  بن  کے  بگڑتے  کیا  کیا

      زندگی  رقص  گہہِ  ریگِ  رواں  ہوتی  ہے

      ۴

      جو  ترے  حُسنِ  نظر  گیر  سے  شاداب  نہیں

      اُن  بہاروں  کے  مقدر  میں  خزاں  ہوتی  ہے

      ۵

      وہ  بُرا  وقت  محبت  میں  نہ  دیکھے  کوئی

      جب  محبت  بھی  طبیعت  پہ  گراں  ہوتی  ہے

      ۶

      یوں  بھی  ہوتی  ہے  ترے  غم  کی  نوازِش  اکثر

      لب  پہ  ہوتی  ہے  ہنسی  دل  میں  فغاں  ہوتی  ہے

      ۷

      جاں  نثاری  سے  ہے  توقیرِ  محبت  لیکن

      دیکھنا  یہ  ہے  کہ  تکمیل  کہاں  ہوتی  ہے

      ۸

      ہم  وہاں  ہو  کے  بھی  موجود  کہاں  ہوتے  ہیں

      ہم  نشینوں  میں  تری  بات  جہاں  ہوتی  ہے

      ۹

      چونک  اٹھتا  ہے  غمِ  ہِجر  کا  احساس  رشیؔ

      اُن  کے  آنے  پہ  بھی  تسکین  کہاں  ہوتی  ہے

       

      بام دیو شرما رشیؔ پٹیالوی (۱۹۱۷۔۱۹۹۹) پنجاب کے ضلع ہوشیار پور میں پیدا ہوئے تھے۔ وہ نسیمؔ نور محلی کے شاگرد تھے، اور ان کا ادبی سلسلہ پنڈت لبھو رام جوشؔ ملسیانی سے ہوتا ہوا براہِ راست داغؔ دہلوی تک جاتا ہے۔ انہوں نے کئی سالوں تک اسٹیٹ بینک آف پٹیالہ میں ملازمت کی، جس کے بعد وہ چنڈی گڑھ چلے گئے اور وہاں مینجمنٹ کے اعلیٰ عہدوں پر کام کیا۔ انہوں نے بہت خوبصورت غزلیں اور کئی ترقی پسند نظمیں لکھی ہیں، جن میں خالص اردو کے ساتھ ساتھ سادہ ہندوستانی زبان بھی استعمال کی گئی ہے۔ وہ دوستوں کے ایک ایسے گروہ کا حصہ تھے جو ایک دوسرے کے مذہبی تہوار مل کر مناتے تھے اور مشاعرے کرواتے تھے، تاکہ تقسیم کے پہلے اور بعد کے مشکل حالات میں بھائی چارہ اور امن قائم رہے۔

      ۱

      دل  کی  رُوداد  نگاہوں  سے  بیاں  ہوتی  ہے

      درد  مندوں  کی  خموشی  میں  زباں  ہوتی  ہے

       

      شاعر  کہتا  ہے  کہ  دل  کی  کہانی  سنانے  کے  لیے  لفظوں  کی  ضرورت  نہیں  ہوتی،  بلکہ  یہ  عاشق  کی  آنکھوں  سے  صاف  ظاہر  ہو  جاتی  ہے۔  وہ  لوگ  جو  عشق  کے  گہرے  دکھ  میں  ہوتے  ہیں،  اُن  کی  خاموشی  کا  مطلب  یہ  نہیں  کہ  وہ  کچھ  کہہ  نہیں  رہے۔  بلکہ  اُن  کی  خاموشی  خود  بولتی  ہے  اور  اُن  کے  درد  کو  اُن  لوگوں  تک  پہنچا  دیتی  ہے  جو  اِسے  سمجھنے  کی  صلاحیت  رکھتے  ہیں۔

      ۲

      خود  فراموش  نہ  جب  تک  ہو  کوئی  کیا  سمجھے

      بے  نِشانی  بھی  محبت  میں  نِشاں  ہوتی  ہے

       

      اس  شعر  میں  محبت  کی  اس  حالت  کا  ذکر  ہے  جہاں  انسان  اپنی  ہستی  کو  بھول  جاتا  ہے۔  جب  تک  ایک  عاشق  اپنی  انا  اور  اپنی  پہچان  کو  محبوب  (یا  خالق)  کی  یاد  میں  مِٹا  نہ  دے،  وہ  محبت  کی  حقیقت  نہیں  سمجھ  سکتا۔  اس  حال  میں  اپنی  پہچان  کھو  دینا  (بے  نشانی)  ہی  ایک  سچے  عاشق  کی  سب  سے  بڑی  نشانی  بن  جاتی  ہے۔

      ۳

      نقشِ  امید  ہیں  بن  بن  کے  بگڑتے  کیا  کیا

      زندگی  رقص  گہہِ  ریگِ  رواں  ہوتی  ہے

       

      رِشیؔ  نے  زندگی  کو  صحرا  کی  اُڑتی  ہوئی  ریت  سے  تشبیہ  دی  ہے۔  جس  طرح  ریت  کے  ٹیلوں  پر  ہوا  سے  نقش  بنتے  ہیں  اور  فوراً  مٹ  جاتے  ہیں،  ویسے  ہی  ہماری  امیدیں  اور  خواب  (نقشِ  امید)  ہر  پل  بنتے  اور  ٹوٹتے  رہتے  ہیں۔  یہ  شعر  دکھاتا  ہے  کہ  انسانی  خواہشات  کتنی  ناپائیدار  ہیں  اور  تقدیر  کتنی  طاقتور  ہے۔

      ۴

      جو  ترے  حُسنِ  نظر  گیر  سے  شاداب  نہیں

      اُن  بہاروں  کے  مقدر  میں  خزاں  ہوتی  ہے

       

      شاعر  محبوب  کے  دلکش  حُسن  کی  تعریف  کرتے  ہوئے  کہتا  ہے  کہ  خوشی  کا  کوئی  بھی  لمحہ  یا  بہار  کا  کوئی  بھی  رنگ  اگر  محبوب  کی  توجہ  اور  سائے  سے  محروم  ہے،  تو  وہ  ادھورا  ہے۔  جس  بہار  کو  محبوب  کے  حُسن  سے  تازگی  نہ  ملے،  اس  کا  نصیب  صرف  مرجھا  جانا  اور  خزاں  بن  جانا  ہی  ہے۔

      ۵

      وہ  بُرا  وقت  محبت  میں  نہ  دیکھے  کوئی

      جب  محبت  بھی  طبیعت  پہ  گراں  ہوتی  ہے

       

      یہ  شعر  جذبات  کے  تھک  جانے  کی  عکاسی  کرتا  ہے۔  شاعر  دعا  کرتا  ہے  کہ  کسی  پر  وہ  بُرا  وقت  نہ  آئے  جب  اُسے  اپنی  محبت  ہی  بوجھ  (گراں)  لگنے  لگے۔  یہ  اس  افسوسناک  صورتِ  حال  کا  ذکر  ہے  جہاں  وہ  جذبہ  جو  کبھی  جینے  کی  وجہ  تھا،  اب  طبیعت  کے  لیے  ایک  تھکا  دینے  والا  وزن  بن  گیا  ہو۔

      ۶

      یوں  بھی  ہوتی  ہے  ترے  غم  کی  نوازِش  اکثر

      لب  پہ  ہوتی  ہے  ہنسی  دل  میں  فغاں  ہوتی  ہے

       

      محبوب  کے  دیے  ہوئے  دُکھ  کا  انداز  بڑا  عجیب  ہوتا  ہے،  جسے  شاعر  نے  طنز  سے  “نوازش”  (مہربانی)  کہا  ہے۔  یہ  غم  انسان  کو  دوہری  زندگی  گزارنے  پر  مجبور  کر  دیتا  ہے:  دنیا  کو  دکھانے  کے  لیے  ہونٹوں  پر  مسکراہٹ  ہوتی  ہے،  جبکہ  دل  کے  اندر  درد  اور  آہ  و  زاری  (فغاں)  کا  طوفان  چھپا  ہوتا  ہے۔

      ۷

      جاں  نثاری  سے  ہے  توقیرِ  محبت  لیکن

      دیکھنا  یہ  ہے  کہ  تکمیل  کہاں  ہوتی  ہے

       

      اگرچہ  محبت  میں  جان  قربان  کر  دینے  سے  محبت  کی  عزت  بڑھتی  ہے،  لیکن  شاعر  کہتا  ہے  کہ  صرف  قربانی  ہی  سب  کچھ  نہیں  ہے۔  اصل  سوال  یہ  ہے  کہ  محبت  مکمل  (تکمیل)  کہاں  ہوتی  ہے؟  یہ  ایک  گہری  بات  ہے  کہ  کیا  محبت  موت  سے  پوری  ہوتی  ہے  یا  محبوب  (یا  خدا)  سے  مل  جانے  کے  کسی  بلند  درجے  پر۔

      ۸

      ہم  وہاں  ہو  کے  بھی  موجود  کہاں  ہوتے  ہیں

      ہم  نشینوں  میں  تری  بات  جہاں  ہوتی  ہے

       

      جب  شاعر  اپنے  دوستوں  (ہم  نشینوں)  میں  بیٹھا  ہوتا  ہے  اور  وہاں  محبوب  کا  ذکر  چھڑ  جائے،  تو  وہ  اپنی  سوچ  میں  اتنا  کھو  جاتا  ہے  کہ  اسے  محفل  کی  خبر  نہیں  رہتی۔  جسمانی  طور  پر  وہ  وہاں  ہوتا  ہے،  لیکن  روحانی  طور  پر  وہ  محبوب  کی  دنیا  میں  پہنچ  چکا  ہوتا  ہے۔

      ۹

      چونک  اٹھتا  ہے  غمِ  ہِجر  کا  احساس  رشیؔ

      اُن  کے  آنے  پہ  بھی  تسکین  کہاں  ہوتی  ہے

       

      آخری  شعر  میں  رشیؔ  جدائی  کے  گہرے  صدمے  کا  ذکر  کرتے  ہیں۔  علیحدگی  کا  دکھ  دل  میں  اتنا  گہرا  اتر  چکا  ہے  کہ  جب  محبوب  سامنے  آ  بھی  جائے،  تو  شاعر  سکون  محسوس  کرنے  کے  بجائے  چونک  اٹھتا  ہے  اور  گھبرا  جاتا  ہے  (شاید  اس  ڈر  سے  کہ  وہ  پھر  چلے  نہ  جائے)۔  دکھ  کی  عادت  اتنی  پکی  ہو  گئی  ہے  کہ  اب  وصل  کا  لمحہ  بھی  اسے  پوری  طرح  آرام  (تسکین)  نہیں  دے  پاتا۔

       

      ख़मोशी में ज़बाँ होती है – बाम देव शर्मा ऋषि पटियालवी

      १

      दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है

      दर्द-मंदों की ख़मोशी में ज़बाँ होती है

      २

      ख़ुद-फ़रामोश न जब तक हो कोई क्या समझे

      बे-निशानी भी मोहब्बत में निशाँ होती है

      ३

      नक़्श-ए उम्मीद हैं बन बन के बिगड़ते क्या क्या

      ज़िंदगी रक़्स-गह-ए रेग-ए रवाँ होती है

      ४

      जो तेरे हुस्न-ए नज़र-गीर से शादाब नहीं

      उन बहारों के मुक़द्दर में ख़िज़ाँ होती है

      ५

      वो बुरा वक़्त मोहब्बत में न देखे कोई

      जब मोहब्बत भी तबी’अत पे गिराँ होती है

      ६

      यूँ भी होती है तेरे ग़म की नवाज़िश अक्सर

      लब पे होती है हँसी दिल में फ़ुग़ाँ होती है

      ७

      जाँ-निसारी से है तौक़ीर-ए मोहब्बत लेकिन

      देखना ये है के तक्मील कहाँ होती है

      ८

      हम वहाँ हो के भी मौजूद कहाँ होते हैं

      हम-नशीनों में तेरी बात जहाँ होती है

      ९

      चौंक उठता है ग़म-ए हिज्र का एहसास ऋषि

      उन के आने पे भी तस्कीन कहाँ होती है

       

      बाम देव शर्मा ऋषि पटियालवी (१९१७-१९९९) पंजाब के होशियारपुर में पैदा हुए थे। वो नसीम नूर महली के शागिर्द (शिष्य) थे, और उनका साहित्यिक सिलसिला पंडित लभुराम जोश मलसियानी से होता हुआ सीधे दाग़ देहलवी तक जाता है। उन्होंने कई साल तक स्टेट बैंक ऑफ़ पटियाला में नौकरी की, जिसके बाद वो चंडीगढ़ चले गए और वहाँ मैनेजमेंट के ऊँचे पदों पर काम किया। उन्होंने बहुत ही सुंदर ग़ज़लें और कई प्रगतिशील नज़्में लिखी हैं, जिनमें शुद्ध उर्दू के साथ-साथ बोलचाल की हिंदुस्तानी भाषा का भी इस्तेमाल किया गया है। वे दोस्तों के एक ऐसे ग्रुप का हिस्सा थे जो एक-दूसरे के धार्मिक त्योहार मिलकर मनाते थे और मुशायरे करवाते थे, ताकि बँटवारे के पहले और बाद के मुश्किल वक़्त में आपसी भाईचारा और शांति बनी रहे।

      १

      दिल की रूदाद निगाहों से बयाँ होती है

      दर्द-मंदों की ख़मोशी में ज़बाँ होती है

       

      कवि कहते हैं के दिल का हाल सुनाने के लिये शब्दों की ज़रूरत नहीं होती, ये आशेक़ की आँखों से साफ़ पता चल जाता है। जो लोग इश्क़ के गहरे दुख में होते हैं, उन की ख़ामोशी का मतलब ये नहीं के वो कुछ कह नहीं रहे हैं। असल में उन की ख़ामोशी ही बोलती है और उन के दर्द को उन लोगों तक पहुँचा देती है जो उसे समझने का हुनर रखते हैं।

      २

      ख़ुद-फ़रामोश न जब तक हो कोई क्या समझे

      बे-निशानी भी मोहब्बत में निशाँ होती है

       

      इस शे’र में मोहब्बत की उस हालत का ज़िक्र है जहाँ आशेक़ ख़ुद को भूल जाता है। जब तक एक चाहने वाला अपनी पहचान और अपनी ‘मैं/अना/अहंकार’ को महबूब की याद में मिटा न दे, वो मोहब्बत की अस्लियत नहीं समझ सकता। ऐसी हालत में अपनी पहचान खो देना (बे-निशानी) ही एक सच्चे प्रेमी की सब से बड़ी पहचान बन जाती है।

      ३

      नक़्श-ए उम्मीद हैं बन बन के बिगड़ते क्या क्या

      ज़िंदगी रक़्स-गह-ए रेग-ए रवाँ होती है

       

      ऋषि ने ज़िंदगी की तुलना रेगिस्तान की उड़ती/बहती/बदलती हुई रेत से की है। जैसे रेगिस्तान में हवा से रेत पर नक़्श/निशान बनते हैं और तुरंत मिट जाते हैं, वैसे ही हमारी उम्मीदें और सपने (नक़्श-ए उम्मीद) हर पल बनते और टूटते रहते हैं। ये दिखाता है के इंसान की इच्छाएँ कितनी कच्ची हैं और तक़्दीर कितनी ताक़तवर।

      ४

      जो तेरे हुस्न-ए नज़र-गीर से शादाब नहीं

      उन बहारों के मुक़द्दर में ख़िज़ाँ होती है

       

      कवि महबूब की ख़ूबसूरती की तारीफ़ करते हुए कहते हैं के ख़ुशी का कोई भी पल या बहार का कोई भी रंग अगर महबूब की नज़र और उस की मौजूदगी से महरूम है, तो वो अधूरा है। जिस बहार को महबूब के हुस्न से ताज़गी न मिले, उस की क़िस्मत में सिर्फ़ मुरझाना और पतझड़ (ख़िज़ाँ) ही लिखा है।

      ५

      वो बुरा वक़्त मोहब्बत में न देखे कोई

      जब मोहब्बत भी तबी’यत पे गिराँ होती है

       

      ये शे’र जज़्बात के थक जाने की बात करता है। कवि दुआ करते हैं के किसी पर वो बुरा वक़्त न आए जब उसे अपनी मोहब्बत ही बोझ (गिराँ) लगने लगे। ये उस दुखद घड़ी का ज़िक्र है जहाँ वो रिश्ता जो कभी जीने की वजह था, अब मन के लिये एक थका देने वाला भार बन गया हो।

      ६

      यूँ भी होती है तेरे ग़म की नवाज़िश अक्सर

      लब पे होती है हँसी दिल में फ़ुग़ाँ होती है

       

      दुख का अंदाज़ बड़ा अजीब होता है। ये ग़म इंसान को दोहरी ज़िंदगी जीने पर मज्बूर कर देता है: दुनिया को दिखाने के लिये होंठों पर मुस्कुराहट होती है, जब के दिल के अंदर दर्द और रोने की आवाज़ (फ़ुग़ाँ) छुपी होती है।

      ७

      जाँ-निसारी से है तौक़ीर-ए मोहब्बत लेकिन

      देखना ये है के तक्मील कहाँ होती है

       

      मोहब्बत में जान क़ुर्बान कर देने से प्यार की इज़्ज़त (तौक़ीर) ज़रूर बढ़ती है, लेकिन कवि कहते हैं के सिर्फ़ क़ुर्बानी ही आख़िरी मंज़िल नहीं है। असली सवाल ये है के मोहब्बत पूरी (तक्मील) कहाँ होती है? क्या ये मौत से पूरी होती है या किसी ऊँचे रूहानी मिलन से?

      ८

      हम वहाँ हो के भी मौजूद कहाँ होते हैं

      हम-नशीनों में तेरी बात जहाँ होती है

       

      जब कवि अपने दोस्तों (हम-नशीनों) के बीच बैठा होता है और वहाँ महबूब का ज़िक्र छिड़ जाए, तो वो उस की सोच में इतना खो जाता है के उसे आसपास की ख़बर नहीं रहती। शरीर से वो वहाँ होता है, लेकिन मन से वो महबूब की दुनिया में पहुँच चुका होता है।

      ९

      चौंक उठता है ग़म-ए हिज्र का एहसास ऋषि

      उन के आने पे भी तस्कीन कहाँ होती है

       

      आख़िरी शे’र में ऋषि जुदाई के गहरे सदमे की बात करते हैं। अलग रहने का दुख दिल में इतना गहरा बैठ गया है के जब महबूब सामने आ भी जाए, तो कवि/आशिक़ सुकून महसूस करने के बजाय घबरा जाता है (शा’एद इस डर से के वो फिर चला न जाए)। दुख की आदत इतनी पक्की हो गई है के अब मिलन का पल भी उसे पूरी तरह चैन (तस्कीन) नहीं दे पाता।

      Khamoshi meN zabaaN hoti hai – baam dev sharma rishi paTialavi

      1
      dil ki ruudaad nigaahoN se bayaaN hoti hai
      dard-mandoN ki Khamoshi meN zabaaN hoti hai
      2
      Khud-faraamosh na jab tak ho koi kya samjhe
      be-nishaani bhi mohabbat meN nishaaN hoti hai
      3
      naqsh-e ummid haiN ban ban ke bigaRte kya kya
      zindagi raqs-gah-e reg-e ravaaN hoti hai
      4
      jo ter’e husn-e nazar-giir se shaadaab nahiN
      un bahaaroN ke muqaddar meN KhizaaN hoti hai
      5
      vo buraa vaqt mohabbat meN na dekh’e ko’ii
      jab mohabbat bhi tabii’at pe giraaN hoti hai
      6
      yuN bhi hoti hai ter’e Gham ki navaazish aksar
      lab pe hoti hai haNsi dil meN fuGhaaN hoti hai
      7
      jaaN-nisaari se hai tauqiir-e mohabbat lekin
      dekhna ye hai keh takmiil kahaaN hoti hai
      8
      ham vahaaN ho ke bhi maujuud kahaaN hot’e haiN
      ham-nashinoN meN teri baat jahaaN hoti hai
      9
      chauNk uThtaa hai Gham-e hijr ka ehsaas rishi
      un ke aan’e pe bhi taskiin kahaaN hoti hai

      baam dev sharma rishi paTialavi (1917-1999) originally from hoshiarpur in punjab.  He was a disciple of nasim noormahli, with the line going through panDit labhuram josh malsiani to daaGh dehlavi.  He worked for the State Bank of Patiala for a number of years before moving to other management positions in chandigaRh.  He has written exquisite Ghazal in chaste urdu and many progressive nazm in chaste urdu as well as in spoken hindi/urdu/hindustani.  He was part of a group of friends who organized joint celebration of one another’s religious festivities and mushaa’era to promote communal harmony during tense times pre and post partition.

      1
      dil ki ruudaad1 nigaahoN se bayaaN hoti hai
      dard-mandoN ki Khamoshi meN zabaaN hoti hai

      1.story

      The poet suggests that the story of the heart doesn’t require spoken words; it is reflected clearly in one’s eyes. For those who carry deep emotional pain (dard-mandoN), silence is not an absence of communication. Instead, their silence is eloquent and speaks louder than any speech could, conveying the depth of their suffering to those who can truly “read” them.

      2
      Khud-faraamosh1 na jab tak ho koi kya samjhe
      be-nishaani2 bhi mohabbat meN nishaaN hoti hai

      1.forgetting self, conquering ego 2.erasure, self-effacement

      This verse touches on the mystical side of love—the concept of self-oblivion (Khud-faraamoshi). Until a lover loses their ego and self-awareness, absorbed in the thoughts of the (divine) beloved, they cannot understand the true nature of love. In this state, “having no mark” – (be-nishaani), losing identity becomes the greatest sign or identity (nishaaN) of a true lover.

      3
      naqsh1-e ummid2 haiN ban ban ke bigaRte kya kya
      zindagi raqs-gah3-e reg-e-ravaaN4 hoti hai

      1.sketch, image 2.hope 3.place of dance, dance floor 4.flowing sand, shifting sand-dune

      rishi compares life to a “dance floor of shifting sand-dunes” (raqs-gah-e reg-e ravaaN). Just as patterns in the desert sand are formed and then instantly erased by the wind, our hopes and dreams (naqsh-e ummid) are constantly being built up and broken down. It captures the inherent instability and fleeting nature of human hopes and desires, portraying fate as more powerful.

      4
      jo ter’e husn-e nazar-giir1 se shaadaab2 nahiN
      un bahaaroN ke muqaddar meN KhizaaN3 hoti hai

      1.eye capturing 2.satiated, fulfilled 3.autumn, wither

      Here, the poet praises the “eye-catching beauty” (husn-e nazar-giir) of the beloved. He argues that any spring or moment of joy that isn’t nourished or blessed by the beloved’s presence is destined to wither. Without that specific spark of beauty, even the most vibrant spring is doomed to become autumn (KhizaaN).

      5
      vo buraa vaqt mohabbat meN na dekh’e ko’ii
      jab mohabbat bhi tabii’at1 pe giraaN2 hoti hai

      1.disposition, temperament 2.heavy, burden

      This is a poignant observation of emotional burnout. The poet prays that no one must experience that low point in a relationship where love itself begins to feel like a burden (giraaN) on one’s temperament. It describes the tragic moment when the passion that once gave life becomes an exhausting weight.

      6
      yuN bhi hoti hai ter’e Gham ki navaazish1 aksar2
      lab3 pe hoti hai haNsi dil meN fuGhaaN4 hoti hai

      1.courtesy, favour 2.often 3.lips 4.wail, sob

      The “kindness” or “favour” (navaazish) of the grief caused by the beloved is paradoxical. It forces the lover into a state of dual existence: maintaining a smile on the lips for the world to see, while the heart is filled with intense lamentation or cries of pain (fuGhaaN). It highlights the dignity and hidden suffering of a lover.

      7
      jaaN-nisaari1 se hai tauqiir2-e mohabbat lekin
      dekhna ye hai keh takmiil3 kahaaN hoti hai

      1.sacrificing life, self-sacrifice 2.respect, honour 3.completion, end

      While sacrificing one’s life (jaaN-nisaari) certainly grants honour (tauqiir) to the concept of love, the poet suggests that sacrifice alone isn’t the end goal. The real question is: where does love actually reach its “completion” or “perfection” (takmiil)? It’s a philosophical inquiry into whether love is fulfilled by death or by some higher state of union (perhaps with the divine).

      8
      ham vahaaN ho ke bhi maujuud1 kahaaN hot’e haiN
      ham-nashinoN2 meN teri baat jahaaN hoti hai

      1.present 2.companions, friends

      This couplet describes the total absorption of the lover. When sitting among companions (ham-nashinoN), if the beloved is mentioned, the poet becomes so lost in thoughts of them that he is no longer “present” in the room. Physically he is there, but mentally and spiritually, he has traveled to the realm of the beloved.

      9
      chauNk1 uThtaa hai Gham-e hijr2 ka ehsaas3 rishi4
      un ke aan’e pe bhi taskiin5 kahaaN hoti hai

      1.startled 2.separation 3.feeling 4.pen-name 5.comfort

      In the concluding verse, rishi expresses the trauma of long-term separation. The pain of being apart (Gham-e hijr) has become so deeply rooted that even when the beloved finally arrives, the poet is startled and anxious (fearful that she will leave soon) rather than at peace. The habit of sorrow is so strong that even a moment of union fails to provide true comfort (taskiin).  He is already thinking about/fearful of her departure.

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    • aab-o-gil meN hai-munshi maharaj barq dehlavi

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      • देवनागरी
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      • آب  و  گِل  میں  ہے  ۔  مُنشی  مہاراج  برقؔ  دہلوی

        ۱

        صاعقہ  ہے  یا  شرارِ  عشق  میرے  دل  میں  ہے

        جل  بُجھوں  گا  ایک  دن  وہ  چیز  آب  و  گِل  میں  ہے

        ۲

        جنبشِ  پیہم  میں  ہے  رازِ  ثباتِ  زِندگی

        کب  سکوں  موجِ  رواں  کو  دامنِ  ساحل  میں  ہے

        ۳

        ذوقِ  ناکامی  ہے  میری  کوششِ  برباد  کو

        اِک  کشِش  میرے  لیے  ہر  سعیِ  لا  حاصل  میں  ہے

        ۴

        محو  ہے  سارا  جہاں  نیرنگِ  دنیا  دیکھ  کر

        کس  قیامت  کی  کشِش  نظّارۂ  باطِل  میں  ہے

        ۵

        بے  کسی  ہںستی  ہے  اُس  کی  ہِمّتِ  مایوس  پر

        خاکِ  اُفتادہ  جو  فکرِ  دوریِ  منزل  میں  ہے

        ۶

        آمد  و  شُد  پر  نفس  ہے  خانۂ  تن  میں  اسیر

        یہ  مسافر  روز  ہِرپِھر  کر  اِسی  منزل  میں  ہے

        ۷

        بے  مشقّت  موت  بھی  مانگوں  تو  مل  سکتی  نہیں

        وائے  قسمت  میری  آسانی  بھی  کِس  مُشکِل  میں  ہے

        ۸

        قالبِ  خاکی  کے  ذرّوں  میں  ہے  کِس  کی  روشنی

        کس  کی  تصویرِ  حِجابی  پردہ  ہائے  دل  میں  ہے

         

        برق دہلوی منشی مہاراج (۱۸۸۴۔۱۹۳۶) مغل انتظامیہ میں خدمات انجام دینے والے شاعروں اور منتظمین کے خاندان سے تھے۔ ان کے دادا دولت رام عبرتؔ شیخ ابراہیم ذوقؔ کے شاگرد تھے۔ ان کے کئی مجموعے مذہبی، قومی نظم اور غزل کے ہیں۔ انہوں نے ڈرامے بھی لکھے جن میں سے ایک دو اسٹیج بھی ہوئے۔ ان کے شاگرد نے جمع کر کے ان کی تصنیف شائع کروائی جو ضائع ہو  سکتی تھی۔  ان کے انتقال کے بعد انہوں نے شاعرانہ خراج تحسین بھی جمع کرکے شائع کیا۔ یہ غزل غالب نقشِ قدم سے جُڑی ہے۔

        ۱

        صاعقہ  ہے  یا  شرارِ  عشق  میرے  دل  میں  ہے

        جل  بُجھوں  گا  ایک  دن  وہ  چیز  آب  و  گِل  میں  ہے

         

        شاعر  اس  سوچ  میں  ہے  کہ  وہ  کیا  ہے  جو  اُس  کے  دِل  میں  ہے  اور  اسے  بیچین  کر  رہی  ہے۔  یہ  صرف  عشق  کی  چنگاری  نہیں  ہو  سکتی۔  یہ  اِتنی  تیز  ہے  کہ  یہ  بجلی/برق  ہی  ہو  سکتی  ہے۔  آب  و  گِل  (پانی  اور  مِٹّی)  سے  مُراد  اِنسانی  جسم  ہے۔  لہٰذا  کہتا  ہے  کہ  یہ  اِتنی  تیز  ہے  کہ  مجھے  جلا  دے  گی۔

        ۲

        جنبشِ  پیہم  میں  ہے  رازِ  ثباتِ  زِندگی

        کب  سکوں  موجِ  رواں  کو  دامنِ  ساحل  میں  ہے

         

        مُسلسِل  حرکت  ہی  زندگی  کی  پائندگی  کا،  ثابت  قدم  ہونے  کا،  اِرادے  پر  قائم  رہنے  کا  راز  ہے۔  جیسے  کہ  رواں  دواں  موجوں  کو  ساحل  پر  آرام  نہیں  ہے۔  موجیں  بھی  ثابت  قدم  ہیں  اور  اُس  کا  راز  بھی  اُن  کی  مُسلسِل  حرکت  ہے۔

        ۳

        ذوقِ  ناکامی  ہے  میری  کوششِ  برباد  کو

        اِک  کشِش  میرے  لیے  ہر  سعیِ  لا  حاصل  میں  ہے

         

        شاعر/سالک  کی  برباد  کوشِش  کو  ناکامی  کا  ذوق/خواہش  ہے۔  اُسے  ناکام/بے  فائدہ  کوشِش  میں  ہی  کشِش  معلوم  ہوتی  ہے۔  یہ  ناکامی  (failure)  کی  خواہش  نہیں  بلکہ  بغیر  نتیجے  کی  لالچ  کئے  کوشِش  کرتے  رہنا  ہے۔  منزل  کی  خواہش  سے  زیادہ  راہ  کے  سفر  کی  خواہش  اچھی  ہے۔

        ۴

        محو  ہے  سارا  جہاں  نیرنگِ  دنیا  دیکھ  کر

        کس  قیامت  کی  کشِش  نظّارۂ  باطِل  میں  ہے

         

        شاعر  کو  اِس  کا  افسوس  ہے  کہ  سب  لوگ  دنیا  کے  جادُو/نیرنگ  میں  پھنسے  ہیں۔  افسوس  کیا  قیامت  کی  کشِش/جاذبیت  ہے  اِس  دکھاوے/جھوٹے/رنگ  و  بُو  کے  نظّارے  میں۔

        ۵

        بے  کسی  ہںستی  ہے  اُس  کی  ہِمّتِ  مایوس  پر

        خاکِ  اُفتادہ  جو  فکرِ  دوریِ  منزل  میں  ہے

         

        راہی/سالک  اپنی  منزل  کی  طرف  جا  رہا  ہے۔  وہ  مایوس  ہے،  ہِمّت  ہار  چکا  ہے،  یہ  دیکھ  کر  کہ  ابھی  منزل  کتنی  دور  ہے۔  بیکسی  اِس  مایوسی  پر  ہنستی  ہے۔  یہاں  اُفتادہ/گِری  ہوئی  خاک  اِستعارہ  ہے  راہی  کے  بیٹھ  جانے  کیونکہ  جب  راہی  چلتا  ہے  تو  خاک/گَرد  اُٹھتی  ہے۔

        ۶

        آمد  و  شُد  پر  نفس  ہے  خانۂ  تن  میں  اسیر

        یہ  مسافر  روز  ہِرپِھر  کر  اِسی  منزل  میں  ہے

         

        سانس  کا  آنا  جانا  (آمد  و  شُد)  بدن  کے  خانے  میں  قید  ہے۔  یعنی  جب  تک  بدن  میں  زندگی  ہے،  سانس  کا  آنا  جانا  لازمی  ہے،  سانس  مجبور  ہے،  اسیر  ہے۔  سانس  کے  آنے  جانے  کو  سفر  اور  سانس  کو  مسافر  کہا  گیا  ہے۔  ہِرپِھر  کر  (بھول  بھٹک  کر  واپس  آکر)  یہ  مسافر  اُسی  سفر  میں  اُسی  منزل  کی  طرف  لگا  ہوا  ہے۔

        ۷

        بے  مشقّت  موت  بھی  مانگوں  تو  مل  سکتی  نہیں

        وائے  قسمت  میری  آسانی  بھی  کِس  مُشکِل  میں  ہے

         

         

        شاعر/عاشق  کے  لئے  زندگی  اتنی  تلخ  ہو  گئی  ہے  کہ  اب  موت  ہی  اُس  کی  مشکل  آسان  کر  سکتی  ہے۔  مگر  افسوس  اُس  کی  قسمت  اتنی  خراب  ہے  کہ  بغیر  محنت/مشقت  کے  مُشکل  بھی  آسان  نہیں  ہو  سکتی،  موت  بھی  نہیں  آ  سکتی۔

        ۸

        قالبِ  خاکی  کے  ذرّوں  میں  ہے  کِس  کی  روشنی

        کس  کی  تصویرِ  حِجابی  پردہ  ہائے  دل  میں  ہے

         

        آخر  یہ  کس  کا  نور  ہے  جو  اِس  خاک  کے  پُتلے  کے  ہر  ذرّے  سے  چمک  رہا  ہے۔  خاک  کا  پُتلا  اِنسان  ہے  جو  آب  و  گِل  (پانی  اور  مِٹّی)  سے  بنا  ہے۔  دوسرے  مصرعے  میں  سوال  اک  اور  طریقے  سے  دوہرایا  گیا  ہے۔  وہ  کس  کی  تصویر/شبیہ  ہے  دل  کے  پردے  کے  پیچھے  حجاب  میں  ہے۔  ظاہر  ہے  کہ  یہ  خدا  کی  شان  کی  بات  ہو  رہی  ہے۔

         

        आब-ओ-गिल में है – मुंशी महाराज बर्क़ देहलवी

        १

        सा’एक़ह है या शरार-ए ‘इश्क़ मेरे दिल में है

        जल बुझूँगा एक दिन वो चीज़ आब-ओ-गिल में है

        २

        जुम्बिश-ए पैहम में है राज़-ए सबात-ए ज़िंदगी

        कब सकूँ मौज-ए रवाँ को दामन-ए साहिल में है

        ३

        ज़ौक़-ए नाकामी है मेरी कोशिश-ए बर्बाद को

        एक कशिश मेरे लिये हर स’ई-ए ला-हासिल में है

        ४

        महव है सारा जहाँ नैरंग-ए दुनिया देख कर

        किस क़यामत की कशिश नज़्ज़ारा-ए बातिल में है

        ५

        बे-कसी हँसती है उस की हिम्मत-ए मायूस पर

        ख़ाक-ए उफ़्तादह जो फ़िक्र-ए दूरी-ए मंज़िल में है

        ६

        आमद-ओ-शुद पर नफ़स है ख़ाना-ए तन में असीर

        ये मुसाफ़िर रोज़ हिर-फिर कर इसी मंज़िल में है

        ७

        बे-मशक़्क़त मौत भी माँगूँ तो मिल सकती नहीं

        वा’ए क़िस्मत मेरी आसानी भी किस मुश्किल में है

        ८

        क़ालिब-ए ख़ाकी के ज़र्रों में है किस की रौशनी

        किस की तस्वीर-ए हिजाबी पर्दा-हा-ए दिल में है

         

        बर्क़ देहलवी-मुंशी महाराज (१८८४-१९३६) कवियों और प्रशासकों के ख़ान्दान से थे जिन्होंने मुग़ल प्रशासन में सेवा की थी। उन के दादा दौलत राम ‘इब्रत’, शेख़ इब्राहिम ‘ज़ौक़’ के शागिर्द थे। उन के कई धार्मिक और भक्तिपूर्ण नज़्मों और ग़ज़लों के संग्रह हैं। उन्होंने नाटक भी लिखे, जिनमें से कुछ का मंचन भी हुआ। उन के शिष्यों ने उनकी रचनाओं को इकट्ठा करके प्रकाशित करवाया, वरना वे शा’एद खो जातीं। उन के निधन के बाद, शिष्यों ने उन के लिये लिखी गई काव्य-श्रद्धांजलियाँ भी इकट्ठा की और प्रकाशित करवाई। ये ग़ज़ल ग़ालिब नक़्श-ए क़दम में “ये भी मेरे दिल में है” से जुढी है

        १

        सा’एक़ह है या शरार-ए ‘इश्क़ मेरे दिल में है

        जल बुझूँगा एक दिन वो चीज़ आब-ओ-गिल में है

         

        शा’एर इस सोच में है के वो क्या चीज़ है जो उसे इतना बेचैन किये है। ये सिर्फ़ इश्क़ की चिंगारी नहीं हो सकती, क्यूंके इतनी तेज़ है के बिजली ही हो सकती है। आब-ओ-गिल के मा’नी हैं मनुष्य का शरीर। इस लिये शा’एर कहता है के ये मेरे अंदर इतनी तेज़ है के एक दिन मुझे जला कर भस्म/राख कर देगी।

        २

        जुम्बिश-ए पैहम में है राज़-ए सबात-ए ज़िंदगी

        कब सकूँ मौज-ए रवाँ को दामन-ए साहिल में है

         

        लगातार हलचल/कोशिश ही जीवन ने स्थिर होने का राज़ है।  समुद्र के तट पर मौज भी लगातार चलती रहती है, उस को आराम/सुकून नहीं है।  यही चलना उस के पक्के इरादे की निशानी है।

        ३

        ज़ौक़-ए नाकामी है मेरी कोशिश-ए बर्बाद को

        एक कशिश मेरे लिये हर स’ई-ए ला-हासिल में है

         

        शा’एर/साधक की बेकार कोशिश को नाकामी/असफल होने का शौक़ है। उस के लिये हर असफल कोशिश में एक आकर्षण है। इस का मतलब है के फल की इच्छा किये बग़ैर काम में स्थिर रहना।

        ४

        महव है सारा जहाँ नैरंग-ए दुनिया देख कर

        किस क़यामत की कशिश नज़्ज़ारा-ए बातिल में है

         

        कवि को दुख है के सब लोग दुनिया की माया-मोह (नैरंग) में फंसे हैं। हैरत है के इस झूटे (बातिल) धोका देने वाले नज़्ज़ारे में इतना आकर्षण (कशिश) है।

        ५

        बे-कसी हँसती है उस की हिम्मत-ए मायूस पर

        ख़ाक-ए उफ़्तादह जो फ़िक्र-ए दूरी-ए मंज़िल में है

         

        राही/साधक अपनी मंज़िल की तरफ़ जा रहा है लैकिन निराश है, थक गया है, ये देख कर के मंज़िल बहुत दूर है।  जब राही चलता है तो गर्द उढती है, जब रुक जाता है तो गर्द बैठ/गिर/घट जाती उफ़्तादा हो जाती है।

        ६

        आमद-ओ-शुद पर नफ़स है ख़ाना-ए तन में असीर

        ये मुसाफ़िर रोज़ हिर-फिर कर इसी मंज़िल में है

         

        सांस का आना-जाना (आमद-ओ-शुद) शरीर के घर में क़ैद है। जब तक शरीर में जीव है सांस का आना जाना ज़रूरी है, सांस मज्बूर है, असीर है, इस बंधन में है। सांस के आने जाने को सफ़र/पथ और सांस को मुसाफ़िर/पंथी कहा गया है। हिर-फिर कर (भूल भटक कर वापस आ कर) ये मुसाफ़िर उसी राह में उसी लक्ष्य की तरफ़ लगा है।

        ७

        बे-मशक़्क़त मौत भी माँगूँ तो मिल सकती नहीं

        वा’ए क़िस्मत मेरी आसानी भी किस मुश्किल में है

         

        शा’एर/आशिक़ के लिये जीवन इतना कठिन हो गया है के अब मौत हि उस की कठिनाई सहल कर सकती है। लैकिन अफ़्सोस उस का भाग्य इतना ख़राब है के कढी मेहनत के बिना मौत भी नहीं आती, मुश्किल भी आसान नहीं होती।

        ८

        क़ालिब-ए ख़ाकी के ज़र्रों में है किस की रौशनी

        किस की तस्वीर-ए हिजाबी पर्दा-हा-ए दिल में है

         

        आख़िर ये किस की रौशनी है जो इस मिट्टी के पुतले (क़ालिब-ए ख़ाकी) के हर कण (ज़र्रे) से चमक रही है। दुसरे मिसरे (पंक्ती) मे ऐसा ही सवाल है – ये किस की छवी है जो दिल के पर्दौं के पीछे छुपी है।

         

        aab-o-gil m’eN hai – munshi maharaaj barq dehlavi

        1
        saa’eqah hai yaa sharaar-e ‘ishq mer’e dil m’eN hai
        jal bujhuuNgaa ek din vo chiiz aab-o-gil m’eN hai
        2
        jumbish-e paiham m’eN hai raaz-e sabaat-e zindagi
        kab sukuuN mauj-e ravaaN ko daaman-e saahil m’eN hai
        3
        zauq-e naakaami hai meri koshish-e barbaad ko
        ek kashish mer’e liye har sa’ii-e laa-haasil m’eN hai
        4
        mahv hai saaraa jahaaN nairaNg-e duniyaa dekh kar
        kis qayaamat ki kashish nazzaara-e baatil m’eN hai
        5
        be-kasi haNsti hai uss ki himmat-e maayuus par
        Khaak-e uftaadah jo fikr-e duuri-e manzil m’eN hai
        6
        aamad-o-shud par nafas hai Khaanah-e tan m’eN asiir
        ye musaafir roz hir-phir kar isi manzil m’eN hai
        7
        be-mashaqqat maut bhi maaNguuN to mil sakti nahiN
        vaa’e qismat meri aasaani bhi kis mushkil m’eN hai
        8
        qaalib-e Khaaki ke zarroN m’eN hai kis ki roshni
        kis ki tasviir-e hijaabi pardah-haa-e dil m’eN hai

        barq dehlavi-munshi maharaj (1884-1936) from long line of poets and administrators who served in muGhal administration.  His grandfather daulat raam ibrat was a shaagird of shaiKh ibrahim zauq.  There are several collections of religious, devotional nazm and of Ghazal to his credit.  He also wrote plays, a couple of which were staged.  His shaagird disciple collected and got his work published which migh otherwise have been lost.  After his passing he also solicited poetic tributes and collected and published them.  This Ghazal is linked to “ye bhi mer’e dil m’eN hai” under Ghalib naqsh-e qadam.

        1
        saa’eqah1 hai yaa sharaar2-e ‘ishq mer’e dil m’eN hai
        jal bujhuuNgaa ek din vo chiiz aab-o-gil3 m’eN hai

        1.lightning 2.spark 3.water and clay, the human body

        The poet wonders what it is in his heart that is making him so restless – it can’t be a simple spark of love sharaar-e ‘ishq.  It must be lightning saa’eqah because it feels so strong.  aab-o-gil is water and clay and that is what the human body is supposed to be made of.  Thus, the poet concludes that the thing he has in his heart/body is so strong that one day it will burn him to ashes.

        2
        jumbish1-e paiham2 m’eN hai raaz3-e sabaat4-e zindagi
        kab sukuuN5 mauj-e ravaaN6 ko daaman7-e saahil8 m’eN hai

        1.movement 2.repeated, constant 3.secret 4.steadfastness, resolve, constancy 5.stillness 6.flowing 7.hem of the garment 8.shoreline

        Constant movement jumbish-e paiham is the secret of the steadfastness/resolve of life sabaat-e zindagi.  This is just like the dynamic waves mauj-e ravaaN at the shoreline.  There is no rest for them and in it lies their constancy.

        3
        zauq1-e naakaami2 hai meri koshish3-e barbaad4 ko
        ek kashish5 mer’e liye har sa’ii6-e laa-haasil7 m’eN hai

        1.taste, desire 2.failure 3.effort 4.ruined 5.attraction 6.effort 7.fruitless

        Desire for failure zauq-e naakaami is very much a part of my ruined effort koshish-e barbaad.  For me, there is an attraction in fruitless effort sa’ii-e laa-haasil.  This is not wanting to fail or wanting to make a useless effort … it is quite different … it is making an effort regardless of the outcome/fruit even if that be certain failure.  The real reward lies in making the effort not in gaining the objective.

        4
        mahv1 hai saaraa jahaaN nairaNg2-e duniyaa dekh kar
        kis qayaamat ki kashish3 nazzaara4-e baatil5 m’eN hai

        1.engrossed 2.enchantment 3.attraction 4.scene 5.false, not real, not spiritual, material

        The material world has a lot of enchantment nairaNg-e duniyaa and the whole world is taken in and is absorbed in its attractions.  What hellish attraction qayaamat ki kashish does this false (appearance only, not real) scene nazzaara-e baatil carry.

        5
        be-kasi1 haNsti hai uss ki himmat2-e maayuus3 par
        Khaak4-e uftaadah5 jo fikr6-e duuri7-e manzil8 m’eN hai

        1.helplessness 2.courage, resolve 3.disappointment, disillusionment 4.dust 5.fallen to the ground 6.worry 7.distance 8.destination, goal

        There is a traveler/seeker on his way to the destination manzil.  There is disappointment, disillusionment in his courage himmat-e maayuus if he worries about the long distance to the destination.  Helplessness be-kasi laughs at/derides the fallen dust Khaak-e uftaadah of the path.  Rising dust is symbolic of an energetic, onward journey and falling dust represents giving up and sitting down.

        6
        aamad-o-shud1 par nafas2 hai Khaanah3-e tan4 m’eN asiir5
        ye musaafir6 roz hir-phir7 kar isi manzil8 m’eN hai

        1.coming and going 2.breath 3.house, home 4.body 5.captive 6.traveler 7.returning again and again 8.destination

        In the house of the body Khaanah-e tan the coming and going aamad-o-shud of breath nafas is imprisoned.  This traveler ye musaafir i.e., nafas breath comes back again and again hir-phir kar every day to the same path to the destination.  Very simply, as long as there is a body, breath is bound to come and go/in and out.

        7
        be-mashaqqat1 maut bhi maaNguuN to mil sakti nahiN
        vaa’e2 qismat meri aasaani3 bhi kis mushkil4 m’eN hai

        1.without effort/strain 2.fie upon 3.ease 4.difficulty

        The poet’s aasaani ease/relief/comfort is in death.  He wants to be released from the confines of this body.  But woe to my fate even my aasaani is in mushkil.  Even if I ask/beg, I do not get ‘it’, without making an effort be-mashaqqat.  Here ‘it’ is death.

        8
        qaalib1-e Khaaki2 ke zarroN3 m’eN hai kis ki roshni
        kis ki tasviir-e hijaabi4 pardah-haa5-e dil m’eN hai

        1.body 2.of clay 3.particles 4.veiled, hidden 5.plural of pardah

        Whose brilliance is reflected in the grains zarroN m’eN of the body of clay qaalib-e Khaaki; whose veiled image tasviir-e hijaabi is behind the veils of the heart parda-haa-e dil.  This is a rhetorical question implying that divine glory is reflected in the body and is behind the veils of the heart.

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      • shaam-e be-asar kab tak-raghupati sahay firaaq gorakhpuri

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        Recitation

        • اُردو
        • تشریح
        • देवनागरी
        • व्याख्या
        • Roman
        • Explanation
        • شامِ  بے  اثر  کب  تک  ۔  رگھوپتی  سہائے  فراقؔ  گورکھ  پوری

          ۱

          خیال  مرگ  کب  تک  زندگی  کا  دردِ  سر  کب  تک

          یہ  مانا  صبر  کرتے  ہیں  محبت  میں  مگر  کب  تک

          ۲

          نگاہِ  شوق  کا  ہوتا  ہے  خود  ہم  پر  اثر  کب  تک

          اُترتا  ہے  جگر  میں  دیکھیے  یہ  نیشتر  کب  تک

          ۳

          وبالِ  دوش  سے  کچھ  ہو  چلے  ہیں  اِن  فضاؤں  میں

          مری  پرواز  میں  حائل  رہیں  گے  بال  و  پر  کب  تک

          ۴

          کہاں  کا  وصل  و  فرقت  عشق  ہے  بس  منتظر  اس  کا

          حجابِ  حُسن  بڑھ  کر  حُسن  کا  ہو  پردہ  در  کب  تک

          ۵

          خیالِ  زُلف  و  رُخ  اے  اہلِ  زندان  ہوش  میں  آؤ

          دیارِ  حُسن  کی  یہ  شام  کب  تک،  یہ  سحر  کب  تک

          ۶

          دیارِ  دوست  حد  ہوتی  ہے  آخر  دل  بہلنے  کی

          نہ  یاد  آئیں  غریبوں  کو  ترے  دیوار  و  در  کب  تک

          ۷

          مِٹاتا  جائے  گا  دل  کوئی  کب  تک  نرم  نظروں  سے

          چلاتا  جائے  گا  کوئی  یہ  تیرِ  بے  اثر  کب  تک

          ۸

          کہیں  آتی  ہیں  کام  ایسی  بھی  تدبیریں  محبت  میں

          یہ  مانا  دوست  کو  بھولے  رہیں  گے  ہم  مگر  کب  تک

          ۹

          عنایت  کی،  کرم  کی،  لطف  کی،  آخر  کوئی  حد  ہے

          کوئی  کرتا  رہے  گا  چارۂ  زخمِ  جگر  کب  تک

          ۱۰

          یہ  دورِ  آسماں  ہے،  تُو  محبت  لاکھ  بڑھنے  دے

          مگر  یہ  بے  خودی،  یہ  دردِ  دل،  یہ  چشمِ  تر،  کب  تک

          ۱۱

          گریباں  چاک  کر  منہ  موڑ  لے  حُسنِ  گلِستاں  سے

          کہ  زیرِ  آسماں  یہ  منظرِِ  رقصِ  شرر  کب  تک

          ۱۲

          کسی  کا  حُسن  رُسوا  ہو  گیا  پردے  ہی  پردے  میں

          نہ  لائے  رنگ  آخر  کار  تاثیرِ  نظر  کب  تک

          ۱۳

          فراقؔ  ایّامِ  فرقت  کی  درازی  بھی  تو  دھوکا  ہے

          سحر  بے  شام  کی  کب  تک  یہ  شامِ  بے  سحر  کب  تک

           

          رگھوپتی سہائے فراقؔ گورکھپوری (۱۸۹۶۔۱۹۸۲) کے والد گورکھ پرشاد ایک زمیندار اور پیشے سے وکیل تھے، جو ‘عبرت’ تخلص کے ساتھ شاعری بھی کرتے تھے۔ فراقؔ نے گھر پر ہی اُردو اور فارسی کی تعلیم حاصل کی۔ اُن کی پہلی غزل ۲۰ سال کی عمر میں اُس وقت سامنے آئی جب وہ کالج کے طالب علم تھے، اور اُسے منشی پریم چند کے مشورے اور تاثر پر شائع کیا گیا۔ سینٹرل کالج الٰہ آباد سے بی۔اے مکمّل کرنے کے بعد وہ ملک کی سیاست میں عملی طور پر شامل ہو گئے۔ ۱۹۲۰ میں اُنہیں گرفتار کیا گیا اور انہوں نے ۱۸ ماہ جیل میں گزارے۔ کچھ عرصے تک اُنہوں نے کانگریس پارٹی کے لیے کام کیا، لیکن آزادی کے بعد سیاست سے کنارہ کشی اِختیار کر لی۔ ۱۹۳۰ میں انہوں نے آگرہ یونیورسٹی سے انگریزی ادب میں ایم۔اے کا امتحان پاس کیا اور الٰہ آباد یونیورسٹی میں انگریزی کے لیکچرر مقرر ہو گئے۔ ان کی گھریلو زندگی ایک ناخوشگوار شادی اور بیٹے کی خودکشی کی وجہ سے کافی تلخ اور تکلیف دہ رہی۔ اُنہیں متعدد اعزازات سے نوازا گیا—۱۹۶۱ء میں ساہتیہ اکادمی ایوارڈ، ۱۹۶۸ء میں سوویت نہرو ایوارڈ، پدم بھوشن، اور گیان پیٹھ ایوارڈ، ۱۹۸۱ میں غالب ایوارڈ۔

          ۱

          خیال  مرگ  کب  تک  زندگی  کا  دردِ  سر  کب  تک

          یہ  مانا  صبر  کرتے  ہیں  محبت  میں  مگر  کب  تک

           

          اس  شعر  کو  تین  طریقوں  سے  دیکھا  جا  سکتا  ہے:  (الف)  روایتی  عاشقانہ  شکایت  —  اِک  طرفہ  محبت  کا  یہ  دردِ  سر  آخر  کب  تک  برداشت  کرنا  پڑے  گا؟  موت  مجھے  اس  بوجھ  سے  کب  نجات  دلائے  گی؟  یہاں  “خیال”  حسرت  بن  جاتا  ہے۔  زندگی  کے  اس  بوجھ  کو  کب  تک  صبر  کے  ساتھ  اٹھایا  جائے  گا؟  (ب)  ترقی  پسند  مصنفین  کے  نظریے  کے  تحت  —  کب  تک  موت  کے  بارے  میں  سوچتے  رہو  گے،  اور  کب  تک  زمین  پر  زندگی  کو  ایک  بوجھ  سمجھتے  رہو  گے؟  محبت  کے  مظالم  کو  کب  تک  خاموشی  سے  صبر  کے  ساتھ  سہتے  رہو  گے؟  مقصد  یہ  ہے  کہ  اس  روایتی  سوچ  سے  نکل  کر  ایک  متحرک  دنیا  میں  قدم  رکھا  جائے  اور  سماجی  مسائل  کا  سامنا  کیا  جائے۔  (پ)  موت  کا  خوف  —  “خیال”  کو  خدشے  کے  معنوں  میں  لے  کر:  کب  تک  موت  سے  ڈرتے  رہو  گے،  اور  کب  تک  یہ  خوف  زندگی  کا  دردِ  سر  بنا  رہے  گا؟  یہ  مان  لیا  کہ  روایت  صبر  کا  تقاضا  کرتی  ہے،  لیکن  کب  تک  یہ  صبر  عمل  کی  کمی  کا  بہانہ  بنا  رہے  گا؟

          ۲

          نگاہِ  شوق  کا  ہوتا  ہے  خود  ہم  پر  اثر  کب  تک

          اُترتا  ہے  جگر  میں  دیکھیے  یہ  نیشتر  کب  تک

           

          عاشق  محبوب  کی  طرف  محبت  بھری  اور  تمنّائی  نگاہ  (نگاہِ  شوق)  ڈالتا  ہے،  اور  اس  نگاہ  کا  اثر  خود  اُسی  پر  ہوتا  ہے۔  یہ  نگاہ  اُس  کے  دل  میں  خنجر  (نشتر)  کی  طرح  اتر  جاتی  ہے۔  یہ  سلسلہ  کب  تک  چلے  گا؟  یہ  ایک  عام  روایتی  عاشقانہ  شکایت  بھی  ہو  سکتی  ہے،  اور  شاعری  میں  سماجی  اور  ترقی  پسند  خیالات  کے  بجائے  محض  روایتی  محبت  کی  عکاسی  پر  ایک  طنز  بھی۔

          ۳

          وبالِ  دوش  سے  کچھ  ہو  چلے  ہیں  اِن  فضاؤں  میں

          مری  پرواز  میں  حائل  رہیں  گے  بال  و  پر  کب  تک

           

          اگر  اس  شعر  کو  نثری  ترتیب  میں  پڑھا  جائے:  (ماضی  کے  خیالات  اور  روایات  کے)  بوجھ  اور  وبال  کی  وجہ  سے  پرواز  میں  کچھ  رکاوٹیں  آ  گئی  ہیں،  تو  یہ  وبالِ  دوش  کب  تک  ان  فضاؤں  میں  قائم  رہے  گا؟  ماضی  کی  اس  سوچ  کے  بوجھ  کی  وجہ  سے  میرے  بال  و  پر  ہی  میری  پرواز  میں  رکاوٹ  بن  گئے  ہیں۔  اس  کا  مطلب  یہ  ہے  کہ  پرانی  سوچ  کا  بوجھ  اُتار  پھینکا  جائے  اور  نئی  پرواز  بھری  جائے۔

          ۴

          کہاں  کا  وصل  و  فرقت  عشق  ہے  بس  منتظر  اس  کا

          حجابِ  حُسن  بڑھ  کر  حُسن  کا  ہو  پردہ  در  کب  تک

           

          بار  بار  ملنے  اور  بچھڑنے  (وصل  و  فرقت)  کے  اس  چکّر  کا  کیا  فائدہ؟  سچی  محبت  اور  آزاد  سوچ  رکھنے  والا  اِنسان  اس  بیکار  کھیل  کو  قبول  نہیں  کرتا۔  وہ  ایک  بڑے  لمحے  کا  منتظر  ہے:  وہ  وقت  جب  خوبصورتی  (حسن)  حِجاب  کے  پیچھے  نہ  چھپ  سکے  اور  پردہ  خود  پھٹ  کر  سچائی  کو  ظاہر  کر  دے۔  لمحہ  کا  منتظر  رہنا  خاموشی  سے  انتظار  کرنا  نہیں  ہے؛  فراق  ایک  غیر  فعال  شخص  نہیں  ہیں۔  سستے  سمجھوتوں  اور  معذرتوں  سے  انکار  کر  کے،  شاعر  سچائی  کو  سامنے  لانے  کے  لیے  ایک  دباؤ  پیدا  کرتا  ہے۔  چاہے  حسن  سے  مراد  کوئی  شخص  ہو،  خدا  کی  ذات  ہو،  یا  ایک  بہتر  معاشرہ—پیغام  ایک  ہی  ہے:  چھوٹی  چیزوں  میں  الجھنا  بند  کرو،  مضبوطی  سے  ڈٹ  جاؤ  اور  سچائی  کو  سامنے  آنے  پر  مجبور  کرو۔

          ۵

          خیالِ  زُلف  و  رُخ  اے  اہلِ  زندان  ہوش  میں  آؤ

          دیارِ  حُسن  کی  یہ  شام  کب  تک،  یہ  سحر  کب  تک

           

          یہ  شعر  “اہلِ  زنداں”  یعنی  قیدیوں  سے  دو  سطحوں  پر  بات  کرتا  ہے۔  سیاسی  سطح  پر،  یہ  ان  لوگوں  کو  بیدار  کرتا  ہے  جو  غلامی  میں  رہنے  کے  باوجود  دیارِ  حسن  کے  جھوٹے  دلاسوں  سے  دل  بہلا  رہے  ہیں۔  ادبی  سطح  پر،  یہ  ان  شعراء  کی  مذمت  کرتا  ہے  جن  کا  تخیل  صرف  زلف  و  رخ  کی  زلفوں  اور  چہرے  تک  محدود  ہو  کر  رہ  گیا  ہے۔  فراق  کا  مطالبہ  “ہوش  میں  آؤ”  اس  بات  کی  طرف  اشارہ  ہے  کہ  اس  بے  بنیاد  فرار  پسندی  کو  ختم  کیا  جائے  اور  شاعر  اور  عوام  دونوں  اپنے  اِرد  گِرد  کی  تلخ  سماجی  حقیقتوں  کو  دیکھیں۔

          ۶

          دیارِ  دوست،  حد  ہوتی  ہے  آخر  دل  بہلنے  کی

          نہ  یاد  آئیں  غریبوں  کو  ترے  دیوار  و  در  کب  تک

           

          یہ  شعر  “دیارِ  دوست”  یعنی  محبوب  کی  دنیا  سے  مخاطب  ہے۔  عاشقانہ  سطح  پر،  یہ  ایک  بےپروا/غافل  محبوب  سے  کہتا  ہے  کہ  آستانے  سے  باہر  رہ  کر  اپنے  بے  چین  دل  کو  بہلانے  کی  بھی  ایک  حد  ہوتی  ہے۔  سیاسی  سطح  پر،  بااثر  اور  امیر  لوگ  اپنے  محلوں  میں  آرام  سے  رہتے  ہیں  اور  عام  لوگوں  کو  دکھاوے  کی  چیزوں  سے  بہلاتے  ہیں۔  لیکن  اس  کی  بھی  ایک  حد  ہوتی  ہے—محروم  اور  غریب  عوام  کو  ہمیشہ  کے  لیے  بے  وقوف  نہیں  بنایا  جا  سکتا،  اور  وہ  ایک  دن  اپنے  بنیادی  حقوق  اور  چھت  (دیوار  و  در)  کا  مطالبہ  ضرور  کریں  گے۔

          ۷

          مِٹاتا  جائے  گا  دل  کوئی  کب  تک  نرم  نظروں  سے

          چلاتا  جائے  گا  کوئی  یہ  تیرِ  بے  اثر  کب  تک

           

          یہاں  “تیرِ  بے  اثر”  عاشق  کی  وہ  بے  بس  اور  التجا  بھری  نگاہ  ہے  جو  وہ  محبوب  پر  ڈالتا  ہے۔  محبوب  اُس  کا  درد  دور  کرنے  کے  لیے  نرم  نگاہوں  سے  تسلّی  تو  دیتا  ہے،  لیکن  حقیقت  میں  کچھ  نہیں  کرتا۔  یہ  ڈرامہ  کب  تک  چلے  گا؟  اس  عاشق  اور  محبوب  کے  تعلق  کو  ہم  محروم  اور  سرمایہ  دار،  یا  عوام  اور  حکمران  کے  رشتے  سے  بھی  بدل  سکتے  ہیں۔

          ۸

          کہیں  آتی  ہیں  کام  ایسی  بھی  تدبیریں  محبت  میں

          یہ  مانا  دوست  کو  بھولے  رہیں  گے  ہم  مگر  کب  تک

           

          کیا  محبت  میں  تدبیریں  اور  چالاکیاں  کبھی  کام  آتی  ہیں؟  یہ  مان  لیا  کہ  ہم  محبوب  (یا  دوست)  کو  بھولنے  کی  کوشش  کریں  گے،  لیکن  کب  تک؟  یہی  بات  وطن  سے  محبت  پر  بھی  لاگو  ہوتی  ہے:  ہم  کب  تک  اپنے  وطن  کی  محبت  کو  بھول  کر  بغیر  کسی  احتجاج  کے  غلامی  کی  زندگی  گزارتے  رہیں  گے؟

          ۹

          عنایت  کی،  کرم  کی،  لطف  کی،  آخر  کوئی  حد  ہے

          کوئی  کرتا  رہے  گا  چارۂ  زخمِ  جگر  کب  تک

           

          اس  شعر  میں  عنایت،  کرم  اور  لطف  جیسے  الفاظ  طنز  کے  طور  پر  استعمال  ہوئے  ہیں،  جو  صرف  اوپری  مرہم  پٹی  کو  ظاہر  کرتے  ہیں۔  دل  کے  گہرے  زخم  کا  علاج  کب  تک  کیا  جاتا  رہے  گا؟  یہاں  “علاج  کرنے  والا”  ایک  بے  حِس  محبوب  بھی  ہو  سکتا  ہے،  کوئی  ظالم  بھی،  یا  پھر  کوئی  غاصب  حکمران۔

          ۱۰

          یہ  دورِ  آسماں  ہے،  تُو  محبت  لاکھ  بڑھنے  دے

          مگر  یہ  بے  خودی،  یہ  دردِ  دل،  یہ  چشمِ  تر،  کب  تک

           

          شاعر  اپنے  مخاطب  (تُو)  سے  راست  بات  کرتے  ہوئے  کہتا  ہے  کہ  زمانہ  ظالم  اور  سخت  (دورِ  آسماں)  ہے۔  تم  چاہے  محبت  کو  کتنا  ہی  بڑھا  لو،  یہ  حالات  کو  بدل  نہیں  سکتی۔  تم  کب  تک  بے  خبر  (بے  خود)  بنے  رہو  گے،  دل  کا  درد  سہتے  رہو  گے  اور  مسلسل  روتے  (چشمِ  تر)  رہو  گے؟  فراقؔ  سننے  والے  کو  چیلنج  کرتے  ہیں  کہ  اس  ظالم  دور  کا  مقابلہ  خاموش  تکلیف  اور  تنہائی  سے  کرنا  بند  کرو۔

          ۱۱

          گریباں  چاک  کر  منہ  موڑ  لے  حُسنِ  گلِستاں  سے

          کہ  زیرِ  آسماں  یہ  منظرِِ  رقصِ  شرر  کب  تک

           

          اس  شعر  میں  فراقؔ  اپنے  مخاطب  کو  بناوٹی  جذبات  دکھانے  پر  ڈانٹتے  ہیں۔  یہاں  “حسنِ  گلستاں”  آرام  دہ  اور  اوپری  خوبصورتی  ہے،  جبکہ  “منظرِ  رقصِ  شرر”  ایک  دکھاوے  کا  ڈرامہ  ہے—یعنی  دل  کی  آگ  اور  جذبات  کا  محض  ایک  دِکھاوا۔  فراقؔ  اس  دِکھاوے  کو  ختم  کرنے  کا  مطالبہ  کرتے  ہیں:  تم  کب  تک  اس  باغ  کی  خوبصورتی  میں  کھوئے  رہو  گے  اور  اندر  کی  آگ  کا  صرف  ناٹک  کرتے  رہو  گے؟  اگر  تمہاری  محبت  سچی  ہے  تو  اس  آرام  دہ  دنیا  سے  منہ  موڑو،  اپنا  گریبان  چاک  کرو،  اور  اس  سچے  جنون  کا  ثبوت  دو۔

          ۱۲

          کسی  کا  حُسن  رُسوا  ہو  گیا  پردے  ہی  پردے  میں

          نہ  لائے  رنگ  آخر  کار  تاثیرِ  نظر  کب  تک

           

          اس  شعر  میں  “تأثیرِ  نظر”  عاشق  کی  نگاہ  کے  گہرے  اثر  کو  ظاہر  کرتی  ہے۔  اتنی  گہری  نگاہ  کا  اثر  آخر  کب  تک  ظاہر  نہیں  ہوگا؟  عاشقانہ  طور  پر،  یہ  نگاہ  پردے  کو  چیر  کر  اندر  تک  چلی  جاتی  ہے،  جس  سے  محبوب  پردے  کے  پیچھے  ہونے  کے  باوجود  شرمندہ  (رسوا)  ہو  جاتا  ہے۔  سیاسی  طور  پر،  پردہ  حکمرانوں  کی  سازشوں  اور  پروپیگنڈے  کی  علامت  ہے،  اور  تأثیرِ  نظر  عوام  کی  بیدار  سوچ  ہے۔  فراقؔ  کہتے  ہیں  کہ  حاکم  جتنے  بھی  پردوں  میں  چُھپ  جائیں،  عوام  کی  بیدار  نگاہ  ان  کی  سچائی  دیکھ  لے  گی  اور  انہیں  رسوا  کر  کے  رہے  گی۔

          ۱۳

          فراقؔ  ایّامِ  فرقت  کی  درازی  بھی  تو  دھوکا  ہے

          سحر  بے  شام  کی  کب  تک  یہ  شامِ  بے  سحر  کب  تک

           

          اے  فراقؔ!  جدائی  کے  دنوں  کی  یہ  لمبائی  (درازی)  صرف  ایک  دھوکہ  اور  وہم  ہے۔  کوئی  صبح  بغیر  شام  کے  اور  کوئی  شام  بغیر  صبح  کے  کب  تک  رہ  سکتی  ہے؟  یعنی  جدائی  کے  یہ  دن  ختم  ہونے  ہی  والے  ہیں۔  یہ  شعر  ایک  تڑپتے  ہوئے  عاشق  اور  ایک  مظلوم  شہری  دونوں  کے  لیے  امید  اور  تسلی  کا  پیغام  ہے۔

           

          शाम-ए बे-असर कब तक – रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी

          १

          ख़याल-ए मर्ग कब तक ज़िंदगी का दर्द-ए सर कब तक

          ये माना सब्र करते हैं मोहब्बत में मगर कब तक

          २

          निगाह-ए शौक़ का होता है ख़ुद हम पर असर कब तक

          उतरता है जिगर में देखिये ये नीश्तर कब तक

          ३

          वबाल-ए दोश से कुछ हो चले हैं इन फ़ज़ाओं में

          मेरी परवाज़ में हा’एल रहेंगे बाल-ओ-पर कब तक

          ४

          कहां का वस्ल-ओ-फ़ुर्क़त इश्क़ है बस मुंतज़िर इसका

          हिजाब-ए हुस्न बढ़ कर हुस्न का हो पर्दा-दर कब तक

          ५

          ख़याल-ए ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ अए अहल-ए ज़िंदां होश में आओ

          दयार-ए हुस्न की ये शाम कब तक, ये सहर कब तक

          ६

          दयार-ए दोस्त हद होती है आख़िर दिल बहलने की

          न याद आएं ग़रीबों को तेरे दीवार-ओ-दर कब तक

          ७

          मिटाता जाएगा दिल कोई कब तक नर्म नज़रों से

          चलाता जाएगा कोई ये तीर-ए बे-असर कब तक

          ८

          कहीं आती हैं काम ऐसी भी तद्बीरें मोहब्बत में

          ये माना दोस्त को भूले रहेंगे हम, मगर कब तक

          ९

          इना’एत की, करम की, लुत्फ़ की, आख़िर कोई हद है

          कोई करता रहेगा चारा-ए ज़ख़्म-ए जिगर कब तक

          १०

          ये दौर-ए आसमां है, तू मोहब्बत लाख बढ़ने दे

          मगर ये बे-ख़ुदी, ये दर्द-ए दिल, ये चश्म-ए तर, कब तक

          ११

          गरेबां चाक कर मुंह मोड़ ले हुस्न-ए गुलिस्तां से

          के ज़ेर-ए आसमां ये मंज़र-ए रक़्स-ए शरर कब तक

          १२

          किसी का हुस्न रुसवा हो गया परदे ही परदे में

          न लाए रंग आख़िरकार तासीर-ए नज़र कब तक

          १३

          फ़िराक़ अय्याम-ए फ़ुर्क़त की दराज़ी भी तो धोका है

          सहर बे-शाम की कब तक ये शाम-ए बे-सहर कब तक

           

          रघुपति सहाए फ़िराक़ गोरखपुरी (१८९६-१९८२) के पिता गोरख प्रसाद एक ज़मींदार और पेशे से वकील थे, जो ‘इब्रत’ तख़ल्लुस से शा’एरी भी करते थे। फ़िराक़ ने घर पर ही उर्दू और फ़ारसी की पढ़ाई की। उन की पहली ग़ज़ल २० साल की उम्र में तब रची गई जब वो कॉलेज के छात्र थे, और मुंशी प्रेमचंद के कहने पर प्रकाशित हुई। सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद से बी.ए. करने के बाद वो देश की राजनीति में सक्रिय हो गए। १९२० में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और उन्होंने १८ महीने जेल में बिताए। कुछ समय तक उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिये काम किया, लेकिन आज़ादी के बाद राजनीति छोड़ दी। १९३० में उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की परीक्षा पास की और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी के लेक्चरर बन गए। उन का घरेलू जीवन एक दुखद शादी और बेटे की आत्महत्या के कारण काफ़ी कष्टदायक रहा। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया—१९६१ में साहित्य अकादमी; १९६८ में सोवियत नेहरू पुरस्कार, पद्म भूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार; तथा १९८१ में ग़ालिब पुरस्कार।

          १

          ख़याल-ए मर्ग कब तक ज़िंदगी का दर्द-ए सर कब तक

          ये माना सब्र करते हैं मोहब्बत में मगर कब तक

           

          इस शे’र को देखने के तीन तरीक़े हैं: (क) पारंपरिक आशेक़ाना शिका’एत — नापा’एदार मोहब्बत का ये दर्द-ए सर आख़िर कब तक झेलना पड़ेगा? मौत मुझे इस बोझ से कब निजात दिलाएगी? यहाँ “ख़याल” हसरत बन जाता है। ज़िंदगी के इस बोझ को कब तक सब्र के साथ उठाया जाएगा? (ख) प्रगतिशील लेखकों का दृष्टिकोण — कब तक मौत के बारे में सोचते रहोगे, और कब तक ज़िंदगी को एक बोझ समझते रहोगे? ज़ुल्म को कब तक ख़ामोशी से सहते रहोगे? इस का मतलब है के इस पुरानी सोच से निकल कर एक नई दुनिया में क़दम रखा जाए और सामाजिक समस्याओं का सामना किया जाए। (ग) मौत का डर — “ख़याल” को डर या अंदेशे के रूप में ले कर: कब तक मौत से डरते रहोगे, और कब तक ये डर ज़िंदगी का दर्द-ए सर बना रहेगा? ये मान लिया के परंपरा सब्र की माँग करती है, लेकिन कब तक ये सब्र कोशिश न करने का बहाना बना रहेगा?

          २

          निगाह-ए शौक़ का होता है ख़ुद हम पर असर कब तक

          उतरता है जिगर में देखिए ये नीश्तर कब तक

           

          प्रेमी प्रेमिका की तरफ़ मोहब्बत भरी नज़र (निगाह-ए शौक़) डालता है, और इस नज़र का असर ख़ुद उसी पर होता है। ये नज़र उस के दिल में चाक़ू (नश्तर) की तरह उतर जाती है। ये सिलसिला कब तक चलेगा? ये एक आ’म पारंपरिक आशेक़ाना शिका’एत भी हो सकती है, और कविता में सामाजिक लक्ष्य के बजा’ए सिर्फ़ पुरानी मोहब्बत की बातें करने पर एक तंज़ भी।

          ३

          वबाल-ए दोश से कुछ हो चले हैं इन फ़ज़ाओं में

          मेरी परवाज़ में हा’एल रहेंगे बाल-ओ-पर कब तक

           

          अगर इस शे’र को गद्य (प्रोज़) के रूप में पढ़ा जाए: (पुरानी सोच और परंपराओं के) बोझ की वजह से उड़ने में रुकावटें आ गई हैं, तो ये बोझ (वबाल-ए दोश) कब तक इस माहौल में बना रहेगा? अतीत की इस सोच के बोझ की वजह से मेरे पंख ही मेरी उड़ान में रुकावट बन गए हैं। इस का मतलब ये है के पुरानी सोच का बोझ उतार फेंका जाए और नई उड़ान भरी जाए।

          ४

          कहां का वस्ल-ओ-फ़ुर्क़त इश्क़ है बस मुंतज़िर इसका

          हिजाब-ए हुस्न बढ़ कर हुस्न का हो पर्दा-दर कब तक

           

          बार-बार मिलने और बिछड़ने (वस्ल-ओ-फ़ुर्क़त) के इस चक्कर का क्या फ़ा’एदा? सच्ची मोहब्बत और आज़ाद सोच रखने वाला इंसान इस बेकार खेल को स्वीकार नहीं करता। वो एक बड़े अवसर का इन्तेज़ार करता है: वो वक़्त जब सुंदरता (हुस्न) पर्दे के पीछे न छुप सके और पर्दा ख़ुद फटकर सच्चाई को सामने ला दे। ये चुपचाप इन्तेज़ार करना नहीं है; फ़िराक़ गोरखपूरी एक निष्क्रिय (passive) इन्सान नहीं हैं। सस्ते समझौतों को अस्वीकार कर, कवि सच्चाई को सामने लाने के लिये एक दबाव बनाता है। चाहे हुस्न का मतलब कोई इन्सान हो, ईश्वर हो, या एक बेहतर समाज—संदेश एक ही है: छोटी चीज़ों में उलझना बंद करो, मज़्बूती से डटे रहो और सच्चाई को सामने आने पर मज्बूर करो।

          ५

          ख़याल-ए ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ अए अहल-ए ज़िंदां होश में आओ

          दयार-ए हुस्न की ये शाम कब तक, ये सहर कब तक

           

          ये शे’र “अहल-ए ज़िंदाँ” यानी क़ैदियों से दो स्तरों पर बात करता है। राजनीतिक स्तर पर, ये उन लोगों को जगाता है जो ग़ुलामी में रहने के बावजूद दयार-ए हुस्न (सुंदरता की दुनिया) के झूठे दिलासों से दिल बहला रहे हैं। साहित्यिक स्तर पर, ये उन कवियों को डांटता है जिन की कल्पना सिर्फ़ जुल्फ़ और चेहरे (ज़ुल्फ़-ओ-रुख़) तक सीमित रह गई है। फ़िराक़ की माँग “होश में आओ” इस बात का इशारा है के इस काल्पनिक दुनिया से बाहर निकला जाए और कवि तथा जनता दोनों अपने आसपास की कड़वी सामाजिक सच्चाइयों को देखें।

          ६

          दयार-ए दोस्त हद होती है आख़िर दिल बहलने की

          न याद आएं ग़रीबों को तेरे दीवार-ओ-दर कब तक

           

          ये शे’र “दयार-ए दोस्त” यानी प्रिय की दुनिया को संबोधित है। आशेक़ाना स्तर पर, ये एक अंजान होने प्रिय से कहता है के चौखट के बाहर रह कर अपने बेचैन दिल को बहलाने की भी एक सीमा होती है। राजनीतिक स्तर पर, अमीर और सरमायादार अपने महलों में आराम से रहते हैं और आ’म जनता को दिखावे की चीज़ों से बहलाते हैं। लेकिन इस की भी एक सीमा (हद्द) होती है—ग़रीब और बेघर जनता को हमेशा के लिये बेवक़ूफ़ नहीं बनाया जा सकता, और वो एक दिन अपने बुनियादी अधिकारों और घर (दीवार-ओ-दर) की माँग ज़रूर करेंगे।

          ७

          मिटाता जाएगा दिल कोई कब तक नर्म नज़रों से

          चलाता जाएगा कोई ये तीर-ए बे-असर कब तक

           

          यहाँ “तीर-ए बे-असर” प्रेमी की वो बेबस और मिन्नत भरी नज़र है जो वो प्रिय पर डालता है। प्रिय उस का दर्द दूर करने के लिये नरम नज़रों से सांत्वना (consolation) तो देता है, लेकिन असल में कुछ नहीं करता। ये नाटक कब तक चलेगा? इस प्रेमी और प्रिय के रिश्ते को हम ग़रीब और अमीर, या जनता और शासक के रिश्ते की तरह भी देख सकते हैं।

          ८

          कहीं आती हैं काम ऐसी भी तद्बीरें मोहब्बत में

          ये माना दोस्त को भूले रहेंगे हम मगर कब तक

           

          क्या मोहब्बत में नीतियाँ या चालाकियाँ (तद्बीरें) कभी काम आती हैं? ये मान लिया के हम प्रिय (दोस्त) को भूलने की कोशिश करेंगे, लेकिन कब तक? यही बात देशप्रेम पर भी लागू होती है: हम कब तक अपने देश के प्यार को भूल कर बिना किसी विरोध के ग़ुलामी सहते रहेंगे?

          ९

          इना’एत की, करम की, लुत्फ़ की, आख़िर कोई हद है

          कोई करता रहेगा चारा-ए ज़ख़्म-ए जिगर कब तक

           

          इस शे’र में इना’एत, करम और लुत्फ़ जैसे शब्दों का इस्तेमाल ताने के रूप में हुआ है, जो सिर्फ़ ऊपरी मरहम-पट्टी को दिखाते हैं। दिल के गहरे ज़ख्म का इलाज कब तक ऊपरी मरहम से किया जाता रहेगा? यहाँ “इलाज करने वाला” एक बेपरवाह प्रिय भी हो सकता है, कोई ज़ालिम अमीर भी, या फिर कोई शोषक शासक।

          १०

          ये दौर-ए आसमां है, तू मोहब्बत लाख बढ़ने दे

          मगर ये बे-ख़ुदी, ये दर्द-ए दिल, ये चश्म-ए तर, कब तक

           

          कवि अपने सुनने वाले (तू) से सीधा बात करते हुए कहता है के ज़माना ज़ालिम और कठिन (दौर-ए आसमाँ) है। तुम चाहे प्यार को कितना ही बढ़ा लो, ये हालात को बदल नहीं सकता। तुम कब तक बेख़बर (बे-ख़ुद) बने रहोगे, दिल का दर्द सहते रहोगे और लगातार रोते (चश्म-ए तर) रहोगे? फ़िराक़ सुनने वाले को चुनौती देते हैं के इस कठिन समय का सामना ख़ामोश तक्लीफ़ सह कर करना बंद करो।

          ११

          गरेबां चाक कर मुंह मोड़ ले हुस्न-ए गुलिस्तां से

          के ज़ेर-ए आसमां ये मंज़र-ए रक़्स-ए शरर कब तक

           

          इस शे’र में फ़िराक़ अपने सुनने वाले को दिखावटी भावनाएँ प्रकट करने पर डांटते हैं। यहाँ “हुस्न-ए गुलिस्ताँ” आरामदायक और ऊपरी सुंदरता है, जबके “मंज़र-ए रक़्स-ए शरार” एक दिखावे का नाटक है—यानी दिल की आग और भावनाओं का महज़ एक शो। फ़िराक़ इस दिखावे को ख़त्म करने की माँग करते हैं: तुम कब तक इस बग़ीचे की सुंदरता में खोए रहोगे और अंदर की आग का सिर्फ़ नाटक करते रहोगे? अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है तो इस आरामदायक दुनिया से मुँह मोड़ो, अपना गरेबान फाड़ो (गरेबाँ चाक करो), और सच्चे जुनून का सबूत दो।

          १२

          किसी का हुस्न रुसवा हो गया परदे ही परदे में

          न लाए रंग आख़िरकार तासीर-ए नज़र कब तक

           

          इस शे’र में “तासीर-ए नज़र” प्रेमी की नज़र के गहरे असर को दिखाती है। इतनी गहरी नज़र का असर आख़िर कब तक सामने नहीं आएगा? आशेक़ाना रूप से, ये नज़र पर्दे को चीरकर अंदर तक चली जाती है, जिससे प्रिय पर्दे के पीछे होने के बावजूद शर्म से रुस्वा हो जाता है। राजनीतिक रूप से, पर्दा शासकों की साज़िशों और प्रचार का प्रतीक है, और तासीर-ए नज़र जनता की जागी हुई सोच है। फ़िराक़ कहते हैं के शासक जितने भी पर्दों में छुप जाएँ, जनता की जागी हुई नज़र उनकी सच्चाई देख लेगी और उन्हें रुस्वा करके रहेगी।

          १३

          फ़िराक़ अय्याम-ए फ़ुर्क़त की दराज़ी भी तो धोका है

          सहर बे-शाम की कब तक ये शाम-ए बे-सहर कब तक

           

          अए फ़िराक़! जुदाई के दिनों की ये लंबाई (दराज़ी) सिर्फ़ एक धोखा और वहम है। कोई सुब्ह बिना शाम के और कोई शाम बिना सुब्ह के कब तक रह सकती है? यानी जुदाई के ये दिन ख़त्म होने ही वाले हैं। ये शे’र एक तड़पते हुए प्रेमी और एक सताए हुए नागरिक दोनों के लिये उम्मीद और सांत्वना का संदेश है।

           

          shaam-e be-asar kab tak – raghupati sahaa’e firaaq gorakhpuri

          1
          Khayaal-e marg kab tak zindagi ka dard-e sar kab tak
          ye maana sabr kart’e haiN mohabbat m’eN magar kab tak
          2
          nigaah-e shauq ka hota hai Khud hum par asar kab tak
          utarta hai jigar m’eN dekhiye ye neeshtar kab tak
          3
          vabaal-e dosh se kuchh ho chal’e haiN in fazaaoN m’eN
          meri parvaaz m’eN haa’el raheNg’e baal-o-par kab tak
          4
          kahaaN ka vasl-o-furqat ishq hai bas muntazir iss ka
          hijaab-e husn baRh kar husn ka ho parda-dar kab tak
          5
          Khayaal-e zulf-o-ruKh aye ahl-e zindaaN hosh m’eN aao
          dayaar-e husn ki ye shaam kab tak, ye sahar kab tak
          6
          dayaar-e dost hadd hoti hai aaKhir dil bahaln’e ki
          na yaad aa’eN GhariiboN ko ter’e diivaar-o-dar kab tak
          7
          miTaata jaa’ega dil koi kab tak narm nazroN se
          chalaata jaa’ega koi ye tiir-e be-asar kab tak
          8
          kahiiN aati haiN kaam aisi bhi tadbiir’eN mohabbat m’eN
          ye maana dost ko bhool’e rah’eNg’e hum magar kab tak
          9
          inaa’et ki, karam ki, lutf ki, aaKhir koi hadd hai
          koi karta rahega chaara-e zaKhm-e jigar kab tak
          10
          ye daur-e aasmaaN hai, tuu mohabbat laakh baRhn’e d’e
          magar ye be-Khudi, ye dard-e dil, ye chashm-e tar, kab tak
          11
          garebaaN chaak kar muNh moR le husn-e gulistaaN se
          keh zer-e aasmaaN ye manzar-e raqs-e sharar kab tak
          12
          kisi ka husn rusva ho gaya pard’e hi pard’e m’eN
          na laa’e raNg aaKhir-kaar taasiir-e nazar kab tak
          13
          firaaq ayyaam-e furqat ki daraazi bhi to dhoka hai
          sahar be-shaam ki kab tak ye shaam-e be-sahar kab tak

          raghupati sahaa’e firaaq gorakhpuri (1896-1982). His father gorakh prasaad was a landlord and practiced law and was a poet using the taKhallus ibrat. firaaq studied urdu and faarsi at home.  His first Ghazal was composed at the age of 20, when he was college student, and published at the urging of munshi premchand.  After his BA from Central College Allahabad he became involved in the country’s politics. He was arrested in 1920 and spent 18 months in prison. He worked for some time for the Congress party but after independence, discontinued politics.  In 1930, he passed the MA examination in English Literature from Agra University and became a lecturer in English in Allahabad University.  His domestic life was troubled with a bad marriage and suicide of his son.  He received multiple awards – 1961, sahitya akademi; 1968, Soviet Nehru, padma bhushan, gyaan piiTh; 1981 Ghalib award.

          1
          Khayaal-e marg1 kab tak zindagi ka dard-e sar kab tak
          ye maana sabr2 kart’e haiN mohabbat m’eN magar kab tak

          1.death 2.patience, bear

          There are three ways of looking at this.  (a)Classical Romantic Plaint – how long will I have to bear the burden zindagi ka dard-e sar of unrequited love. How long before death relieves my burden – Khayaal becomes yearning. How long will I have to patiently sabr bear this burden of life.  (b)Answer to the call of Progressive Writers. How long will you keep thinking of (wishing for) death, how long will you keep thinking that life on earth is a burden. How long will you be obsessed with patiently bearing all the cruelties of love. The implication is that it is time to come out of this conventional thinking and enter the dynamic new world, facing social problems.  (c)Fear of Death. Interpreting Khayaal as apprehension – how long will you be fearful of death, how long will this fear be the dard-e sar of your life. Agreed that convention calls for patience, but how long will this be an excuse for lack of effort.

          2
          nigaah-e shauq1 ka hota hai Khud hum par asar2 kab tak
          utarta hai jigar m’eN dekhiye ye niishtar3 kab tak

          1.desire, longing 2.effect 3.dagger, knife

          The lover casts a longing glance of love nigaah-e shauq at the beloved and this nigaah itself has an effect on him; it descends into his heart utarta hai jigar m’eN like a knife niishtar.  How long can this go on.  This could be a conventional romantic plaint or a sarcastic critique of romance convention in poetry instead of socially progressive writing.

          3
          vabaal1-e dosh2 se kuchh ho chal’e haiN inn fazaaoN3 m’eN
          meri parvaaz4 m’eN haa’el5 raheNg’e baal-o-par6 kab tak

          1.burden, curse 2.past 3.air 4.flight 5.obstacle 6.feathers and wings

          If the sh’er is read in prose form as with two implied words shown in parentheses – baal o par vabaal-e dosh (ki vaj’h) se meri parvaaz m’eN kuchh haa’el ho chal’e haiN.  kab tak inn fazaa’oN m’eN rah’eNge.  My wings have become an obstacle to my flight because of the burden/curse of the past (past thinking/conventions).  How long will this curse remain in the ambience/surroundings.  Read this way, the sh’er becomes a dynamic call to shed the burden of past thinking and take flight.

          4
          kahaaN ka vasl-o-furqat1 ishq hai bas muntazir2 iss ka
          hijaab3-e husn4 baRh kar husn ka ho parda-dar5 kab tak

          1.union and separation 2.waiting 3.veil 4.beauty, beloved 5.one who tears the veil

          What is the point of endlessly going back and forth between breaking up and getting back together (vasl-o-furqat)? True passion—and the independent thinker—refuses to play this exhausting game. Instead, it holds out for something much bigger: the moment when Beauty can no longer hide behind its veil (hijaab-e husn), and the veil itself finally tears open (parda-dar) to reveal the truth.  This isn’t just sitting around and waiting passively. firaaq isn’t a passive person. By refusing to settle for cheap compromises or fake rituals, the speaker creates the exact pressure needed to force the truth into the open. Whether you look at Beauty as a real person, a divine truth, or a fairer society, the message is the same: stop chasing small distractions, stand your ground, and force the real thing to show itself.

          5
          Khayaal-e zulf-o-ruKh1 aye ahl-e-zindaaN2 hosh3 m’eN aao
          dayaar4-e husn5 ki ye shaam kab tak, ye sahar6 kab tak

          1.curls and hair 2.captives, prisoners 3.senses 4.realm 5.beauty 6.dawn, day

          This sh’er addresses the ahl-e zindaaN—the “captives”—on two distinct levels. Politically, it calls out a colonized people who comfort themselves with the false promises or distractions of the dayaar-e husn (realm of beauty) while remaining in chains. Literarily, it scolds fellow poets whose imagination is imprisoned by traditional romantic tropes (zulf-o-ruKh). firaaq’s demand—hosh m’eN aao (come to your senses)—calls for an end to this passive, day-and-night escapism, urging both the public and the poet to wake up to the harsh social realities around them.

          6
          dayaar1-e dost2, hadd3 hoti hai aaKhir dil bahaln’e4 ki
          na yaad aa’eN GhariiboN ko ter’e diivaar-o-dar5 kab tak

          1.realm 2.friend, beloved 3.limit 4.console, pacify 5.walls and doors, home, abode

          This sh’er works on both romantic and socio-political levels, addressed to the “domain of the beloved” (dayaar-e dost). Romantically, it speaks to an indifferent beloved: there is a limit to how long lovers can pacify their restless heart (dil behalna) while remaining exiled outside her threshold (diivaar-o-dar). On a political level, the privileged elite live comfortably inside their domain, using superficial distractions to pacify the populace. But there is a limit (hadd) to this—the destitute and displaced masses (Ghariib) cannot be kept distracted forever, and will inevitably demand access to the real structures of security and home (diivaar-o-dar) they have been denied.

          7
          miTaata jaa’ega dil koi kab tak narm1 nazroN2 se
          chalaata jaa’ega koi ye tiir-e be-asar3 kab tak

          1.soft, consoling 2.glance 3.ineffective

          Here tiir-e be-asar is the ineffective, pleading glance that the lover casts towards beloved.  The beloved returns consoling glances narm nazreN trying to erase the pain in the heart of the lover without actually doing anything.  How long can this go on.  We can easily replace the lover-beloved with the deprived-privileged or subject-ruler.

          8
          kahiiN aati haiN kaam aisi bhi tadbiir’eN1 mohabbat m’eN
          ye maana dost2 ko bhool’e rah’eNg’e hum magar kab tak

          1.plans, schemes 2.friend, beloved

          Do these schemes tadbiir’eN ever work kaam aati haiN in love.  I agree ye maana that we/I will try to forget the beloved dost, but how long.  This can also apply to the beloved as the homeland, asking how long can we forget/ignore love of homeland and remain under the colonial yoke without protest.

          9
          inaa’et1 ki, karam2 ki, lutf3 ki, aaKhir koi hadd4 hai
          koi karta rahega chaara5-e zaKhm6-e jigar7 kab tak

          1.gift 2.benevolence 3.favours 4.limit 5.healing 6.wound 7.liver/heart

          In this sh’er, gifts, benevolence and favours – inaa’et, karam and lutf are used either as sarcasm or to mean superficial balm to treat symptoms.  Is there a limit to how long one can try to heal chaara the deep wound of the heart zaKhm-e jigar.  The “healer” in this case can be the romantic beloved, the privileged oppressor or the colonizer.

          10
          ye daur1-e aasmaaN hai, tuu mohabbat laakh baRhn’e d’e
          magar ye be-Khudi2, ye dard-e dil, ye chashm-e-tar3, kab tak

          1.times, control 2.unaware, ignorant 3.tearful eye

          Addressing the interlocutor directly (tuu), the poet points out that times are oppressive (daur-e aasmaaN). No matter how much you try to deepen or increase love (mohabbat laakh baRhn’e d’e), it cannot alter these harsh conditions. How long can you remain blissfully unaware (be-Khud), tolerating pain in the heart (dard-e dil) and weeping endlessly (chashm-e tar)? firaaq challenges the listener to stop relying on passive suffering and emotional withdrawal as a way to cope with oppressive times.

          11
          garebaaN1 chaak2 kar muNh moR3 le husn-e gulistaaN se
          keh zer4-e aasmaaN ye manzar5-e raqs6-e sharar7 kab tak

          1.collar, shirt front 2.teara 3.turn away from 4.under 5.scene 6.dance 7.sparks

          In this sh’er, firaaq admonishes his interlocutor caught in performative passion. Here, husn-e gulistaaN represents comfortable, superficial beauty, while manzar-e raqs-e sharar refers to a staged spectacle (manzar)—a contrived display of “dancing sparks” raqs-e sharar or dramatic emotion put on for show. firaaq demands an end to this affectation: how long will you allow yourself to be mesmerized by the garden while merely putting on a show of inner fire? If your passion is genuine, turn your back on these easy comforts, tear open your collar (garebaaN chaak kar), and show true, uncalculated devotion rather than a hollow performance.

          12
          kisi ka husn rusva1 ho gaya pard’e hi pard’e m’eN
          na laa’e raNg2 aaKhir-kaar3 taasiir4-e nazar5 kab tak

          1.embarrassment 2.style 3.finally, ultimately 4.effect 5.sight

          In this sh’er, taasiir-e nazar represents the powerful, penetrating effect of the lover’s gaze. How long could such intense scrutiny fail to show its ultimate effect (na laa’e raNg aaKhir-kaar)? Romantically, the gaze is so intense that it penetrates the veil, causing the beloved husn to be overcome with bashful embarrassment (rusva) even while remaining behind the curtain (pard’e hi pard’e m’eN).  Politically, this interpretation works seamlessly: the “veil” symbolizes the propaganda, secrecy, and scheming of the privileged elite. The taasiir-e nazar is the awakening critical consciousness of the people. firaaq asserts that no matter how tightly authority shields itself behind institutional walls, the relentless gaze of an awakened public will eventually see through the charade and expose them to public disgrace.

          13
          firaaq1 ayyaam2-e furqat3 ki daraazi4 bhi to dhoka hai
          sahar5 be-shaam ki kab tak ye shaam-e be-sahar kab tak

          1.pen-name 2.days 3.separation 4.length 5.dawn

          O firaaq after all the agonizing length daraazi of the days of separation ayyaam-e furqat is also an illusion.  How long can dawn sahar remain without an evening or evening without a dawn i.e., the days of separation are bound to end.  This could be offering consolation/reassurance to the distraught lover or the oppressed citizen.

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        • be-baal o par kab tak-raghupathi sahay firaaq gorakhpuri

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          Recitation

          • اُردو
          • تشریح
          • देवनागरी
          • व्याख्या
          • Roman
          • Explanation
          • بے  بال  و  پر  کب  تک  ۔  رگھوپتی  سہائے  فراقؔ  گورکھپوری

            ۱

            یہ  سرگردانیاں  کب  تک  طوافِ  دربدر  کب  تک

            ترے  شوریدہ  سر  آخر  رہیں  شوریدہ  سر  کب  تک

            ۲

            کسی  پر  مہرباں  ہوتے  ہیں  لیکن  یوں  نہیں  ہوتے

            سراسر  لطف  کے  پردے  میں  جورِ  سربسر  کب  تک

            ۳

            اسیرانِ  ستم  نے  اور  ہی  کچھ  سوچ  رکّھا  ہے

            کریں  آخر  بسر  بھی  کرنے  والے  یوں  بسر  کب  تک

            ۴

            ابھی  تو  بڑھتی  ہی  جاتی  ہے  بے  تابی  تشفّی  سے

            علاجِ  دردِ  دل  ہوتا  ہے  دیکھیں  کارگر  کب  تک

            ۵

            نویدِ  طاقتِ  پرواز  لائی  حدّ  مجبوری

            ترے  بے  بال  و  پر  آخر  رہیں  بے  بال  و  پر  کب  تک

            ۶

            تری  تاثیرِ  پنہاں  کے  نِثار  اب  دیکھنا  یہ  ہے

            نگاہِ  مست  تیرے  بے  خبر  ہوں  باخبر  کب  تک

            ۷

            جمالستانِ  عالم  میں  بھی  کیا  عالم  نکلتا  ہے

            رہے  اِس  پردۂ  رنگیں  میں  حُسنِ  پردہ  در  کب  تک

            ۸

            نگاہِ  شوخ  تو  اِک  مبتدائے  بے  خبر  نکلی

            اُمید  و  بیم  کا  یہ  رنگ  قِصّہ  مختصر  کب  تک

            ۹

            حجابِ  حُسن  اگر  ہیں  جلوۂ  مہر  و  مہ  و  انجُم

            نظر  کو  روکے  رکھیں  ہم  بھی  تاحدّ  نظر  کب  تک

            ۱۰

            نظامِ  دہر  بدلے،  آسماں  بدلے،  زمیں  بدلے

            لیے  بیٹھا  رہے  کوئی  حیاتِ  بے  اثر  کب  تک

            ۱۱

            یہ  آہِ  سرد  کیا  غافل  نگاہِ  گرم  پیدا  کر

            نہ  ہوگا  ہستیِ  افسُردہ  پر  آخر  اثر  کب  تک

            ۱۲

            سکُوتِ  عِشق  میں  ہنگامہ  زارِ  زندگی  گُم  ہو

            کریں  رُودادِ  غم  ہائے  نہانی  مختصر  کب  تک

            ۱۳

            فراقؔ  اندازِ  وحشت  اب  بدل  دیں  ہوش  میں  آئیں

            رہیں  ژولیدہ  مُو،  عاشفتہ  سر،  حیراں  نظر  کب  تک

             

            رگھوپتی سہائے فراقؔ گورکھپوری (۱۸۹۶۔۱۹۸۲) کے والد گورکھ پرشاد ایک زمیندار اور پیشے سے وکیل تھے، جو ‘عبرت’ تخلص کے ساتھ شاعری بھی کرتے تھے۔ فراقؔ نے گھر پر ہی اُردو اور فارسی کی تعلیم حاصل کی۔ اُن کی پہلی غزل ۲۰ سال کی عمر میں اُس وقت سامنے آئی جب وہ کالج کے طالب علم تھے، اور اُسے منشی پریم چند کے مشورے اور تاثر پر شائع کیا گیا۔ سینٹرل کالج الٰہ آباد سے بی۔اے مکمّل کرنے کے بعد وہ ملک کی سیاست میں عملی طور پر شامل ہو گئے۔ ۱۹۲۰ میں اُنہیں گرفتار کیا گیا اور انہوں نے ۱۸ ماہ جیل میں گزارے۔ کچھ عرصے تک اُنہوں نے کانگریس پارٹی کے لیے کام کیا، لیکن آزادی کے بعد سیاست سے کنارہ کشی اِختیار کر لی۔ ۱۹۳۰ میں انہوں نے آگرہ یونیورسٹی سے انگریزی ادب میں ایم۔اے کا امتحان پاس کیا اور الٰہ آباد یونیورسٹی میں انگریزی کے لیکچرر مقرر ہو گئے۔ ان کی گھریلو زندگی ایک ناخوشگوار شادی اور بیٹے کی خودکشی کی وجہ سے کافی تلخ اور تکلیف دہ رہی۔ اُنہیں متعدد اعزازات سے نوازا گیا—۱۹۶۱ء میں ساہتیہ اکادمی ایوارڈ، ۱۹۶۸ء میں سوویت نہرو ایوارڈ، پدم بھوشن، اور گیان پیٹھ ایوارڈ، ۱۹۸۱ میں غالب ایوارڈ۔

            ۱

            یہ  سرگردانیاں  کب  تک  طوافِ  دربدر  کب  تک

            ترے  شوریدہ  سر  آخر  رہیں  شوریدہ  سر  کب  تک

             

            شاعر،  عاشق  یا  سالِک  اس  بے  مقصد  آوارہ  گردی  (سرگردانیاں)  اور  در  بدر  کے  طواف  کے  نہ  ختم  ہونے  والے  سِلسِلے  پر  سوال  اٹھاتا  ہے۔  ظاہری  سطح  پر  یہ  عاشقِ  شوریدہ  سر  کی  نامُراد  محبّت  اور  بے  لوث  دیوانگی  کی  بات  کرتا  ہے۔  صوفیانہ  مفہوم  میں  محبوب  کی  جگہ  خدا  یا  حقیقتِ  مطلق  لے  لیتی  ہے۔  اس  کے  علاوہ  یہ  عشق  کی  دیوانگی  سے  باہر  نکل  کر  معاشی  و  معاشرتی  مسائل  کا  سامنا  کرنے  کی  ایک  پکار  بھی  ہو  سکتی  ہے،  جو  ترقّی  پسند  مُصنّفین  کا  منشور  تھا۔

            ۲

            کسی  پر  مہرباں  ہوتے  ہیں  لیکن  یوں  نہیں  ہوتے

            سراسر  لطف  کے  پردے  میں  جورِ  سربسر  کب  تک

             

            وہ  مہربانی  جو  مُسلسِل  ظُلم  و  سِتم  (جورِ  سربسر)  کو  چھپائے،  کھلے  ظلم  سے  بھی  زیادہ  کڑی  ہوتی  ہے  کیونکہ  وہ  عاشق  سے  احتجاج  کا  حق  بھی  چھین  لیتی  ہے۔  یہ  شعر  ادھورے  اور  دکھاوے  کے  کرم  کی  منافقت  کو  بے  نقاب  کرتا  ہے  اور  پوچھتا  ہے  کہ  پردۂ  لطف  میں  چُھپی  یہ  سختی  آخر  کب  تک  مہربانی  کہلائے  گی۔  یہاں  مہربانی  کرنے  والا  اور  مظلوم،  محبوب  اور  عاشق  کے  علاوہ  جابر  سرکار  اور  مجبور  جنتا  بھی  ہو  سکتے  ہیں۔

            ۳

            اسیرانِ  ستم  نے  اور  ہی  کچھ  سوچ  رکّھا  ہے

            کریں  آخر  بسر  بھی  کرنے  والے  یوں  بسر  کب  تک

             

            اِنسانی  برداشت  کی  بھی  ایک  حد  ہوتی  ہے؛  ظالمانہ  حالات  میں  صرف  جیے  جانا  یا  وقت  کاٹنا  (بسر  کرنا)  ہمیشہ  نہیں  چل  سکتا۔  اِس  بغاوت  کی  پیشین  گوئی  کو  تحریکِ  آزادی  کے  تناظر  میں  اسے  ایک  سیاسی  پیغام  کے  طور  پر  بھی  دیکھا  جا  سکتا  ہے۔

            ۴

            ابھی  تو  بڑھتی  ہی  جاتی  ہے  بے  تابی  تشفّی  سے

            علاجِ  دردِ  دل  ہوتا  ہے  دیکھیں  کارگر  کب  تک

             

            یہاں  تسلّی  اور  تشفّی  کی  کوشش  اُلٹا  اثر  دکھاتی  ہے  اور  عاشق  کی  بے  تابی  کو  کم  کرنے  کے  بجائے  مزید  بڑھا  دیتی  ہے۔  شاعر  دل  کے  درد  کے  ظاہری  اور  سطحی  علاجوں  کو  شک  کی  نِگاہ  سے  دیکھتا  ہے  اور  سوال  کرتا  ہے  کہ  یہ  وقتی  تدبیریں  آخر  کب  تک۔  تشفّی  دینے  والا،  جھوٹے  وعدے  کرنے  والا  محبوب  یا  جابر  سرکار،  دونوں  ہی  ہو  سکتے  ہیں۔

            ۵

            نویدِ  طاقتِ  پرواز  لائی  حدّ  مجبوری

            ترے  بے  بال  و  پر  آخر  رہیں  بے  بال  و  پر  کب  تک

             

            پرندہ  پنجرے  میں  اِستعاراً  نادار  ناداری  میں  جکڑا  ہوا  ہے۔  نویدِ  طاقت  پرواز  ۔۔۔  رہائی  کی  خوشخبری  یا  خوشحالی  کے  جھوٹے  خواب  ۔۔۔  ملنے  پر  پرند/نادار  کو  احساس  ہوتا  ہے  کہ  بال  و  پر  تو  ہیں  ہی  نہیں،  خوشحالی  کے  اسباب  مہیّا  نہیں  ہیں۔  آخر  یہ  بے  بال  و  پری  کب  تک  رہے  گی۔

            ۶

            تری  تاثیرِ  پنہاں  کے  نِثار  اب  دیکھنا  یہ  ہے

            نگاہِ  مست  تیرے  بے  خبر  ہوں  باخبر  کب  تک

             

            محبوب  کی  نشیلی  نگاہ  (نگاہِ  مست)  کے  چُھپے  اثر  (تاثیرِ  پنہاں)  کے  جادو  میں  مبتلا  لوگ  آخر  کب  تک  اپنی  حالت  سے  بے  خبر  رہیں  گے۔  محبوب  کی  نِگاہِ  مست  جنّت  کی  خود  فریبی  یا  سرکار  کے  جھوٹے  وعدے  بھی  ہو  سکتے  ہیں۔

            ۷

            جمالستانِ  عالم  میں  بھی  کیا  عالم  نکلتا  ہے

            رہے  اِس  پردۂ  رنگیں  میں  حُسن  پردہ  در  کب  تک

             

            کائنات  کے  حُسن  (جمالستانِ  عالم)  یہ  عالم (حال)  ہوتا  ہے  کہ  ہم  اِس  کی  رنگینی  میں  کھو  جاتے  ہیں۔  حقیقی  حُسن  میں  خود  کو  ظاہر  کرنے  اور  پردہ  پھاڑنے  (پردہ  در—نہ  کہ  پردہ  دار)  کا  ایک  قدرتی  جذبہ  ہوتا  ہے؛  وہ  اس  دنیا  کے  ظاہری  اور  رنگین  پردوں  میں  ہمیشہ  چُھپا  نہیں  رہ  سکتا۔  سوال  یہ  ہے  کہ  حقیقی  یا  الٰہی  حُسن  آخر  کب  تک  اس  کائیناتی  حُسن  کے  رنگین  پردے  کے  پیچھے  خود  کو  چھپائے  رکھے  گا۔ یہاں  الٰہی  حُسن  سے  مُراد  اِشتراکیت  بھی  ہو  سکتا  ہے۔

            ۸

            نگاہِ  شوخ  تو  اِک  مبتدائے  بے  خبر  نکلی

            اُمید  و  بیم  کا  یہ  رنگ  قِصّہ  مختصر  کب  تک

             

            محبوب  کی  شوخ،  فتنہ  گر  نگاہ  اصل  میں  بے  نیازی  کے  ایک  سوچے  سمجھے  سِلسِلے  کی  شروعات  (مبتدائے  بے  خبر)  ثابت  ہوئی۔  یہ  عاشق  کو  پہلے  تو  نِگاہِ  شوخ  کی  جال  میں  پھنس  جاتا  ہے  اور  پھر  اُسے  مکمل  طور  پر  نظر  انداز  کر  دیا  جاتا  ہے۔  قصہ  مختصر،  عاشق  سے  آخر  کب  تک  یہ  امید  کی  جاتی  ہے  کہ  وہ  امید  و  بیم  (خوف  اور  ہراس  ۔  نِگاہِ  شوخ  اور  بے  خبری)  کے  اس  دردناک  جھولے  میں  یوں  ہی  لٹکتا  رہے؟  شوخیِ  نگاہ  حکومت  کی دھوکے  بازی  بھی  ہو  سکتی  ہے۔

            ۹

            حجابِ  حُسن  اگر  ہیں  جلوۂ  مہر  و  مہ  و  انجُم

            نظر  کو  روکے  رکھیں  ہم  بھی  تاحدّ  نظر  کب  تک

             

            کائنات  کی  تمام  تر  خوبصورتی  اور  چمک  دمک—سورج  (مہر)،  چاند  (مہ)  اور  ستارے  (انجم)—یہاں  محض  ایسے  پردے  (حجاب)  کے  طور  پر  پیش  کیے  گئے  ہیں  جو  حقیقی  حسنِ  کو  چھپاتے  یا  صرف  اُس  کا  عکس  دکھاتے  ہیں۔  عاشق  سوال  کرتا  ہے  کہ  انسانی  بصارت  اور  سوچ  آخر  کب  تک  صرف  ظاہری  حدوں  (تاحدِ  نظر)  تک  محدود  رہے  گی  اور  اس  کے  پار  دیکھنے  کی  کوشش  نہیں  کرے  گی۔

            ۱۰

            نظامِ  دہر  بدلے،  آسماں  بدلے،  زمیں  بدلے

            لیے  بیٹھا  رہے  کوئی  حیاتِ  بے  اثر  کب  تک

             

            بنیادی  اور  انقلابی  تبدیلی  کی  ایک  زوردار  پکار!  یہ  شعر  تقاضا  کرتا  ہے  کہ  جب  پورا  نظامِ  دنیا  (نظامِ  دہر)،  زمین  اور  آسمان  سب  بدل  رہے  ہوں،  تو  کوئی  فرد  بے  عمل  اور  سُست  کب  تک  بیٹھا  رہے۔  جب  اِرد  گِرد  کی  پوری  دنیا  بدل  رہی  ہو  تو  ایک  بے  مقصد،  بے  اثر  اور  جمود  کا  شکار  زندگی  (حیاتِ  بے  اثر)  کب  تک۔

            ۱۱

            یہ  آہِ  سرد  کیا  غافل  نگاہِ  گرم  پیدا  کر

            نہ  ہوگا  ہستیِ  افسُردہ  پر  آخر  اثر  کب  تک

             

            یہاں  غافل  وہ  ہیں  جو  اپنے  حقوق  سے  واقف  نہیں  ہیں  اور  اپنی  ناداری  کو  قسمت  کا  لکھا  سمجھ  کر  سرد  آہیں  بھرتے  ہیں۔  شاعر  آواز  دیتا  ہے  کہ  گرم  نگاہ  (اِنقلابی  انداز)  کا  وقت  ہے۔  آخر  اس  افسردہ  زندگی  کا  تجھ  پہ  کب  اثر  ہوگا،  کب  آنکھ  گرم  ہوگی۔

            ۱۲

            سکُوتِ  عِشق  میں  ہنگامہ  زارِ  زندگی  گُم  ہو

            کریں  رُودادِ  غم  ہائے  نہانی  مختصر  کب  تک

             

            “ہنگامہ  زار”  کا  مطلب  ہے  ہنگامے  اور  عمل  کا  میدان—جیسے  گلزار  پھولوں  کا  میدان  ہوتا  ہے۔  لہٰذا  “ہنگامہ  زارِ  زندگی”  سے  مُراد  عمل  اور  جدّوجہد  کی  زندگی  کا  میدان  ہے۔  کب  تک  یہ  میدان  عشق  کی  خاموشی،  جمود  اور  بے  عملی  (سکوتِ  عشق)  میں  کھویا  رہے  گا؟  اور  ہم  کب  تک  اپنے  اندرونی  درد  اور  چھپے  ہوئے  غموں  کی  کہانی  (رودادِ  غم  ہائے  نہانی)  کو  دبا  کر  یا  مختصر  کر  کے  بیان  کرتے  رہیں  گے؟  اس  کا  واضح  اشارہ  یہ  ہے  کہ  باہر  نکلو،  بیدار  ہو،  بولو،  اور  عشق  کے  جادو  اور  غفلت  سے  باہر  آؤ۔  یہ  شعر  (Progressive  Writers’  Association)    ترقی  پسند  مصنّفین  کے  نظریات  اور  پکار  کا  عین  مطابق  جواب  لگتا  ہے۔

            ۱۳

            فراقؔ  اندازِ  وحشت  اب  بدل  دیں  ہوش  میں  آئیں

            رہیں  ژولیدہ  مُو،  عاشفتہ  سر،  حیراں  نظر  کب  تک

             

            مقطع  میں  فراقؔ  براہِ  راست  اپنے  آپ  سے  مخاطب  ہیں  اور  کہتے  ہیں  کہ  اب  جنون  و  دیوانگی  کے  اس  پرانے  انداز  (اندازِ  وحشت)  کو  چھوڑ  کر  ہوش  و  حواس  میں  آنے  کا  وقت  آ  گیا  ہے۔  وہ  سوال  کرتے  ہیں  کہ  آخر  کب  تک  کوئی  روایتی  عاشق  کی  بدحال  شکل  دھارے  رکھے  گا—بکھرے  ہوئے  بال  (ژولیدہ  مو)،  پریشان  دماغ  (آشفۃ  سر)،  اور  ہکّابِکّا  نگاہ  (حیراں  نظر)  کے  ساتھ۔  یہ  شعر  وقت  کے  تقاضوں  اور  عملی  زندگی  کا  سامنا  کرنے  کی  دعوت  ہے۔

             

            बे-बाल-ओ-पर कब तक – रघुपती सहाए फ़िराक़ गोरखपूरी

            १

            ये सरगर्दानियाँ कब तक तवाफ़-ए दर-ब-दर कब तक

            तेरे शोरीदा-सर आख़िर रहें शोरीदा-सर कब तक

            २

            किसी पर मेहरबाँ होते हैं लेकिन यूँ नहीं होते

            सरासर लुत्फ़ के पर्दे में जौर-ए सर-ब-सर कब तक

            ३

            असीरान-ए सितम ने और ही कुछ सोच रक्खा है

            करें आख़िर बसर भी करने वाले यूँ बसर कब तक

            ४

            अभी तो बढ़ती ही जाती है बेताबी तशफ़्फ़ी से

            इलाज-ए दर्द-ए दिल होता है देखें कारगर कब तक

            ५

            नवीद-ए ताक़त-ए परवाज़ लाई हद-ए मज्बूरी

            तेरे बे-बाल-ओ-पर आख़िर रहें बे-बाल-ओ-पर कब तक

            ६

            तेरी तासीर-ए पिन्हाँ के निसार अब देखना ये है

            निगाह-ए मस्त तेरे बे-ख़बर हों बा-ख़बर कब तक

            ७

            जमालिस्तान-ए आलम में भी क्या आलम निकलता है

            रहे इस पर्दा-ए रंगीं में हुस्न-ए पर्दा-दर कब तक

            ८

            निगाह-ए शौक़ तो एक मुब्तदा-ए बे-ख़बर निकली

            उम्मीद-ओ-बीम का ये रंग क़िस्सा मुख़्तसर कब तक

            ९

            हिजाब-ए हुस्न अगर हैं जल्वा-ए महर-ओ-मह-ओ-अंजुम

            नज़र को रोके रखें हम भी ता-हद्द-ए नज़र कब तक

            १०

            निज़ाम-ए दहर बदले, आसमाँ बदले, ज़मीं बदले

            लिये बैठा रहे कोई हयात-ए बे-असर कब तक

            ११

            ये आह-ए सर्द क्या ग़ाफ़िल निगाह-ए गर्म पैदा कर

            न होगा हस्ती-ए अफ़्सुर्दा पर आख़िर असर कब तक

            १२

            सुकूत-ए इश्क़ में हंगामा-ज़ार-ए ज़िंदगी गुम हो

            करें रूदाद-ए ग़म-हा-ए नेहानी मुख़्तसर कब तक

            १३

            फ़िराक़ अंदाज़-ए वहशत अब बदल दें होश में आएँ

            रहें ज़्शौलीदा-मू, आशुफ़्ता-सर, हैराँ नज़र कब तक

             

            रघुपति सहाए फ़िराक़ गोरखपुरी (१८९६-१९८२) के पिता गोरख प्रसाद एक ज़मींदार और पेशे से वकील थे, जो ‘इब्रत’ तख़ल्लुस से शा’एरी भी करते थे। फ़िराक़ ने घर पर ही उर्दू और फ़ारसी की पढ़ाई की। उन की पहली ग़ज़ल २० साल की उम्र में तब रची गई जब वो कॉलेज के छात्र थे, और मुंशी प्रेमचंद के कहने पर प्रकाशित हुई। सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद से बी.ए. करने के बाद वो देश की राजनीति में सक्रिय हो गए। १९२० में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और उन्होंने १८ महीने जेल में बिताए। कुछ समय तक उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिये काम किया, लेकिन आज़ादी के बाद राजनीति छोड़ दी। १९३० में उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की परीक्षा पास की और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी के लेक्चरर बन गए। उन का घरेलू जीवन एक दुखद शादी और बेटे की आत्महत्या के कारण काफ़ी कष्टदायक रहा। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया—१९६१ में साहित्य अकादमी; १९६८ में सोवियत नेहरू पुरस्कार, पद्म भूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार; तथा १९८१ में ग़ालिब पुरस्कार।

            १

            ये सरगर्दानियाँ कब तक तवाफ़-ए दर-ब-दर कब तक

            तेरे शोरीदा-सर आख़िर रहें शोरीदा-सर कब तक

             

            कवि, प्रेमी या साधक इस बेमक़्सद भटकने (सरगर्दानियाँ) और दर-ब-दर चक्कर काटने के कभी न ख़त्म होने वाले सिलसिले पर सवाल उठाता है। बाहरी तौर पर ये प्रेमी की नाकाम मोहब्बत और दीवानगी की बात करता है। आध्यात्मिक (सूफ़ी) संदर्भ में प्रेमी की जगह ईश्वर या परम सत्य ले लेता है। इस के अलावा, ये इश्क़ के जुनून से बाहर निकल कर सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सामना करने की एक पुकार भी हो सकती है, जो प्रगतिशील लेखकों (Progressive Writers) का मुख्य विचार था।

            २

            किसी पर मेहरबाँ होते हैं लेकिन यूँ नहीं होते

            सरासर लुत्फ़ के पर्दे में जौर-ए सर-ब-सर कब तक

             

            वो मेहरबानी जो लगातार अत्याचार (जौर-ए सर-ब-सर) को छुपाती है, खुले ज़ुल्म से भी ज़्यादा कठोर होती है क्यूंके वो प्रेमी से विरोध करने का हक़ भी छीन लेती है। ये शे’र दिखावे और अधूरे करम की मक्कारी को बेनक़ाब करता है और पूछता है के दया के पर्दे में छुपी ये सख़्ती आख़िर कब तक मेहरबानी कहलाएगी। यहाँ मेहरबानी करने वाला और पीड़ित, प्रेमी और प्रेमिका के अलावा ज़ालिम सरकार और मज्बूर जनता भी हो सकते हैं।

            ३

            असीरान-ए सितम ने और ही कुछ सोच रक्खा है

            करें आख़िर बसर भी करने वाले यूँ बसर कब तक

             

            इंसान के सहने की भी एक सीमा होती है; ज़ालिम हालात में सिर्फ़ जीये जाना या समय काटना (बसर करना) हमेशा नहीं चल सकता। इस बग़ावत की भविष्यवाणी को स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है।

            ४

            अभी तो बढ़ती ही जाती है बेताबी तशफ़्फ़ी से

            इलाज-ए दर्द-ए दिल होता है देखें कारगर कब तक

             

            यहाँ दिलासा और सांत्वना देने की कोशिश उल्टा असर करती है और प्रेमी की बेचैनी को घटाने के बजाए और बढ़ा देती है। कवि दिल के दर्द के ऊपरी और सतही इलाज को शक की नज़र से देखता है और सवाल करता है के ये अस्थायी उपाय आख़िर कब तक चलेंगे। दिलासा देने वाला और झूठे वादे करने वाला—चाहे वो प्रेमिका हो या ज़ालिम सरकार—दोनों ही हो सकते हैं।

            ५

            नवीद-ए ताक़त-ए परवाज़ लाई हद-ए मज्बूरी

            तेरे बे-बाल-ओ-पर आख़िर रहें बे-बाल-ओ-पर कब तक

             

            एक परिंदा जो पिंजरे में बंद है, वो प्रतीकात्मक (symbolic) रूप से ग़रीबी में जकड़ा हुआ इंसान है। उड़ने की ताक़त की ख़बर (नवीद-ए ताक़त-ए परवाज़)—यानी रेहाई का समाचार या ख़ुशहाली के झूठे सपने—मिलने पर परिंदे या ग़रीब को एहसास होता है के उस के पास तो पंख ही नहीं हैं, यानी ख़ुशहाली के साधन मौजूद नहीं हैं। आख़िर ये बेबसी और लाचारी कब तक रहेगी?

            ६

            तेरी तासीर-ए पिन्हाँ के निसार अब देखना ये है

            निगाह-ए मस्त तेरे बे-ख़बर हों बा-ख़बर कब तक

             

            प्रेमिका की मदहोश करने वाली नज़र (निगाह-ए मस्त) के छुपे हुए असर (तासीर-ए पिन्हाँ) के जादू में बंधे लोग आख़िर कब तक अपनी हालत से बेख़बर रहेंगे? प्रेमिका की ये मदहोश नज़र, जन्नत के झूठे ख़्वाब या सरकार के झूठे वादे भी हो सकते हैं।

            ७

            जमालिस्तान-ए आलम में भी क्या आलम निकलता है

            रहे इस पर्दा-ए रंगीं में हुस्न-ए पर्दा-दर कब तक

             

            ब्रह्मांड की सुंदरता (जमालिस्तान-ए आलम) का ये हाल (आलम) होता है के हम उस की रंगीनी में खो जाते हैं। असली सुंदरता में ख़ुद को ज़ाहिर करने और पर्दा फ़ाड़ने (पर्दा-दर—ना के पर्दा-दार) की एक क़ुद्रती तड़प होती है; वो इस दुनिया के बाहरी और रंगीन पर्दों में हमेशा छुपी नहीं रह सकती। सवाल ये है के असली या ईश्वरीय सुंदरता आख़िर कब तक इस का’एनाती सुंदरता के रंगीन पर्दे के पीछे छुपी रहेगी। यहाँ ईश्वरीय सुंदरता से मतलब समाजवाद भी हो सकता है।

            ८

            निगाह-ए शोख़ तो एक मुब्तदा-ए बे-ख़बर निकली

            उम्मीद-ओ-बीम का ये रंग क़िस्सा मुख़्तसर कब तक

             

            प्रेमिका की चंचल और चुलबुली नज़र असल में बेरुख़ी के एक सोचे-समझे सिलसिले की शुरुआत (मुब्तदा-ए बे-ख़बर) साबित हुई। प्रेमी पहले तो उस की चंचल नज़र के जाल में फँस जाता है और फिर उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। बात संक्षेप में ये है के प्रेमी से कब तक ये उम्मीद की जाएगी के वो उम्मीद और डर (यानी चंचल नज़र और बेरुख़ी) के इस दर्दनाक झूले में यूँ ही लटकता रहेगा? नज़र की ये चंचलता सरकार की धोकेबाज़ी भी हो सकती है।

            ९

            हिजाब-ए हुस्न अगर हैं जल्वा-ए महर-ओ-मह-ओ-अंजुम

            नज़र को रोके रखें हम भी ता-हद्द-ए नज़र कब तक

             

            ब्रहमांड की पूरी ख़ूबसूरती और चमक-दमक—सूरज, चाँद और तारे—यहाँ केवल ऐसे पर्दे (हिजाब) के रूप में दिखाए गए हैं जो असली सुंदरता को छुपाते हैं या सिर्फ़ उस का अक्स दिखाते हैं। प्रेमी सवाल करता है के इंसान की नज़र और सोच आख़िर कब तक सिर्फ़ बाहरी सीमा (ता-हद्द-ए नज़र) तक रुकी रहेगी और उस के पार देखने की कोशिश नहीं करेगी।

            १०

            निज़ाम-ए दहर बदले, आसमाँ बदले, ज़मीं बदले

            लिये बैठा रहे कोई हयात-ए बे-असर कब तक

             

            क्रांतिकारी बदलाव की एक ज़ोरदार पुकार! ये शे’र माँग करता है के जब पूरी दुनिया का ढाँचा (निज़ाम-ए दहर), ज़मीन और आसमान सब बदल रहे हों, तो कोई इंसान कब तक बेकार और सुस्त बैठा रहे? जब आसपास की पूरी दुनिया बदल रही हो, तो एक बेमक़्सद, बेअसर और ठहरी हुई ज़िंदगी आख़िर कब तक जी जाएगी?

            ११

            ये आह-ए सर्द क्या ग़ाफ़िल निगाह-ए गर्म पैदा कर

            न होगा हस्ती-ए अफ़्सुर्दा पर आख़िर असर कब तक

             

            यहाँ ‘ग़ाफ़िल’ वो लोग हैं जो अपने हक़ को नहीं जानते और अपनी ग़रीबी को क़िस्मत का लिखा मान कर ठंडी आहें भरते हैं। कवि पुकारता है के अब गर्म नज़र (क्रांतिकारी सोच) का समय आ गया है। आख़िर इस बुझी हुई ज़िंदगी का तुझ पर कब असर होगा, कब तेरी आँखें खुलेंगी और उन में तेवर आएँगे?

            १२

            सुकूत-ए इश्क़ में हंगामा-ज़ार-ए ज़िंदगी गुम हो

            करें रूदाद-ए ग़म-हा-ए नेहानी मुख़्तसर कब तक

             

            ‘हंगामा-ज़ार’ का मतलब है हलचल और काम का मैदान—जैसे ‘गुलज़ार’ फूलों का मैदान होता है। इस लिये ‘हंगामा-ज़ार-ए ज़िंदगी’ से मतलब है संघर्ष और काम से भरी ज़िंदगी का मैदान। कब तक ये मैदान इश्क़ की ख़ामोशी, ठहराव और सुस्ती (सुकूत-ए इश्क़) में खोया रहेगा? और हम कब तक अपने अंदरूनी दर्द की कहानी को दबाकर या छोटा कर के बताते रहेंगे? इस का साफ़ इशारा है के बाहर निकलो, जागो, बोलो, और इश्क़ के जादू और सुस्ती से बाहर आओ। यह शे’र प्रगतिशील लेखकों (Progressive Writers’ Association) के विचारों और पुकार का जवाब लगता है।

            १३

            फ़िराक़ अंदाज़-ए वोशत अब बदल दें होश में आएँ

            रहें ज़्शौलीदा-मू, आशुफ़्ता-सर, हैराँ नज़र कब तक

             

            मक़्ते में फ़िराक़ ख़ुद से सीधे बात करते हैं और कहते हैं के अब दीवानगी के इस पुराने अंदाज़ को छोड़कर होश में आने का समय आ गया है। वो सवाल करते हैं के आख़िर कब तक कोई पारंपरिक प्रेमी का बुरा हाल बनाए रखेगा—बिखरे हुए बाल, परेशान दिमाग़ और हैरान-परेशान नज़रों के साथ। यह शे’र समय की ज़रूरतों और व्यावहारिक ज़िंदगी का सामना करने का न्योता है।

             

            be-baal-o-par kab tak – raghupati sahaa’e firaaq gorakhpuri

            1
            ye sar-gardaaniyaaN kab tak tavaaf-e dar-ba-dar kab tak
            ter’e shoriida-sar aaKhir rah’eN shoriida-sar kab tak
            2
            kisi par meharbaaN hot’e haiN lekin yuN nahiN hot’e
            saraasar lutf ke pard’e m’eN jaur-e sar-ba-sar kab tak
            3
            asiiraaN-e sitam ne aur hi kuchh soch rakkha hai
            kar’eN aaKhir basar bhi karn’e vaal’e yuN basar kab tak
            4
            abhi t’o baRhti hi jaati hai betaabi tashaffi se
            ilaaj-e dard-e dil hota hai dekh’eN kaargar kab tak
            5
            naviid-e taaqat-e parvaaz laa’ii hadd-e majboori
            ter’e be-baal-o-par aaKhir rah’eN be-baal-o-par kab tak
            6
            terii taasiir-e pinhaaN ke nisaar ab dekhna yeh hai
            nigaah-e mast ter’e be-Khabar hoN baa-Khabar kab tak
            7
            jamaalistaan-e aalam m’eN bhi kya aalam nikalta hai
            rah’e is parda-e raNgiiN m’eN husn-e parda-dar kab tak
            8
            nigaah-e shoKh to ek mubtada-e be-Khabar nikli
            umiid-o-biim ka yeh raNg qissa muKhtasar kab tak
            9
            hijaab-e husn agar haiN jalva-e mahr-o-mah-o-anjum
            nazar ko rok’e rakh’eN hum bhi taa-hadd-e nazar kab tak
            10
            nizaam-e dahr badl’e, aasmaaN badl’e, zamiiN badl’e
            liy’e baiTha rah’e koii hayaat-e be-asar kab tak
            11
            yeh aah-e sard kya Ghaafil nigaah-e garm paida kar
            na hoga hasti-e afsurda par aaKhir asar kab tak
            12
            sukoot-e ishq m’eN haNgaama-zaar-e zindagi gum ho
            kar’eN roodaad-e Gham-haa-e n’ehaani muKhtasar kab tak
            13
            firaaq andaaz-e vahshat ab badal d’eN hosh m’eN aa’eN
            rah’eN zshouliida-muu, aashufta-sar, hairaaN nazar kab tak

            raghupati sahaa’e firaaq gorakhpuri (1896-1982). His father gorakh prasaad was a landlord and practiced law and was a poet using the taKhallus ibrat. firaaq studied urdu and faarsi at home.  His first Ghazal was composed at the age of 20, when he was college student, and published at the urging of munshi premchand.  After his BA from Central College Allahabad he became involved in the country’s politics. He was arrested in 1920 and spent 18 months in prison. He worked for some time for the Congress party but after independence, discontinued politics.  In 1930, he passed the MA examination in English Literature from Agra University and became a lecturer in English in Allahabad University.  His domestic life was troubled with a bad marriage and suicide of his son.  He received multiple awards – 1961, sahitya akademi; 1968, Soviet Nehru, padma bhushan, gyaan piiTh; 1981 Ghalib award.

            1
            ye sar-gardaaniyaaN1 kab tak tavaaf2-e dar-ba-dar3 kab tak
            ter’e shoriida-sar4 aaKhir rah’eN shoriida-sar kab tak

            1.aimless wandering 2.circling around 3.door to door 4.distracted, obsessed

            The poet, lover, or seeker questions the endless cycle of aimless wandering (sar-gardaaniyaaN) and circling door-to-door. On a surface level, this speaks to the unrequited love and selfless madness of the distraught lover. In a mystical (suufi) sense, the beloved is replaced by god or absolute truth. Furthermore, this can also be a call to step out of the madness of romantic passion and face socio-economic issues, which formed the manifesto of the Progressive Writers’ Movement.

            2
            kisi par meharbaaN1 hot’e haiN lekin yuN nahiN hot’e
            saraasar2 lutf3 ke pard’e4 m’eN jaur5-e sar-ba-sar6 kab tak

            1.kind 2.head to toe 3.favour 4.disguised as, deceptive 5.cruelty 6.continuous

            A kindness that continually masks tyranny and oppression (jaur-e sar-ba-sar) is harsher than open cruelty, because it strips the lover of even the right to protest. This couplet unmasks the hypocrisy of superficial, deceptive favour, asking how long this hidden harshness under the veil of kindness will continue to pass for affection. Here, the benefactor and the oppressed need not only be the beloved and the lover; they can also represent an oppressive government and a helpless populace.

            3
            asiiraaN1-e sitam ne aur hi kuchh soch rakkha hai
            kar’eN aaKhir basar2 bhi karn’e vaal’e yuN basar kab tak

            1.captives 2.live, spend life, just get by

            Human endurance has its limits; merely surviving or “getting by” (basar karna) under tyrannical conditions cannot go on forever. This prediction of rebellion can also be viewed as a political message within the context of the freedom struggle.

            4
            abhi t’o baRhti hi jaati hai betaabi1 tashaffi2 se
            ilaaj3-e dard-e dil hota hai dekh’eN kaargar4 kab tak

            1.restlessness, pain 2.solace, consolation 3.healing 4.effective

            Here, the attempt to offer solace and consolation backfires, heightening the lover’s agitation instead of easing it. The poet views superficial and temporary remedies for the heart’s pain with skepticism, asking how long these fleeting measures will last. The one offering false solace could be either a deceptive beloved, the orthodoxy or an oppressive government.

            5
            naviid1-e taaqat2-e parvaaz3 laa’ii hadd4-e majbuuri5
            ter’e be-baal-o-par6 aaKhir rah’eN be-baal-o-par kab tak

            1.good news 2.strength 3.flight 4.limit 5.helplessness 6.feathers and wings

            The bird trapped in a cage is a metaphor for a person bound by poverty. Upon receiving news of the ability to fly (naviid-e taaqat-e parvaaz)—representing promises of liberation or false dreams of prosperity—the bird or poor individual realizes that they lack wings altogether, meaning the means for prosperity are absent. How long will this state of winglessness and helplessness persist?

            6
            terii taasiir1-e pinhaaN2 ke nisaar3 ab dekhna yeh hai
            nigaah-e-mast4 ter’e be-Khabar5 hoN baa-Khabar6 kab tak

            1.effect 2.hidden, secret 3.sacrifice (used sarcastically) 4.intoxicating glance 5.unaware, deceived 6.aware, wiser

            How long will those under the spell of the beloved’s intoxicating glance (nigaah-e mast) and its hidden effect (taasiir-e pinhaaN) remain oblivious to their true condition? taasiir-e pinhaaN ke nisaar is said in sarcasm. The beloved’s intoxicating glance could also represent the self-deception of a promised paradise or the false promises of the government.

            7
            jamaalistaan1-e aalam2 m’eN bhi kya aalam3 nikalta hai
            rah’e is parda-e raNgiiN m’eN husn4-e parda-dar5 kab tak

            1.abode of beauty 2.world, cosmos 3.condition, status 4.beauty 5.one who tears the veil

            Such is the state (aalam) of cosmic beauty (jamaalistaan-e aalam) that we get lost in its colourful splendor. Yet, essential beauty possesses an inherent drive to reveal itself and tear away the veil (parda-dar, not parda-daar); it cannot remain hidden forever behind the worldly, colorful veils. The question is: how long will essential or divine beauty stay concealed behind this colorful cosmic veil? Here, “divine beauty” can also be interpreted as a metaphor for socialism.

            8
            nigaah-e-shoKh1 to ek mubtada2-e be-Khabar3 nikli
            umiid-o-biim4 ka yeh raNg5 qissa muKhtasar6 kab tak

            1.playful glance 2.beginning 3.unknown, surprising 4.hope and fear 5.style 6.to cut a long story short

            The beloved’s playful, flirtatious glance nigaah-e shoKh turned out to be merely the calculated beginning of a pattern of indifference (mubtada-e be-Khabar). The lover is first ensnared by the playful glance, only to be completely ignored afterward. Long story short, how long is the lover expected to remain suspended in this painful pendulum between hope and fear (that is, between the flirtatious glance and total indifference)? This playful glance could also symbolize the deceitful tactics of the ruling authority.

            9
            hijaab1-e husn2 agar haiN jalva3-e mahr-o-mah-o-anjum4
            nazar5 ko rok’e rakh’eN hum bhi taa-hadd6-e nazar kab tak

            1.veiling, hiding 2.beauty 3.manifestation, glory 4.sun, moon and stars 5.sight 6.to the limit

            All the splendor and brightness of the cosmos-sun (mahr), moon (mah), and stars (anjum)-are presented here merely as veils (hijaab) that hide essential beauty or merely reflect it. The lover asks how long human vision and thought will remain restricted within sensory limits (taa-hadd-e nazar) without attempting to look beyond them.

            10
            nizaam-e-dahr1 badl’e, aasmaaN badl’e, zamiiN badl’e
            liy’e baiTha rah’e koii hayaat2-e be-asar3 kab tak

            1.world order 2.life 3.ineffective, meaningless

            A powerful call for revolutionary change! This couplet demands to know: when the entire order of the world (nizaam-e dahr), earth, and sky are changing, how long can an individual remain passive and idle? While the entire world shifts around us, how long can one endure a purposeless, ineffective, and stagnant existence?

            11
            yeh aah-e-sard1 kya Ghaafil2 nigaah-e-garm3 paida kar
            na hoga hasti4-e afsurda5 par aaKhir asar6 kab tak

            1.cold/sad sigh 2.negligent, indifferent 3.warm/eager sight 4.existence 5.sad 6.effect

            Here, the “heedless ones” (Ghaafil) are those who are unaware of their rights and merely heave cold sighs (aah-e sard), accepting their deprivation as fate. The poet calls out that it is time for a fiery, passionate outlook (nigaah-e garm / revolutionary stance). How long will it take for this gloomy existence to affect you, and when will your eyes ignite with purpose?

            12
            sukoot1-e ishq m’eN haNgaama-zaar2-e zindagi gum ho
            kar’eN roodaad3-e Gham-haa4-e nehaani5 muKhtasar6 kab tak

            1.silence, stillness 2.tumultous domain 3.story 4.sorrows 5.hidden 6.brief

            haNgaama-zaar refers to an arena of activity and turmoil—just as gulzaar is a field of flowers. Thus, haNgaama-zaar-e zindagi signifies the active arena of struggle and human effort. How long will this arena remain lost in the silence, stagnation, and passivity of love (sukoot-e ishq)? And how long will we keep suppressing or shortening the narrative of our inner pain? The clear call is to step out, awaken, speak up, and break free from the stupor and spell of romantic passion. This couplet aligns directly with the ideology and call of the Progressive Writers’ Association.

            13
            firaaq1 andaaz2-e vahshat3 ab badal4 d’eN hosh5 m’eN aa’eN
            rah’eN zshouliida-muu6, aashufta-sar7, hairaaN-nazar8 kab tak

            1.pen-name 2.style, manner 3.madness 4.change, modify 5.senses 6.tousled hair 7.distracted, confused 8.puzzled gaze

            In the maqta, firaaq addresses himself directly, stating that it is time to abandon the old style of madness (andaaz-e vahshat) and return to sobriety. He asks how long one can maintain the traditional archetype of the disheveled lover—with matted hair (zshouliida-muu), a distracted mind (aashufta-sar), and a dazed gaze (hairaan nazar). This verse is an invitation to face the demands of the times and engage with practical life.

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            4 min
          • niyaaz-mandi kab tak-faani badayuni

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            Recitation

            • اُردو
            • تشریح
            • देवनागरी
            • व्याख्या
            • Roman
            • Explanation
            • نیاز  مندی  کب  تک  ۔  فانیؔ  بدایونی

              ۱

              اے  دل  یہ  تری  حوصلہ  مندی  کب  تک

              اس  بزم  میں  خدمتِ  سِپندی  کب  تک

              ۲

              منزل  سے  غرض  راہ  بلا  سے  کچھ  ہو

              اندازۂ  پستی  اور  بلندی  کب  تک

              ۳

              لا  کام  میں  جذبۂ  خودی  کو  بھی  کبھی

              یہ  شیوۂ  عجز  و  مستمندی  کب  تک

              ۴

              کب  تک  میری  سمت  بے  نیازانہ  نگاہ

              اے  حسن  یہ  وضعِ  خود  پسندی  کب  تک

              ۵

              آخر  یہ  جنابِ  عشق  کی  خِدمت  میں

              فانیؔ  شرفِ  نیاز  مندی  کب  تک

               

              محمد شوکت علی خان فانیؔ بدایونی (۱۸۷۹-۱۹۴۱) نے ۱۹۰۱ میں بی اے اور ۱۹۰۸ میں قانون کی پڑھائی پوری کی۔ ان کی وکالت کچھ خاص نہیں چلی، پہلے بدایوں اور پھر آگرہ میں اُنہوں نے کوشش کی پر کام جم نہیں پایا۔ ۱۹۳۲ تک وہ ایک مانے ہوئے شاعر بن چکے تھے، اسی لیے مہاراجہ کشن پرشاد نے انہیں حیدرآباد بلایا اور ایک نامی گرامی اسکول میں پرنسپل کی نوکری دے دی۔ لیکن شراب کی عادت ان کے لیے ایک بڑی مصیبت بن گئی، جس کی وجہ سے ۱۹۳۹ میں انہیں نوکری سے نکال دیا گیا۔ ان کا آخری وقت بہت بے بسی اور غریبی میں گزرا اور اسی حال میں ان کا انتقال ہوا۔ ان کی شروعاتی شاعری کا ایک بڑا حصہ بھی ضائع ہو گیا۔

              ۱

              اے  دل  یہ  تری  حوصلہ  مندی  کب  تک

              اس  بزم  میں  خدمتِ  سِپندی  کب  تک

               

              شاعر  اپنے  ہی  دل  سے  سوال  کر  رہا  ہے،  اور  پوچھ  رہا  ہے  کہ  آخر  کب  تک  یہ  اس  طرح  کا  ضدی  صبر  اور  برداشت  دکھاتا  رہے  گا۔  وہ  اس  دنیا  (یا  محبوب)  کی  محفل  (بزم)  میں  اپنے  وجود  کو  سِپند  (حرمل  کے  بیج  جو  نظرِ  بد  اُتارنے  کے  لیے  آگ  پر  ڈالے  جاتے  ہیں)  سے  تشبیہ  دے  رہا  ہے،  اور  پوچھ  رہا  ہے  کہ  اسے  محبوب  کی  خدمت  کی  خاطر  کب  تک  اسی  طرح  جلتے  اور  تڑکتے  رہنا  پڑے  گا۔

              ۲

              منزل  سے  غرض  راہ  بلا  سے  کچھ  ہو

              اندازۂ  پستی  اور  بلندی  کب  تک

               

              یہ  شعر  سفر  کی  مشقّتوں  کے  بجائے  آخری  منزل  پر  توجہ  مرکوز  کرتا  ہے۔  شاعر  اس  بات  پر  زور  دیتا  ہے  کہ  انسان  کی  واحد  توجہ  صرف  اپنے  مقصد  پر  ہونی  چاہیے،  چاہے  راستہ  کتنا  ہی  مصیبتوں  بھرا  (بلا)  کیوں  نہ  ہو،  اور  وہ  سوال  اُٹھاتا  ہے  کہ  ہم  زندگی  کے  سطحی  نشیب  (پستی)  اور  فراز  (بلندی)  کو  ناپنے  میں  کیوں  اپنا  وقت  ضائع  کرتے  ہیں۔

              ۳

              لا  کام  میں  جذبۂ  خودی  کو  بھی  کبھی

              یہ  شیوۂ  عجز  و  مستمندی  کب  تک

               

              شاعر  کم  از  کم  ایک  بار  اپنی  خود  داری  اور  غیرت  (خودی)  کے  جذبے  کو  عمل  میں  لانے  کی  ترغیب  دے  رہا  ہے۔  وہ  مستقل  عاجزی  (عجز)  اور  بے  بسی  کی  التجاؤں  (مستمندی)  کی  اس  جھکنے  والی  عادت  کو  چیلنج  کرتا  ہے،  اور  یہ  اشارہ  دیتا  ہے  کہ  حد  سے  زیادہ  عاجزی  کی  بھی  ایک  حد  ہوتی  ہے۔

              ۴

              کب  تک  میری  سمت  بے  نیازانہ  نگاہ

              اے  حسن  یہ  وضعِ  خود  پسندی  کب  تک

               

              حسن  کو  ایک  مجسم  روپ  میں  مخاطب  کرتے  ہوئے،  شاعر  پوچھتا  ہے  کہ  وہ  آخر  کب  تک  اس  کی  طرف  ایسی  سرد،  بے  پرواہ  اور  بے  رخی  والی  نظروں  (بے  نیازانہ  نگاہ)  سے  دیکھتا  رہے  گا۔  وہ  سوال  کرتا  ہے  کہ  محبوب  کب  تک  اپنی  ذات  کی  تعریف  کرنے  کے  اس  خود  پسندانہ  رویے  (وضعِ  خود  پسندی)  کو  برقرار  رکھے  گا۔

              ۵

              آخر  یہ  جنابِ  عشق  کی  خِدمت  میں

              فانیؔ  شرفِ  نیاز  مندی  کب  تک

               

              آخری  مقطع  میں  فانیؔ  اپنے  آپ  سے  مخاطب  ہیں۔  وہ  پوچھتے  ہیں  کہ  اُنہیں  آخر  کب  تک  عشق  کے  دربار  (جنابِ  عشق)  میں  خدمت  گزاری  کرتے  رہنا  پڑے  گا،  اور  سوچتے  ہیں  کہ  مستقل  عقیدت  اور  غیر  مشروط  تسلیم  و  رضا  کا  یہ  نام  نہاد  “اعزاز”  (شرفِ  نیاز  مندی)  آخر  کب  ختم  ہوگا۔

               

              नियाज़ मंदी कब तक – फ़ानी बदायूँनी

              १

              अए दिल ये तेरी हौसला-मंदी कब तक

              इस बज़्म में ख़िदमत-ए सिपंदी कब तक

              २

              मंज़िल से ग़रज़ राह बला से कुछ हो

              अंदाज़ा-ए पस्ती ओ बुलंदी कब तक

              ३

              ला काम में जज़्बा-ए ख़ुदी को भी कभी

              ये शेवा-ए इज्ज़ ओ मुस्तमंदी कब तक

              ४

              कब तक मेरी सिम्त बे-नियाज़ाना निगाह

              अए हुस्न ये वज़’-ए ख़ुद-पसंदी कब तक

              ५

              आख़िर ये जनाब-ए इश्क़ की ख़िदमत में

              फ़ानी शरफ़-ए नियाज़-मंदी कब तक

               

              मोहम्मद शौकत अली ख़ान फ़ानी बदायूनी (१८७९-१९४१) ने १९०१ में बी-ए और १९०८ में वकालत की पढ़ाई पूरी की। उन की वकालत कुछ ख़ास नहीं चली, पहले बदायूँ और फिर आगरा में उन्होंने कोशिश की पर काम जम नहीं पाया। १९३२ तक वो एक जाने-माने शा’एर बन चुके थे, इसीलिए महाराजा किशन प्रसाद ने उन्हें में हैदराबाद बुलाया और एक नामी स्कूल में प्रिंसिपल की नौकरी दे दी। लेकिन शराब की आदत उन के लिये एक बड़ी मुसीबत बन गई, जिस की वजह से १९३९ में उन्हें नौकरी से हटा दिया गया। उन का आख़िर वक़्त बहुत बेबसी और ग़रीबी में बीता और इसी हाल में उन का इंतक़ाल हुआ। उन की शुरुआती शा’एरी का एक बड़ा हिस्सा भी खो गया।

              १

              अए दिल ये तेरी हौसला-मंदी कब तक

              इस बज़्म में ख़िदमत-ए सिपंदी कब तक

               

              शा’एर अपने ही दिल से सवाल कर रहा है के आख़िर कब तक तुम इस तरह का ज़िद्दी सब्र और बर्दाश्त दिखाते रहोगे। वो इस दुनिया (या महबूब) की महफ़िल (बज़्म) में अपने वुजूद की तुलना ‘सिपंद’ (हरमल के बीज जो नज़र उतारने के लिये आग में डाले जाते हैं) से कर रहा है, और पूछ रहा है के महबूब की ख़िदमत के लिये तुम्हें कब तक इसी तरह जलते और सुलगते रहना पड़ेगा।

              २

              मंज़िल से ग़रज़ राह बला से कुछ हो

              अंदाज़ा-ए पस्ती ओ बुलंदी कब तक

               

              ये शे’र सफ़र की मुश्किलों के बजाय सिर्फ़ आख़िरी मंज़िल पर ध्यान लगाने की बात करता है। शा’एर का कहना है के इंसान का पूरा ध्यान सिर्फ़ अपने मक़्सद पर होना चाहिए, चाहे रास्ता कितना ही मुसीबतों (बला) से भरा क्यूं न हो। वो सवाल करता है के हम ज़िंदगी के मामूली उतार (पस्ती) और चढ़ाव (बुलंदी) को मापने में अपना वक़्त क्यूं ज़ा’ए करते हैं।

              ३

              ला काम में जज़्बा-ए ख़ुदी को भी कभी

              ये शेवा-ए इज्ज़ ओ मुस्तमंदी कब तक

               

              शा’एर शह दे रहा है के कम से कम एक बार अपनी ख़ुद्दारी और आत्मसम्मान (ख़ुदी) के जज़्बे को इस्तेमाल में लाओ। वो लगातार लाचारी (इज़्च) और बेबसी की मिन्नतें (मुस्तमंदी) करने की इस झुकने वाली आदत को चुन्नौती देता है, और इशारा करता है के हद से ज़्यादा आजेज़ी (विनम्रता) की भी एक सीमा होती है।

              ४

              कब तक मेरी सिम्त बे-नियाज़ाना निगाह

              अए हुस्न ये वज़’-ए ख़ुद-पसंदी कब तक

               

              ख़ूबसूरती (हुस्न) को एक रूपक की तरह सामने रखकर शा’एर पूछता है के तुम (प्रेमिका) आख़िर कब तक मेरी तरफ़ ऐसी ठंडी, बेरुख़ और लापरवाह नज़रों (बे-नियाज़ाना निगाह) से देखते रहोगे। वो सवाल करता है के महबूब कब तक अपनी ही तारीफ़ में डूबे रहने के इस घमंडी रवय्ये (वज़-ए ख़ुद-पसंदी) को बनाए रखेगा।

              ५

              आख़िर ये जनाब-ए इश्क़ की ख़िदमत में

              फ़ानी शरफ़-ए नियाज़-मंदी कब तक

               

              आख़िरी मक़्ते में फ़ानी ख़ुद को संबोधित कर रहे हैं।  वो पूछते हैं के उन्हें आख़िर कब तक इश्क़ के दरबार (जनाब-ए इश्क़) में ग़ुलामी या ख़िदमत करनी पड़ेगी, और सोचते हैं के लगातार वफ़ादारी और बिना शर्त आत्मसमर्पण करने का ये (so called) “सम्मान” (शरफ़-ए नियाज़-मंदी) आख़िर कब ख़त्म होगा।

               

              niyaaz-mandi kab tak – faani badayuni

              1
              aye dil yeh teri hausla-mandi kab tak
              iss bazm meN Khidmat-e sipandi kab tak
              2
              manzil se Gharaz raah bala se kuchh ho
              andaaza-e pasti o bulandi kab tak
              3
              la kaam meN jazba-e Khudi ko bhi kabhi
              yeh sheva-e ijz o mustamandi kab tak
              4
              kab tak meri simt be-niyaazaana nigaah
              aye husn yeh vaz’-e Khud-pasandi kab tak
              5
              aaKhir yeh janaab-e ishq ki Khidmat meN
              faani sharaf-e niyaaz-mandi kab tak

              mohammed shaukat ali KhaaN faani badayuni (1879-1941), BA 1901, law 1908.  He had a stumbling law practice, first in badayun and then in agra.  By 1932 he must have been a well recognized poet because he was invited to hyderabad by maharaja kishan parshaad, and offered a job as the principal of a reputed school.  Alcohol proved to be a big problem and his employment was terminated in 1939.  He died forlorn and destitute.  Much of his earlier work was lost.

              1
              aye dil yeh teri hausla-mandi1 kab tak
              iss bazm2 meN Khidmat3-e sipandi4 kab tak

              1.sustaining courage/patience 2.gathering 3.servitude 4.burning and crackling

              The poet questions his own heart, asking how long it will display such stubborn patience and endurance (hausla-mandi). He compares his existence in the gathering (bazm) of this world (or the beloved) to sipand (wild rue seeds thrown on fire to ward off the evil eye), asking how long he must keep burning and crackling just to protect and serve the beloved.

              2
              manzil se Gharaz1 raah bala2 se kuchh ho
              andaaza3-e pasti4 o bulandi5 kab tak

              1.concern 2.don’t care 3.estimate, measure 4.low 5.high

              This couplet focuses on the ultimate destination (manzil) rather than the hardships of the journey. The poet urges that one’s sole focus should be the goal, regardless of what kind of path you take.   bala se kuchh ho means that the nature of the the path is not important (the destination is). He is questioning why we waste time measuring life’s superficial lows (pasti) and highs (bulandi).

              3
              laa kaam1 meN jazba2-e Khudi3 ko bhi kabhi
              yeh sheva4-e ijz5 o mustamandi6 kab tak

              1.bring to use 2.emotion 3.self-respect 4.nature, habit 5.helplessness 6.begging, pleading

              The poet encourages bringing the spirit of selfhood and dignity (Khudi) into action for once. He challenges the submissive habit of constant helplessness (ijz) and desperate pleading (mustamandi), suggesting that absolute humility has its limits.

              4
              kab tak meri simt1 be-niyaazaana2 nigaah3
              aye husn4 yeh vaz’5-e Khud-pasandi6 kab tak

              1.direction, towards 2.heedless, indifferent 3.glance 4.beauty, beloved 5.style, attitude 6.self-love

              Addressing the personification of Beauty (husn), the poet asks how long it will look toward him with such cold, indifferent, and detached glances (be-niyaazaana nigaah). He questions how long the beloved will maintain this narcissistic attitude of self-admiration (Khud-pasandi).

              5
              aaKhir yeh janaab1-e ishq ki Khidmat2 meN
              faani3 sharaf4-e niyaaz-mandi5 kab tak

              1.presence, court 2.service 3.pen-name 4.privelege, honour 5.servitude, submission

              In the concluding signature couplet (maqta), faani addresses himself. He asks how long he must continue to serve in the court of Love (janaab-e ishq), wondering when this so-called “honour” of endless devotion and unconditional surrender (sharaf-e niyaaz-mandi) will finally come to an end.

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            • garmi-e baazaar-e saamiri kab tak-josh malihabadi

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              Recitation

              • اُردو
              • تشریح
              • देवनागरी
              • व्याख्या
              • Roman
              • Explanation
              • گرمیِ  بازارِ  سامری  کب  تک  ۔  جوشؔ  ملیح  آبادی

                ۱

                سِتم  شعار  یہ  اندازِ  ساحری  کب  تک

                رہے  گی  گرمیِ  بازارِ  سامری  کب  تک

                ۲

                یہ  درسِ  امن  کی  ابلہ  فریبیاں  تاچند

                یہ  اشتہارِ  کرم  کی  فسوں  گری  کب  تک

                ۳

                یہ  بزمِ  عیش  بہ  آہنگِ  خسروی  تاکے

                یہ  سازِ  کیف  یہ  گلباںگِ  قیصری  کب  تک

                ۴

                یہ  فرّ  کنگرۂ  قصرِ  برتری  تاچند

                یہ  رعبِ  طُرّۂ  دستارِ  سروری  کب  تک

                ۵

                یہ  کافرانہ  نگاہِ  خدا  رسی  تاکے

                یہ  بزدلانہ  ادائے  سپہ  گری  کب  تک

                ۶

                یہ  طنطنے  یہ  تحکُّم  یہ  دبدبے  تاچند

                یہ  نادری،  یہ  خدائی،  یہ  قاہری  کب  تک

                ۷

                یہ  شغلِ  ظلم  یہ  آئینِ  دل  دہی  تا  کے

                یہ  مشقِ  جور  یہ  اندازِ  دلبری  کب  تک

                ۸

                یہ  چیرہ  دستیِ  تثلیثِ  ناروا  تاچند

                یہ  فتنہ  خیزیِ  توحیدِ  آذری  کب  تک

                ۹

                یہ  شیطنت  میں  نمودِ  پیمبری  تاکے

                پیمبری  میں  یہ  اندازِ  داوری  کب  تک

                ۱۰

                ٹھہر  کہ  چرخ  نئی  چال  چلنے  والا  ہے

                سنبھل  سنبھل  کہ  زمانہ  بدلنے  والا  ہے

                 

                جوشؔ ملیح آبادی (۱۸۹۸-۱۹۸۲) – ملیح آباد، آگرہ، لکھنؤ، حیدرآباد، دہلی، کراچی۔ انہیں ‘شاعرِ انقلاب’ کہا جاتا ہے۔ وہ اپنی تحریروں میں شدید سیکولر اور قوم پرست ہیں اور قدامت پسندی کے خلاف بغاوت کرتے ہیں۔ ان کا دائرۂ زبان اور الفاظ کا ذخیرہ حیرت انگیز ہے۔ انہوں نے صبح کی خوبصورتی کے بارے میں کثرت سے لکھا ہے۔ صبح کے حسن پر مبنی ان کی نظموں، غزلوں اور رباعیات کے مجموعے تک شاعر کے نام کے تحت اور موضوعاتی انڈیکس (Theme Index) ‘جلوۂ سحر’ دونوں کے ذریعے رسائی حاصل کی جا سکتی ہے۔ وہ جواہر لال نہرو کے ذاتی دوست تھے اور ان کے مشورے و فہمائش کے برعکس ۱۹۵۲ میں پاکستان ہجرت کر گئے، جس پر انہوں نے بعد میں شدید افسوس کیا۔

                ۱

                سِتم  شعار  یہ  اندازِ  ساحری  کب  تک

                رہے  گی  گرمیِ  بازارِ  سامری  کب  تک

                 

                اس  شعر  کا  اشارہ  سونے  کے  بچھڑے  کی  کہانی  کی  طرف  ہے۔  جب  موسیٰ  خدا  سے  گفتگو  اور  ہدایت  حاصل  کرنے  کوہِ  طور  پر  گئے  ہوئے  تھے،  تو  سامری  نے  قوم  کو  دھوکہ  دے  کر  ان  کا  سونا  جمع  کیا  اور  اس  سے  پوجا  کے  لیے  ایک  بچھڑا  بنا  دیا۔  یہاں  سامری  کو  سیدھے  راستے  سے  بھٹکانے  اور  دھوکہ  دہی  کی  علامت  کے  طور  پر  استعمال  کیا  گیا  ہے۔  یہ  افتتاحی  شعر  کسی  ‘ستم  شعار’  (ظالم)  کو  مخاطب  کر  کے  کہا  گیا  ہے،  بغیر  یہ  بتائے  کہ  وہ  کون  ہے۔  جس  پس  منظر  میں  یہ  غزل  لکھی  گئی،  اس  میں  ‘ستم  شعار’  سے  مراد  انگریز  نوآبادیاتی  طاقت  (برطانوی  راج)  ہے،  لیکن  اس  شعر  کو  ہر  اُس  ظالم  پر  لاگو  کیا  جا  سکتا  ہے  جو  دھوکے  کے  بل  بوتے  پر  حکومت  کرتا  ہے۔  تو  اے  ستم  شعار!  تم  کب  تک  لوگوں  کو  گمراہ  کرنے  کے  یہ  طریقے  جاری  رکھو  گے؟  تم  کب  تک  سامری  کا  یہ  بازار  گرم  رکھو  گے؟  کیا  اس  میں  یہ  اشارہ  بھی  ہے  کہ  اقتدار  میں  بیٹھے  لوگ  عوام  کو  دھوکہ  دے  کر  ان  کا  سونا  (دولت)  ہڑپ  کر  رہے  ہیں؟

                ۲

                یہ  درسِ  امن  کی  ابلہ  فریبیاں  تاچند

                یہ  اشتہارِ  کرم  کی  فسوں  گری  کب  تک

                 

                تم  امن  کے  سبق  سے  کب  تک  (ہمیں)  دھوکہ  دیتے  رہو  گے؟  تم  اپنی  مہربانی  اور  کرم  کے  اشتہاروں  اور  دعووں  سے  کب  تک  ہمیں  اپنے  فریب  کے  جال  میں  جکڑے  رکھو  گے؟

                ۳

                یہ  بزمِ  عیش  بہ  آہنگِ  خسروی  تاکے

                یہ  سازِ  کیف  یہ  گلباںگِ  قیصری  کب  تک

                 

                تم  شاہانہ  انداز  کی  ان  پرتعیش  محفلوں  کو  کب  تک  جاری  رکھو  گے؟  عیش  و  عشرت  کے  یہ  ساز  اور  شاہی  حکومت  کی  یہ  ہاٹنگ  (ڈھنڈورا)  کب  تک  چلے  گی؟

                ۴

                یہ  فرّ  کنگرۂ  قصرِ  برتری  تاچند

                یہ  رعبِ  طُرّۂ  دستارِ  سروری  کب  تک

                 

                تم  اپنے  محل  کی  ان  سجی  ہوئی  دیواروں  اور  کنگروں  کے  گرد  برتری  کا  یہ  جھوٹا  رعب  و  دبدبہ  کب  تک  قائم  رکھو  گے؟  شاہی  پگڑی  کے  طُرّے  جیسے  اِقتدار  کے  ان  نشانوں  سے  کب  تک  ڈراتے  رہو  گے؟

                ۵

                یہ  کافرانہ  نگاہِ  خدا  رسی  تاکے

                یہ  بزدلانہ  ادائے  سپہ  گری  کب  تک

                 

                تم  خدائی  کے  اس  ناجائز  اور  جھوٹے  رعب  سے  کب  تک  ہماری  طرف  غُرّا  کر  دیکھتے  رہو  گے؟  تم  اپنی  فوجی  طاقت  کا  یہ  بزدلانہ  دکھاوا  کب  تک  جاری  رکھو  گے؟

                ۶

                یہ  طنطنے  یہ  تحکُّم  یہ  دبدبے  تاچند

                یہ  نادری،  یہ  خدائی،  یہ  قاہری  کب  تک

                 

                تم  یہ  دھوم  دھام،  حکم  چلانا  اور  دبدبہ  کب  تک  قائم  رکھو  گے؟  یہ  قتلِ  عام  (جیسے  نادر  شاہ  نے  کیا  تھا)  اور  ہم  پر  یہ  قہر  و  غضب  کب  تک  رہے  گا؟

                ۷

                یہ  شغلِ  ظلم  یہ  آئینِ  دل  دہی  تا  کے

                یہ  مشقِ  جور  یہ  اندازِ  دلبری  کب  تک

                 

                تم  ظلم  و  ستم  کا  کھیل  اور  ساتھ  ہی  ساتھ  دلاسا  اور  تسلی  دینے  کا  یہ  ڈھونگ  کب  تک  جاری  رکھو  گے؟  دلبری  اور  سحر  انگیزی  کے  پردے  میں  ظلم  کی  یہ  مشق  کب  تک  چلے  گی؟

                ۸

                یہ  چیرہ  دستیِ  تثلیثِ  ناروا  تاچند

                یہ  فتنہ  خیزیِ  توحیدِ  آذری  کب  تک

                 

                آذر  ابراہیم  کے  والد  تھے؛  وہ  بت  تراش  اور  بت  پرست  تھے  اور  اپنے  بیٹے  کی  توحید  کی  تعلیمات  کے  خلاف  تھے۔  اس  لیے  ‘توحیدِ  آذری’  سے  مراد  اعلیٰ  اصولوں  کا  وہ  منافقانہ  دکھاوا  ہے  جہاں  توحید  کو  صرف  ایک  اچھے  اصول  کی  علامت  کے  طور  پر  استعمال  کیا  جائے۔  ‘تثلیثِ  ناروا’  کا  ترجمہ  ایک  ناجائز  یا  ناپاک  تگڑی  (تین  چیزوں  کا  ملاپ)  کے  طور  پر  کیا  جا  سکتا  ہے۔  یہاں  یہ  واضح  نہیں  کہ  وہ  کن  تین  چیزوں  کا  ذکر  کر  رہے  ہیں،  اس  لیے  ہم  پچھلے  شعر  سے  ظلم،  ستم  اور  دلبری  کے  اس  ناپاک  ملاپ  کو  ہی  لے  لیتے  ہیں۔  تو،  ظلم،  ستم  اور  تسلی  دینے  کے  اس  ڈھونگ  کی  ناپاک  تگڑی  کی  یہ  زبردستی  کب  تک  چلے  گی؟  تم  اعلیٰ  اصولوں  کے  اس  منافقانہ  دکھاوے  سے  کب  تک  فتنے  کھڑے  کرتے  رہو  گے؟

                ۹

                یہ  شیطنت  میں  نمودِ  پیمبری  تاکے

                پیمبری  میں  یہ  اندازِ  داوری  کب  تک

                 

                شیطانی  حرکتوں  کو  کب  تک  الٰہی  پیغام  بنا  کر  پیش  کیا  جاتا  رہے  گا،  اور  ان  الٰہی  پیغامات  میں  خدائی  کا  انداز  کب  تک  دکھایا  جائے  گا؟

                ۱۰

                ٹھہر  کہ  چرخ  نئی  چال  چلنے  والا  ہے

                سنبھل  سنبھل  کہ  زمانہ  بدلنے  والا  ہے

                 

                آخری  شعر  کا  لہجہ  بدل  کر  ایک  وارننگ  (انتباہ)  بن  جاتا  ہے۔  ذرا  رکو،  وقت  کی  طاقتیں  اب  ایک  بالکل  نئی  چال  چلنے  والی  ہیں۔  اب  سنبھل  جاؤ،  کیونکہ  زمانہ  بدلنے  والا  ہے۔

                 

                 

                गर्मी-ए बाज़ार-ए सामरी कब तक – जोश मलीहआबादी

                १

                सितम शे’आर ये अंदाज़-ए साहिरी कब तक
                रहेगी गर्मी-ए बाज़ार-ए सामरी कब तक

                २

                ये दर्स-ए अमन की अबला-फ़रेबियां ता चंद
                ये इश्तेहार-ए करम की फ़ुसूंगरी कब तक

                ३

                ये बज़्म-ए ऐश ब आहंग-ए ख़ुसरवी ता-कय
                ये साज़-ए कैफ़ ये गुलबांग-ए क़ैसरी कब तक

                ४

                ये फ़र्र-ए कंगरह-ए क़स्र-ए बरतरी ता चंद
                ये रो’ब-ए तुर्रा-ए दस्तार-ए सरवरी कब तक

                ५

                ये काफ़ेराना निगाह-ए ख़ुदा-रसी ता-कय
                ये बुज़्दिलाना अदा-ए सिपहगरी कब तक

                ६

                ये तनतने ये तहक्कुम ये दबदबे ता चंद
                ये नादरी, ये ख़ुदाई, ये क़ाहरी कब तक

                ७

                ये शग़्ल-ए ज़ुल्म ये आईन-ए दिल-दही ता के
                ये मश्क़-ए जौर ये अंदाज़-ए दिलबरी कब तक

                ८

                ये चीरा-दस्ती-ए तस्लीस-ए ना-रवा ता चंद
                ये फ़ितना ख़ेज़ी-ए तौहीद-ए आज़री कब तक

                ९

                ये शैतनत में नुमूद पै’अम्बरी ताके
                पै’अम्बरी में ये अंदाज़-ए दावरी कब तक

                १०

                ठहर के चर्ख़ नई चाल चलने वाला है
                संभल संभल के ज़माना बदलने वाला है

                 

                जोश मलीहाबाद़ी (१८९८-१९८२) – मलीहाबाद़, आगरा, लखनऊ, हैदराबाद़, देहली, कराची। उन्हें ‘शा’एर-ए

                इन्क़ेलाब’ कहा जाता है। वो अपने लेखन में बेहद सेक्युलर और राष्ट्रवादी हैं और रूढ़िवादिता के ख़िलाफ़ बग़ावत करते हैं। उनकी भाषा का दा’एरा और शब्द-भंडार अद्भुत है। उन्होंने सुबह की ख़ूबसूरती के बारे में बहुत विस्तार से लिखा है। सुबह के हुस्न पर लिखी गई उन की नज़्मों, ग़ज़लों और रुबाइयों के संग्रह को कवि के नाम के तहत और विषय सूची (Theme Index) ‘जल्वा-ए-सहर’ दोनों के ज़रिए देखा जा सकता है। वो जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तिगत मित्र थे और उन की सलाह ओ समझाने के बिल्कुल ख़िलाफ़ १९५२ में पाकिस्तान हिजरत कर गए, जिसका उन्हें बाद में बहुत अफ़्सोस हुआ।

                १

                सितम शे’आर ये अंदाज़-ए साहिरी कब तक

                रहेगी गर्मी-ए बाज़ार-ए सामरी कब तक

                 

                इस शे’र का इशारा सोने के बछड़े की कहानी की तरफ़ है। जब मूसा ईश्वर से प्रेरणा और हिदायत लेने कोह-ए तूर (तूर पर्वत) पर गए हुए थे, तो सामरी ने क़बीले को धोखा दे कर उनका सोना इकट्ठा किया और उससे पूजा के लिये एक बछड़ा बना दिया। यहाँ सामरी को सही रास्ते से भटकाने और धोखेबाज़ी के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया है। ये शुरुआती शे’र किसी “सितम-शे’आर” (अत्याचारी) को संबोधित कर के कहा गया है, बिना ये बताए के के वो कौन है। जिस संदर्भ में ये ग़ज़ल लिखी गई, उस में “सितम-शे’आर” से मतलब ब्रिटिश उपनिवेशवादी (अंग्रेज़ शासक) हैं, लेकिन इस शे’र को हर उस अत्याचारी पर लागू किया जा सकता है जो धोखे के दम पर राज करता है। तो अए अत्याचारी! तुम कब तक लोगों को गुमराह करने के ये तरीक़े जारी रखोगे? तुम कब तक सामरी का ये बाज़ार गर्म रखोगे? क्या इस में ये इशारा भी है के सत्ता में बैठे लोग जनता को धोखा दे कर उनका सोना (दौलत) हड़प रहे हैं?

                २

                ये दर्स-ए अमन की अबला-फ़रेबियां ता चंद

                ये इश्तेहार-ए करम की फ़ुसूंगरी कब तक

                 

                तुम शांति (अमन) के भाषणों से कब तक (हमें) धोखा देते रहोगे? तुम अपनी दया और कृपा के विज्ञापनों/दावों से कब तक हमें अपने छल के जाल में जकड़े रखोगे?

                ३

                ये बज़्म-ए ऐश ब आहंग-ए ख़ुसरवी ता-कय

                ये साज़-ए कैफ़ ये गुलबांग-ए क़ैसरी कब तक

                 

                तुम शाही अंदाज़ की इन आलीशान और विलासी महफ़िलों को कब तक जारी रखोगे? ऐश-ओ-आराम के ये साज़-ओ-सामान और साम्राज्यवाद का ये ढिंढोरा कब तक चलेगा?

                ४

                ये फ़र्र-ए कंगरह-ए क़स्र-ए बरतरी ता चंद

                ये रो’ब-ए तुर्रा-ए दस्तार-ए सरवरी कब तक

                 

                तुम अपने महल की इन सजी हुई दीवारों और कंगूरों के इर्द-गिर्द श्रेष्ठता का ये झूठा रौब (फ़र्र) कब तक बनाए रखोगे? शाही पगड़ी के तुर्रे जैसे अधिकार और सत्ता के इन प्रतीकों से कब तक डराते रहोगे?

                ५

                ये काफ़ेराना निगाह-ए ख़ुदा-रसी ता-कय

                ये बुज़्दिलाना अदा-ए सिपहगरी कब तक

                 

                तुम ईश्वरीय शक्ति के इस नाजा’एज़ और झूठे रो’ब से कब तक हमारी तरफ़ घूर कर देखते रहोगे? तुम अपनी सैन्य शक्ति का ये कायरतापूर्ण दिखावा कब तक जारी रखोगे?

                ६

                ये तनतने ये तहक्कुम ये दबदबे ता चंद

                ये नादरी, ये ख़ुदाई, ये क़ाहरी कब तक

                 

                तुम ये ठाट-बाठ, हुक्म चलाना और दबदबा कब तक बनाए रखोगे? ये क़त्ल-ए आ’म (जैसे नादर शाह ने किया था) और हम पर ये प्रलय/प्रकोप कब तक रहेगा?

                ७

                ये शग़्ल-ए ज़ुल्म ये आईन-ए दिल-दही ता-कय

                ये मश्क़-ए जौर ये अंदाज़-ए दिलबरी कब तक

                 

                तुम ज़ुल्म ओ सितम का खेल और साथ ही साथ तसल्ली और दिलासा देने का ये ढोंग कब तक जारी रखोगे? दिलबरी और आकर्षण के पर्दे में अत्याचार का ये अभ्यास कब तक चलेगा?

                ८

                ये चीरा-दस्ती-ए तस्लीस-ए ना-रवा ता चंद

                ये फ़ितना ख़ेज़ी-ए तौहीद-ए आज़री कब तक

                 

                आज़र इब्राहिम के पिता थे; वो मूर्ति बनाने वाले और मूर्तिपूजक थे जो अपने बेटे की एकेश्वरवाद (तौहीद) की शिक्षाओं के ख़िलाफ़ थे। इस लिये ‘तौहीद-ए आज़री’ का मतलब ऊंचे सिद्धांतों का वो पाखंडी दिखावा है जहाँ एकेश्वरवाद को सिर्फ़ एक अच्छे सिद्धांत के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाए। ‘तस्लीस-ए नारवा’ का अनुवाद एक नाजा’एज़ या अपवित्र तिकड़ी (तीन चीज़ौं का मेल) के रूप में किया जा सकता है। यहाँ ये साफ़ नहीं है के वे किन तीन चीज़ौं का ज़िक्र कर रहे हैं, इस लिये हम पिछले शे’र से ज़ुल्म, अत्याचार और दिलासा देने के इस अपवित्र मेल को ही ले लेते हैं। तो, ज़ुल्म, अत्याचार और दिलासा देने के इस ढोंग की अपवित्र तिकड़ी की ये ज़बरदस्ती कब तक चलेगी? तुम ऊंचे सिद्धांतों के इस पाखंडी दिखावे से कब तक फ़साद (फ़ितना) खड़े करते रहोगे?

                ९

                ये शैतनत में नुमूद पै’अम्बरी ताके

                पै’अम्बरी में ये अंदाज़-ए दावरी कब तक

                 

                शैतानी हरकतों को कब तक ईश्वरीय संदेश बना कर पेश किया जाता रहेगा, और उन ईश्वरीय संदेशों में न्याय और देवत्व का अंदाज़ कब तक दिखाया जाएगा?

                १०

                ठहर के चर्ख़ नई चाल चलने वाला है

                संभल संभल के ज़माना बदलने वाला है

                 

                आखिरी शे’र का लहजा बदल कर एक चेतावनी बन जाता है। ज़रा रुको, समय का पहिया अब एक बिल्कुल नई चाल चलने वाला है। अब संभल जाओ, क्यूंके ज़माना बदलने वाला है।

                 

                garmi-e baazaar-e saameri kab tak-shabbir hasan KhaaN josh malihabadi

                1
                sitam-she’aar yeh andaaz-e saahiri kab tak
                rahegi garmi-e baazaar-e saameri kab tak
                2
                yeh dars-e amn ki ablaa-farebiyaaN taa-chand
                yeh ishtehaar-e karam ki fasuuNgari kab tak
                3
                yeh bazm-e-aish ba-aahaNg-e Khusravi taa-kai
                yeh saaz-e-kaif yeh gulbaaNg-e qaisari kab tak
                4
                yeh farr-e kaNgarah-e qasr-e bartari taa-chand
                yeh ro’b-e turra-e dastaar-e sarvari kab tak
                5
                yeh kaafiraana nigaah-e Khudaa-rasi taa-kai
                yeh buzdilaana adaa-e sipah-gari kab tak
                6
                yeh tantan’e yeh tahakkum yeh dabdabe taa-chand
                yeh naadiri, yeh Khudaai, yeh qaahiri kab tak
                7
                yeh shaGhl-e zulm yeh aa’iin-e dil-dahi taa-kai
                yeh mashq-e jaur yeh andaaz-e dilbari kab tak
                8
                yeh chiira-dasti-e tasliis-e naa-ravaa taa-chand
                yeh fitna-Khezii-e tauhiid-e aazari kab tak
                9
                yeh shaitaanat meN numuud pai’ambari taa-kai
                pai’ambari meN yeh andaaz-e daavari kab tak
                10
                Thahar keh charKh na’ii chaal chalne vaalaa hai
                sambhal sambhal keh zamaanaa badalne vaalaa hai

                josh malihabadi (1898-1982) – malihabad-agra-lukhnau-hyderabad-dehli-karachi.  He is called shaa’er-e inqelaab, poet of change/revolution.  He is very secular and nationalistic in his writings and rebels against orthodoxy.  His range of language and vocabulary is simply amazing.  He has written extensively about the beauty of dawn.  His collection of nazm/Ghazal and rubaaii about the beauty of dawn can be accessed both under the poet’s name and from the Theme Index, ‘jalva-e sahr’.  He was a personal friend of jawaharlal nehru and much against his advice/persuasion migrated to pakistan in 1952 and bitterly regretted it.  This is linked to the series ‘kab tak’ on the radeef/Refrain page.

                1
                sitam1-she’aar2 yeh andaaz3-e saahiri4 kab tak
                rahegi garmi5-e baazaar-e saameri6 kab tak

                1.cruelty, oppression 2.nature, character 3.style, behavious 4.magic, illusion, deception 5.activity, trading 6.person in abrahamic texts, symbol of deviation and deception

                This has reference to the story of the golden calf.  While moosa/Moses was on mount tuur, seeking divine inspiration, saamer deceived the tribe into giving him their gold and fashioned it into a calf to be worshipped.  He is used as a symbol of deviation from the right path and of deception.  The opening she’r is address to a sitam-she’aar without specifying who it is.  The context in which this was composed, sitam-she’aar is the British colonizer but the she’r can be universalized to apply to any oppressor governing through deception.  Thus, O sitam-she’aar how long will you keep up these ways of deluding people.  How long will you maintain this bazaar of saamir.  Also, is there an implication that the people in power are deceiving people to give up their gold?

                2
                yeh dars1-e amn2 ki ablaa-farebiyaaN3 taa-chand4
                yeh ishtehaar5-e karam6 ki fasuuNgari7 kab tak

                1.lesson, lecture 2.peace, tranquility 3.hypocritical deception 4.how long 5.advertisement, declaration 6.benevolence 7.magic, trickery

                How long will you deceive with lectures on peace.  How long will you trick us with  declarations/advertisements of your benevolence.

                3
                yeh bazm-e-aish1 ba-aahaNg2-e Khusravi3 taa-kai4
                yeh saaz-e-kaif5 yeh gulbaaNg6-e qaisari7 kab tak

                1.lavish gatherings 2.in harmony with, in the style of 3.Chosroes, symbolic of imperialism 4.how long 5.instruments of pleasure 6.declaration, trumpeting 7.Caesar, imperialism

                How long will you continue with these imperially lavish gatherings.  How long these instruments of luxury, how long this trumpeting of imperialism.

                4
                yeh farr1-e kaNgarah2-e qasr3-e bartari4 taa-chand5
                yeh ro’b6-e turra7-e dastaar8-e sarvari9 kab tak

                1.grandeur, aura 2.ornamental parapets/walls 3.palace 4.superiority 5.how long 6.intimidation 7.ornamental tassle 8.ceremonial headgear 9.monarchy, imperial

                How long will you maintain this false false aura (farr) of superiority around your decorated palace walls; how long this intimidation with symbols of authority – turra-e dastaar.

                5
                yeh kaafiraana1 nigaah2-e Khudaa-rasi3 taa-kai4
                yeh buzdilaana5 adaa6-e sipah-gari7 kab tak

                1.not sanctioned, illegitimate 2.gaze 3.god-reaching, divine 4.how long 5.cowardly 6.style, mannerism 7.military prowess

                How long will you glare at us with this illegitimate gaze of divinity.  How long will you maintain this cowardly pretense of military prowess.

                6
                yeh tantan’e1 yeh tahakkum2 yeh dabdabe3 taa-chand4
                yeh naadiri, yeh Khudaai, yeh qaahiri kab tak

                1.pomp 2.orders, commands, control 3.force, dominance 4.how long 5.massacres like that of naadir shaah 6.bringing down curse, divine wrath

                How long will you keep up this pomp, control and dominance.  How long this massacre, this curse upon us.

                7
                yeh shaGhl1-e zulm2 yeh aa’iin3-e dil-dahi4 taa-kai
                yeh mashq5-e jaur6 yeh andaaz7-e dilbari8 kab tak

                1.pastime 2.cruelty 3.rules, traditions, laws 4.solace, consolation 5.practice 6.oppression 7.style, mannerism 8.heart-winning, charming

                How long will you maintain the pastime of cruelty alongside solace and consolation; how long this practice of oppression masked as dilbari – charm.

                8
                yeh chiira-dasti1-e tasliis2-e naa-ravaa3 taa-chand
                yeh fitna-Khezii4-e tauhiid5-e aazari6 kab tak

                1.high-handedness, grabbing 2.triangle, triple 3.disallowed, illegitimate 4.raising mischief 5.monotheism 6.idol worship of aazar

                aazar was the father of ibrahim; he was an idol maker and idol worshipper opposed to his son’s monotheistic teachings.  Thus, tauhiid-e aazari means hypocritical pretense of monotheism, where monotheism is used as a symbol of high principles.  tasliis-e naa-ravaa may be translated as the illegitimate/unholy trinity.  I am not sure which three things he is referring to.  Let us just take the unholy combination of cruelty, oppression and dilbari from the previous she’r.  Thus, how long this high-handedness of the unholy trinity of cruelty, oppression and pretense of consolation.  How long will you raise the mischief of hypocritical pretense of high principles.

                9
                yeh shaitaanat1 meN numuud2 pai’ambari3 taa-kai
                pai’ambari meN yeh andaaz4-e daavari5 kab tak

                1.satanism, satanic behaviour 2.appearance 3.legitimacy of prophethood, divine message 4.mannerism 5.divinity

                How long will satanic tendencies made to appear as divine messages and in those divine messages a mannerism of divinity.

                10
                Thahar1 keh charKh2 na’ii chaal3 chalne vaalaa hai
                sambhal4 sambhal keh zamaanaa5 badalne6 vaalaa hai

                1.stop 2.wheel of time 3.move 4.careful 5.times 6.change

                The tone of the concluding she’r changes to a warning.  Just wait, the forces of time are going to make a different move.  Be careful, the times are going to change.

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              • Khoon se aa’o vuzu kar’eN-liu yuNg ven shaida chiini

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                Recitation

                • اُردو
                • تشریح
                • देवनागरी
                • व्याख्या
                • Roman
                • Explanation
                • خون  سے  آؤ  وضو  کریں  ۔  شیداؔ  چینی  لیو  ینگ  ون

                  ۱

                  کرتے  ہیں  گر  وہ  حوصلۂ  گفتگو  کریں

                  اِک  شرط  ہے  کہ  بات  مگر  رُو  بہ  رُو  کریں

                  ۲

                  آہ  و  فغانِ  بُلبُل  نالاں  تو  سن  چکے

                  اب  خاموشیِ  گُل  سے  ذرا  گفتُگُو  کریں

                  ۳

                  آنکھیں  بچھائے  اہلِ  ستم  ہیں  کھڑے  ہوئے

                  آؤ  صلیبِ  دار  کو  زیبِ  گُلُو  کریں

                  ۴

                  غم  پر  نہ  اختیار  زمانہ  نہ  غم  گُسار

                  ایسے  میں  وصلِ  یار  کی  کیا  آرزو  کریں

                  ۵

                  نذرِ  بہار  ہو  چکا  ہے  ایک  ایک  تار

                  اب  پیرہن  کہاں  کہ  جسے  ہم  رفو  کریں

                  ۶

                  عنقا  ہی  ہو  چکی  ہے  زمانے  سے  عافیت

                  کرنے  کو  یوں  تلاش  تو  ہم  کُو  بہ  کُو  کریں

                  ۷

                  تسخیرِ  کائنات  کا  سودا  بُرا  نہیں

                  لیکن  بقدرِ  ظرف  ہی  یہ  آرزو  کریں

                  ۸

                  راہِ  وفا  میں  چاہیے  سجدوں  کا  اِہتمام

                  شیداؔ  خود  اپنے  خون  سے  آؤ  وضو  کریں

                   

                  شیدا چینی ۔ لیو ینگ وین (۱۹۳۱۔۲۰۱۵)، کولکتہ میں پیدا ہوئے، لیکن ۱۹۳۴ میں اُن کا خاندان جمشید پور منتقل ہو گیا جہاں اُنہوں نے بطور ڈینٹسٹ (دانتوں کے ڈاکٹر) کام کیا۔ اُن کے گھر میں پہلی زبان چینی بولی جاتی تھی، لیکن وہ سب اُردو میں مہارت رکھتے تھے۔ شیدا کی اِبتدائی تعلیم اُردو میں ہوئی، پھر وہ اِنگلش اسکول گئے، لیکن ہائی اسکول میں دوبارہ اُردو کی طرف لوٹ آئے۔ اُنہیں اُردو سے عشق ہو گیا اور اُنہوں نے بے شمار اشعار یاد کر لیے۔انہوں نے ۱۹۵۱ میں اپنا پہلی غزل پڑھی اور اکثر مشاعروں میں غزل کے ساتھ ایک چینی ساز ‘مُون لیوٹ’ (Moon Lute) بھی بجایا کرتے تھے۔ وہ ترقی پسند مصنفین کی تحریک (PWA)  سے وابستہ تھے مگر زیادہ فعال نہیں تھے۔ ڈیکن ہیرالڈ (Deccan Herald) کو دیے گئے ایک انٹرویو میں انہوں نے کہا تھا: “میں پیدائشی طور پر بدھ مت کا پیروکار ہوں اور دل سے کمیونسٹ، اور اُردو میری روح کی زبان ہے۔ یہ کسی ایک مذہب کی زبان نہیں، بلکہ تہذیب اور انسانیت کی زبان ہے۔ میرے بچے عیسائی ہیں، میری بیٹیاں شیو اور سائی بابا میں سکون پاتی ہیں۔ ہم ایک چھت کے نیچے ایک چھوٹا سا ہندوستان ہیں۔” انہوں نے خود کئی نعتیں بھی لکھیں۔ ۱۹۶۲ کی بھارت-چین جنگ اور ۱۹۶۴ کے مذہبی فسادات کے دوران اپنے ساتھ ہونے والے برے برتاؤ نے اُنہیں کافی مایوس اور دلبرداشتہ کیا۔ ان کی زندگی کے آخری ایّام میں، جب وہ بستر پر تھے، ان کے دوستوں اور خاندان نے ان کا کلام جمع کر کے شائع کروایا۔

                  ۱

                  کرتے  ہیں  گر  وہ  حوصلۂ  گفتگو  کریں

                  اِک  شرط  ہے  کہ  بات  مگر  رُو  بہ  رُو  کریں

                   

                  یہاں  اہم  سوال  یہ  ہے  کہ  ‘وہ’  کون  ہے؟  اس  کا  محبوب  یوں  ہو  سکتا  ہے  کہ  اُس  نے  بہت  سے  جھوٹے  وعدے  کئے  ہیں  اور  اب  شرمندگی  کی  وجہ  سے  عاشق  سے  بات  کرنا  چاہتا  ہے۔  عاشق  ناراز  ہے  اور  اِلزام  دھرنے  اور  للکارنے  کو  تیار  ہے۔  گفتگو  کے  لئے  راضی  تو  ہے  مگر  شرط  ہے  کہ  آمنے  سامنے  ہو  تاکہ  شرمندگی  دیکھ  سکے۔    اِس  بات  کا  بھی  امکان  ہے  کہ  یہاں  ‘وہ’  سے  مُراد  مخالف  یا  طاقتور  حکمران  ہیں۔  یعنی  اگر  وہ  بات  کرنے  کی  ہِمّت  پیدا  کر  سکیں  تو  میں  تیّار  ہوں،  مگر  ایک  شرط  ہے  کہ  بات  آمنے  سامنے  ہونی  چاہیے۔  یہ  ایک  طرح  کا  چیلنج  ہے  کہ  جو  کہنا  ہے  میرے  منہ  پر  کہو۔

                  ۲

                  آہ  و  فغانِ  بُلبُل  نالاں  تو  سن  چکے

                  اب  خاموشیِ  گُل  سے  ذرا  گفتُگُو  کریں

                   

                  یہاں  شاعر  روایتی  طریقوں  سے  ہٹ  کر  ‘بُلبُلِ  نالاں’  (رونے  والی  بلبل)  کے  ماتم  سے  آگے  بڑھ  گیا  ہے۔  ‘گل  کی  خاموشی’  کی  طرف  توجہ  دلا  کر  شاعر  یہ  کہنا  چاہتا  ہے  کہ  گہری  سمجھ  بوجھ  ان  باتوں  میں  چھپی  ہوتی  ہے  جو  کہی  نہیں  جاتیں  ۔۔  یعنی  قدرت  کی  ان  کہی  سچائیاں  یا  محبوب  کا  وہ  وقار  جو  خاموشی  میں  ہے۔

                  ۳

                  آنکھیں  بِچھائے  اہلِ  ستم  ہیں  کھڑے  ہوئے

                  آؤ  صلیبِ  دار  کو  زیبِ  گُلُو  کریں

                  ‘

                  آنکھیں  بچھانا’  کا  مطلب  ہے  کسی  کا  بے  صبری  سے  انتظار  کرنا  (عام  طور  پر  یہ  مثبت/positive  معنوں  میں  استعمال  ہوتا  ہے)۔  یہاں  ‘اہلِ  ستم’  (ظالم  لوگ)  بے  صبری  سے  یہ  دیکھنے  کے  لیے  کھڑے  ہیں  کہ  اب  کیا  ہوگا  یا  آپ  کیا  کریں  گے۔  خوف  سے  دبنے  کے  بجائے  شاعر  ہمیں  دعوت  دیتا  ہے  کہ  ہم  سولی  کے  پھندے  کو  اپنے  گلے  کا  ہار  بنا  لیں۔  یہ  ظلم  کے  سامنے  اپنی  دیانتداری  اور  قربانی  کو  خوبصورتی  کے  ساتھ  قبول  کرنے  کا  پیغام  ہے۔

                  ۴

                  غم  پر  نہ  اختیار  زمانہ  نہ  غم  گُسار

                  ایسے  میں  وصلِ  یار  کی  کیا  آرزو  کریں

                   

                  شاعر  اپنی  مکمل  بے  بسی  کا  ذکر  کر  رہا  ہے  ۔۔  دنیا  بے  حس  ہے  اور  کوئی  غم  بانٹنے  والا  (غم  گسار)  نہیں  ہے۔  ایسی  مایوسی  کی  حالت  میں  محبوب  سے  ملنے  کی  آرزو  کرنا  فضول  معلوم  ہوتا  ہے۔

                  ۵

                  نذرِ  بہار  ہو  چکا  ہے  ایک  ایک  تار

                  اب  پیرہن  کہاں  کہ  جسے  ہم  رفو  کریں

                   

                   

                  زندگی  کا  لباس  تار  تار  ہو  چکا  ہے؛  اس  کا  ایک  ایک  دھاگہ  بہار  کے  جنون  یا  دیوانگی  کی  نذر  (قربان)  ہو  گیا  ہے۔  اب  کوئی  ایسا  کپڑا  باقی  نہیں  بچا  جسے  ہم  رفو  کر  سکیں۔  یہ  استعارہ  انسان  کے  مکمل  برباد  ہو  جانے  کی  علامت  ہے،  جہاں  ماضی  کی  مرمت  کے  لیے  کچھ  باقی  نہیں  بچا۔

                  ۶

                  عنقا  ہی  ہو  چکی  ہے  زمانے  سے  عافیت

                  کرنے  کو  یوں  تلاش  تو  ہم  کُو  بہ  کُو  کریں

                   

                  عافیت  (سکون  اور  سلامتی)  اب  ‘عنقا’  کی  طرح  ایک  فرضی  پرندہ  بن  چکی  ہے  جو  کہیں  نہیں  ملتا۔  اس  تلاش  میں،  میں  خوشی  سے  گلی  گلی  (کو  بہ  کو)  گھومتا  مگر  جب  عافیت  کا  وجود  ہی  نہیں  ہے  تو  اسے  کہاں  تلاش  کریں۔

                  ۷

                  تسخیرِ  کائنات  کا  سودا  بُرا  نہیں

                  لیکن  بقدرِ  ظرف  ہی  یہ  آرزو  کریں

                   

                  کائنات  کو  فتح  کرنے  کا  ارادہ  برا  نہیں  ہے۔  لیکن  شاعر  ایک  اہم  بات  کہتا  ہے:  انسان  کی  خواہشیں  اس  کے  اپنے  ‘ظرف’  یعنی  اس  کی  صلاحیت  کے  مطابق  ہونی  چاہئیں۔  یہ  بڑی  امنگوں  اور  اپنی  حقیقت  کی  پہچان  کے  درمیان  ایک  توازن  کی  بات  ہے۔

                  ۸

                  راہِ  وفا  میں  چاہیے  سجدوں  کا  اِہتمام

                  شیداؔ  خود  اپنے  خون  سے  آؤ  وضو  کریں

                   

                  وفاداری  کے  راستے  میں  مکمل  وابستگی  کی  ضرورت  ہے۔  شاعر  ایک  انقلابی  قدم  کی  بات  کرتا  ہے:  وضو  پانی  سے  نہیں  بلکہ  اپنے  خون  سے  کرنا۔  اس  کا  مطلب  یہ  ہے  کہ  اپنی  بات  اور  عشق  کو  سچا  ثابت  کرنے  کے  لیے  آخری  قربانی  ہی  وہ  واحد  راستہ  ہے  جو  انسان  کو  پاک  کر  دیتا  ہے  اور  محبت  کے  وعدے  کو  پورا  کرتا  ہے۔

                   

                  ख़ून से आओ वुज़ू करें – शैदा चीनी लियु यंग वेन

                  १

                  करते हैं गर वो हौसला-ए गुफ़्तुगू करें

                  एक शर्त है के बात मगर रू-ब-रू करें

                  २

                  आह-ओ-फ़ुग़ान-ए बुलबुल-ए नालां तो सुन चुके

                  अब ख़ामोशी-ए गुल से ज़रा गुफ़्तुगू करें

                  ३

                  आंखें बिछाए अहल-ए सितम हैं खड़े हुए

                  आओ सलीब-ए दार को ज़ेब-ए गुलू करें

                  ४

                  ग़म पर न एख़्तियार ज़माना न ग़म-गुसार

                  ऐसे में वस्ल-ए यार की क्या आर्ज़ू करें

                  ५

                  नज़्र-ए बहार हो चुका है एक-एक तार

                  अब पैरहन कहाँ के जिसे हम रफ़ू करें

                  ६

                  अन्क़ा ही हो चुकी है ज़माने से आफ़ियत

                  करने को यूँ तलाश तो हम कू-ब-कू करें

                  ७

                  तस्ख़ीर-ए का’एनात का सौदा बुरा नहीं

                  लेकिन ब-क़द्र-ए ज़र्फ़ ही ये आर्ज़ू करें

                  ८

                  राह-ए वफ़ा में चाहिए सज्दों का एहतेमाम

                  शैदा ख़ुद अपने ख़ून से आओ वुज़ू करें

                   

                  शैदा चीनी – लिउ युंग वेन (१९३१-२०१५), कलकत्ता में पैदा हुए थे, लेकिन १९३४ में उनका परिवार जमशेदपुर चला गया जहाँ उन्होंने एक डेंटिस्ट के रूप में काम किया। उनके घर की पहली भाषा चीनी थी, लेकिन वो सभी उर्दू भी बोलते थे। उनकी प्रथम स्कूल शिक्षा उर्दू में हुई, फिर वो इंग्लिश स्कूल गए, लेकिन हाई स्कूल में वो दोबारा उर्दू की ओर लौट आए। उन्हें उर्दू से इतना लगाव हुआ के उन्होंने हज़ारों शे’र याद कर लिये।  उन्होंने १९५१ में पहली ग़ज़ल पढ़ी और अक्सर मुशा’एरों में अपनी ग़ज़ल के साथ एक चीनी वाद्य यंत्र ‘मून ल्यूट’ (Moon Lute) भी बजाया करते थे। वे ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ (PWA) के सदस्य थे, हालांके उसमें बहुत सक्रिय नहीं रहे। ‘डक्कन हेरल्ड’ को दिये एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था: “मैं जन्म से बौद्ध हूँ और दिल से कम्युनिस्ट, और उर्दू मेरी आत्मा की भाषा है। ये किसी एक धर्म की भाषा नहीं है, बल्के संस्कृति और इंसानियत की भाषा है। मेरे बच्चे ईसाई हैं, मेरी बेटियाँ शिव और साई बाबा में शांति पाती हैं – हम एक ही छत के नीचे एक छोटा सा हिंदुस्तान हैं।”

                  उन्होंने ख़ुद कई ना’तें (इसलाम के बानी मोहम्मद की प्रशंसा में कविताएं) भी लिखीं। १९६२ के भारत-चीन युद्ध और १९६४ के दंगों के दौरान अपने साथ हुए दुर्व्यवहार से वो बहुत निराश हुए थे। उनके जीवन के अंतिम समय में, जब वे बिस्तर पर थे, तब उनके दोस्तों और परिवार ने उनका काम इकट्ठा करके प्रकाशित करवाया।

                  १

                  करते हैं गर वो हौसला-ए गुफ़्तुगू करें

                  एक शर्त है के बात मगर रू-ब-रू करें

                   

                  यहाँ मुख्य सवाल ये है के ‘वो’ कौन है? महबूब यूं हो सकता है के उस ने बहुत से झूटे वा’दे किये हैं और अब शरम और पछतावे के कारण बात करना चाहता है। प्रेमी बात करने के लिये तय्यार है लैकिन सामने बैठ कर ताके पूरी शर्मिंदगी देख सके। ये भी संभावना है के ‘वो’ से मतलब विरोधी या ताक़तवर शासक हैं। यानी, अगर वो बातचीत करने की हिम्मत जुटा सकें तो मैं तय्यार हूँ, बस एक शर्त है के बातचीत आमने-सामने होनी चाहिए। ये एक तरह की चुनौती लगती है – के जो कहना है मेरे मुँह पर कहो।

                  २

                  आह-ओ-फ़ुग़ान-ए बुलबुल-ए नालां तो सुन चुके

                  अब ख़ामोशी-ए गुल से ज़रा गुफ़्तुगू करें

                   

                  यहाँ कवि पारंपरिक तरीक़े से हटकर ‘बुलबुल-ए-नालां’ (रोती हुई बुलबुल) के मातम से आगे निकल गया है। ‘फूल की खांमोशी’ की ओर ध्यान दिलाकर कवि ये कहना चाहता है के गहरी समझ उन बातों में होती है जो अनकही रह जाती हैं – यानी महबूब की सहज गरिमा या क़ुदरत की अनकही सच्चाइयों में।

                  ३

                  आंखें बिछाए अहल-ए सितम हैं खड़े हुए

                  आओ सलीब-ए दार को ज़ेब-ए गुलू करें

                   

                  ‘आंखें बिछाना’ का मतलब है किसी का बेसब्री से इंतेज़ार करना (आम तौर पर ये सकारात्मक स्वागत के लिए इस्तेमाल होता है)। यहाँ ‘अहल-ए-सितम’ (ज़ुल्म करने वाले लोग) बेसब्री से इंतेज़ार कर रहे हैं ये देखने के लिये के अब क्या होगा या आप क्या करेंगे। डर के मारे दुबकने के बजाय कवि हमें दावत देता है के हम फांसी के फंदे (सलीब-ए-दार) को अपने गले का हार (ज़ेब-ए-गुलू) बना लें। ये ज़ुल्म के सामने अपनी ईमानदारी और बलिदान को ख़ूबसूरती के साथ स्वीकार करने की दावत है।

                  ४

                  ग़म पर न एख़्तियार ज़माना न ग़म-गुसार

                  ऐसे में वस्ल-ए यार की क्या आर्ज़ू करें

                   

                  कवि अपनी पूरी बेबसी को दर्शा रहा है – दुनिया बेहिस (insensitive) है और कोई दुख बाँटने वाला (ग़म-गुसार) नहीं है। ऐसी अस्तित्वगत निराशा की स्थिति में महबूब से मिलन (वस्ल-ए-यार) की इच्छा करना व्यर्थ लगता है।

                  ५

                  नज़्र-ए बहार हो चुका है एक-एक तार

                  अब पैरहन कहाँ के जिसे हम रफ़ू करें

                   

                  जीवन का वस्त्र तार-तार हो चुका है; इसका एक-एक धागा वसंत के जुनून या दीवानगी की भेंट (नज़्र) चढ़ चुका है। अब वो कपड़ा ही नहीं बचा जिस को रफ़ू या मरम्मत की जा सके। ये रूपक इंसान के पूरी तरह बरबाद हो जाने को दर्शाता है, जहाँ अतीत को सुधारने के लिये कुछ भी बाक़ी नहीं बचा है।

                  ६

                  अन्क़ा ही हो चुकी है ज़माने से आफ़ियत

                  करने को यूँ तलाश तो हम कू-ब-कू करें

                   

                  आफ़ियत (शांति और सुरक्षा) अब ‘अन्क़ा’ की तरह एक काल्पनिक पक्षी बन चुकी है जो दुनिया में कहीं नहीं मिलता। इस खोज में, मैं ख़ुशी-ख़ुशी गली-गली (कू-ब-कू) भटकता, लेकिन जब शांति का कोई वजूद ही नहीं है तो उसे कहाँ ढूँढा जाए।

                  ७

                  तस्ख़ीर-ए का’एनात का सौदा बुरा नहीं

                  लेकिन ब-क़द्र-ए ज़र्फ़ ही ये आर्ज़ू करें

                   

                  ब्रह्मांड को जीतने (तसख़ीर-ए-काएनात) का इरादा बुरा नहीं है। लेकिन कवि एक ज़रूरी शर्त जोड़ता है: इंसान की इच्छाएँ उसकी अपनी क्षमता (ज़र्फ़) के अनुसार होनी चाहिए। ये बड़ी महत्वाकांक्षा और आत्म-जागरूकता के बीच संतुलन का विचार है।

                  ८

                  राह-ए वफ़ा में चाहिए सज्दों का एहतेमाम

                  शैदा ख़ुद अपने ख़ून से आओ वुज़ू करें

                   

                  वफ़ादारी के रास्ते में पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है। कवि अंत में शुद्धिकरण के एक क्रांतिकारी क़दम की बात करता है: वुज़ू (धार्मिक स्नान) पानी से नहीं बल्के अपने ख़ून से करना। इसका मतलब ये है के अपनी निष्ठा और प्रेम को सिद्ध करने के लिये अंतिम बलिदान ही वो एकमात्र रास्ता है जो आध्यात्मिक पवित्रता लाता है और प्रेम के वादे को पूरा करता है।

                   

                  Khoon se aa’o vuzuu kar’eN – shaida chiini-liy yuNg ven

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                  kart’e haiN gar voh hausla-e guftugu kar’eN
                  ek shart hai keh baat magar ruu-ba-ruu kar’eN
                  2
                  aah-o-fuGhaan-e bulbul-e nalaaN to sun chuk’e
                  ab Khaamoshi-e gul se zara guftugu kar’eN
                  3
                  aaNkheN bichhaa’e ahl-e sitam haiN khaR’e hu’e
                  aao saleeb-e daar ko zeb-e gulu kar’eN
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                  Gham par na eKhtiyaar, zamaana na Gham-gusaar
                  aise meN vasl-e yaar ki kya aarzu kar’eN
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                  nazr-e bahaar ho chuka hai a’ek-a’ek taar
                  ab pairahan kahan keh jis’e hum rafu kar’eN
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                  anqa hi ho chuki hai zamaane se aafiyat
                  karne ko yuN talaash to hum kuu-ba-kuu kar’eN
                  7
                  tasKhiir-e kaa’enaat ka sauda bura nahiN
                  lekin ba-qadr-e zarf hi ye aarzu kar’eN
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                  raah-e vafa meN chaahiye sajdoN ka ehtemaam
                  shaida Khud apne Khoon se aa’o vuzuu kar’eN

                  shaida chiini-liu yuNg ven (1931-2015), born in kalkatta, but family moved to jamshedpur in 1934 where shaida lived and worked as a dentist.  His family spoke Chinese as their first language, but were fluent in urdu.  His early schooling was in urdu, switched to English and then back to urdu in high school.  Fell in love with it and memorised ash’aar.  He read his first Ghazal at a mushaa’era in 1951.  He played a Chinese instrument known as the Moon Lute often along with his Ghazal reading at mushaa’era.  He was a member of the Progressive Writers’ Association but not very active in it.  In an interview to the Deccan Herald he said, “”I am a Buddhist by birth and a communist by heart, but Urdu is the language of my soul. It is not the language of any one religion; it is the language of culture and humanity. My children are Christians, my daughters find peace in Shiva and Sai Baba—we are a miniature India under one roof.”  He himself has written several n’aat – odes to mohammed, the founder of islaam.  He was deeply disappointed (perhaps disillusioned) because of his mistreatment after the India-China war of 1962 and later religious riots of 1964.  His work was collected and published by family and friends towards the end of his life, while he was bedridden.

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                  kart’e haiN gar voh hausla-e guftugu kar’eN
                  ek shart hai keh baat magar ruu-ba-ruu kar’eN

                  The key question is – who is voh.  It can be the beloved in the following scenario.  The beloved has made many false promises and now regretful and wants to talk things over.  The lover is ready, but would like a face to face discussion so he can drive home her regret and shame.  It is also likely that by voh he means the adversary or perhaps powerful rulers.  Thus, if they can summon the courage for a conversation, I am ready, except that there is one condition – the conversation has to be face to face.  This seems to be a challenge – say what you have to say to my face.

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                  aah-o-fuGhaan-e bulbul-e nalaaN to sun chuk’e
                  ab Khaamoshi-e gul se zara guftugu kar’eN

                  Here, the poet moves beyond the conventional, laments of the “wailing nightingale.” By shifting attention to the “silence of the rose,” the poet suggests that deep understanding lies in what is left unsaid—in the quiet, inherent grace of the beloved or the unspoken truths of nature.

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                  aaNkheN bichhaa’e ahl-e sitam haiN khaR’e hu’e
                  aao saleeb-e daar ko zeb-e gulu kar’eN

                  aaNkheN bichaana is saying the implies eagerly waiting for something or someone (usually it is used in a positive welcoming sense).  Here “people of tyranny” (ahl-e sitam) are waiting eagerly to see what will happen/what you will do.   Instead of cowering in fear, the poet invites us to embrace the “cross of the gallows” (saleeb-e daar) as an ornament for our throats (zeb-e gulu). It is a call to accept martyrdom or sacrifice as a mark of beauty and integrity in the face of oppression.

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                  Gham par na eKhtiyaar, zamaana na Gham-gusaar
                  aise meN vasl-e yaar ki kya aarzu kar’eN

                  The poet reflects on total helplessness—the world is indifferent and there are no comforters (Gham-gusaar). In such a state of existential despair, the longing for union (vasl-e yaar) feels futile.

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                  nazr-e bahaar ho chuka hai a’ek-a’ek taar
                  ab pairahan kahan keh jis’e hum rafu kar’eN

                  The garment of life is worn thin; every thread has been surrendered/sacrificed (nazr-e bahaar) to the passionate/madness of spring. There is no fabric left to mend (rafu kar’eN). This metaphor represents the total depletion of the self, nothing remains of the past to be repaired or salvaged.

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                  anqa hi ho chuki hai zamaane se aafiyat
                  karne ko yuN talaash to hum kuu-ba-ku kar’eN

                  aafiyat (peace, security, safety) has become an anqa – a mythical, non-existent bird. It is nowhere to be found in this world. In this search, I would happily have gone from street to street (kuu-ba-kuu) but there is no aafiyat to be found.

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                  tasKhiir-e kaa’enaat ka sauda bura nahiN
                  lekin ba-qadr-e zarf hi ye aarzu kar’eN

                  The ambition to conquer the universe (tasKhiir-e kaa’enaat) is noble in spirit. However, the poet adds a crucial caveat: one’s desires should be measured by the capacity of one’s vessel (ba-qadr-e zarf). It is a meditation on the balance between grand ambition and self-awareness.

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                  raah-e vafa meN chaahiye sajdoN ka ehtemaam
                  shaida Khud apne Khoon se aa’o vuzuu kar’eN

                  In the path of fidelity (raah-e vafa), true devotion requires a total commitment. The poet concludes with a radical act of purification: performing vuzuu (ritual ablution) not with water, but with one’s own blood. It signifies that the ultimate sacrifice is the only way to attain spiritual cleanliness and fulfill the promise of love.

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                  4 min
                • takalluf bartaraf-munshi chandr bhan kaifi dehlavi

                  https://urdushahkar.org/wp-content/uploads/2026/08/chbhkd-takalluf-bartaraf-audio.mp3

                  Recitation

                  • اُردو
                  • تشریح
                  • देवनागरी
                  • व्याख्या
                  • Roman
                  • Explanation
                  • تکلّف  برطرف  ۔  چندر  بھان  کیفیؔ  دہلوی

                    ۱

                    تکلّف  برطرف  تشریف  رکھئے  بادہ  خواروں  میں

                    جہاں  کا  غم  غلط  ہو  جائے  گا  اے  شیخ  یاروں  میں

                    ۲

                    دُرِ  اشکِ  ندامت  چُن  لئے  شانِ  کریمی  نے

                    میرے  مولا  نے  رکھ  لی  آبرو  پرہیز  گاروں  میں

                    ۳

                    چمن  زاروں  میں  جس  لالے  پہ  بُلبُل  داغ  کھاتا  تھا

                    وہ  لالہ  ہے  میرے  داغِ  جگر  کی  یادگاروں  میں

                    ۴

                    مئے  کوثر  ملے  گی  جب  ملے  گی  اب  تو  اے  واعظ

                    بہار  آئی  ہے  جلسے  ہو  رہے  ہیں  بادہ  خواروں  میں

                    ۵

                    مئے  گلرنگ  کی  تاثیر  سے  کِھنچ  کِھنچ  کے  اے  کیفیؔ

                    مرے  گھر  کی  طرف  بھی  آ  نکلتے  ہیں  بہاروں  میں

                     

                    منشی چندر بھان ماتھر کیفیؔ دہلوی  (xxxx – ۱۹۴۱)۔ اُن کی اِبتدائی تعلیم ایک مشن اسکول میں ہوئی، لیکن وہ چھوٹی عمر ہی سے اُردو، فارسی اور بالخصوص شاعری کی طرف مائل تھے، اور جو بھی شعر سنتے اسے یاد کر لیتے تھے۔ اُنہوں نے سودیشی تحریک میں حِصّہ لیا اور جلسوں میں متعدد قومی و وطنی نظمیں لکھیں اور پڑھیں۔ وہ ایک اسکول میں فارسی اور اردو کے اُستاد تھے اور ‘ہماری زبان’ نامی دو ہفتے میں ایک بار شائع ہونے والے) رسالے کے مدیر بھی رہے۔ ان کا بہت سا کلام ضائع ہو گیا۔ ان کے ایک شاگرد، شیش چندر طالبؔ دہلوی نے اُن کے انتقال کے دس سال بعد اُن کا کلام جمع کر کے شائع کیا۔ اُنہوں نے کلاسیکی انداز اور کلاسیکی موضوعات پر غزلیں لکھیں اور متعدد قومی نظمیں بھی لکھیں۔

                    ۱

                    تکلّف  برطرف  تشریف  رکھئے  بادہ  خواروں  میں

                    جہاں  کا  غم  غلط  ہو  جائے  گا  اے  شیخ  یاروں  میں

                     

                    اے  شیخ،  تکلُّف/ہچکچاہٹ/تامُّل  مت  کیجئیے،  بازو  ایک  طرف  رکھ  دیجئیے  اور  بادہ  خواروں/دوستوں/یاروں  کے  ساتھ  بیٹھ  جائیے  آپ  کے  اِس  جہان/زندگی  کے  سب  غم  دُور  ہو  جائیں  گے۔  شیخ  کو  بِلا  تکلُّف  شراب  پینے  کی  دعوت  دی  جا  رہی  ہے۔  یہ  بھی  کہا  جائے  کہ  یہ  “تکلُّف  برطرف”  کا  پہلا  اِستمعال  ہے  اور  اِس  شعر  کی  قبولیت  کی  وجہ  سے  یہ  فِقرہ  عام  ہو  گیا۔

                    ۲

                    دُرِ  اشکِ  ندامت  چُن  لئے  شانِ  کریمی  نے

                    میرے  مولا  نے  رکھ  لی  آبرو  پرہیز  گاروں  میں

                     

                    ندامت/شرمندگی/پشیمانی  کے  آنسو  موتی  کی  طرح  ہیں۔  شاعر/رند  پرہیز  گاروں  کے  ساتھ  بیٹھا  تو  اس  کی  شراب  نوشی  کی  شرمندگی  کے  آنسو  نکل  پڑے۔    لیکن  خدا  نے  پرہیز  گاروں  کے  سامنے  اُس  کی  عزّت  بچا  لی  اور  آنسو  کو  موتی  کا  درجہ  دیا۔  اقبال  نے  بھی  یہی  کہا  تھا ۔۔۔

                    موتی  سمجھ  کے  شانِ  کریمی  نے  چُن  لئے

                    قطرے  جو  تھے  مرے  عرقِ  اِنفعال  کے

                    ۳

                    چمن  زاروں  میں  جس  لالے  پہ  بُلبُل  داغ  کھاتا  تھا

                    وہ  لالہ  ہے  میرے  داغِ  جگر  کی  یادگاروں  میں

                     

                    اُردو  شاعری  میں  گُل  و  بُلبُل  کا  عشق  مثالی  ہے۔  یہاں  پر  لالہ  (tulip)  و  بُلبُل  کہا  گیا  ہے  لیکن  مطلب  وہی  ہے۔  صیّاد  بُلبُل  کو  پنجرے  میں  بند  کئے  ہے  اور  لالے  کی  یاد  میں  اُس  کے  دل  پر  داغ  لگ  رہا  ہے۔  شاعر  کے  دل  میں  بھی  اُسی  یاد  کا  داغ  ہے۔

                    ۴

                    مئے  کوثر  ملے  گی  جب  ملے  گی  اب  تو  اے  واعظ

                    بہار  آئی  ہے  جلسے  ہو  رہے  ہیں  بادہ  خواروں  میں

                     

                    کہا  جاتا  ہے  کہ  جنّت  میں  شرابِ  طہور  کی  ندیاں  ہوں  گی۔  یہ  مرنے  کے  بعد،  قیامت  کے  بعد،  جنّت  میں  جانے  کے  بعد  ہوگا  تو  ہوگ  اے  واعظ۔  لیکن  یہاں  پر  اِس  وقت  بہار  آئی  ہے  اور  شراب  نوشی  کی  محفل  جمی  ہے۔  کیوں  نہ  اِس  میں  شریک  ہو،  جنّت  کا  اِنتظار  کرنے  کی  کیا  ضرورت  ہے۔

                    ۵

                    مئے  گلرنگ  کی  تاثیر  سے  کِھنچ  کِھنچ  کے  اے  کیفیؔ

                    مرے  گھر  کی  طرف  بھی  آ  نکلتے  ہیں  بہاروں  میں

                     

                    محبوب  کبھی  عاشق  کے  گھر  کی  طرف  نہیں  آتا۔  وعدہ  کر  کے  توڑ  دیتا  ہے۔  لیکن  بہار  شراب  پینے  کا  موسم  ہے  اور  عاشق  کے  گھر  میں  مئے  گُلرنگ  کا  اثر  ایسا  ہے  کہ  محبوب  اُس  کی  چاہ  میں  کِھنچ  کر  آ  ہی  جاتا  ہے۔

                     

                    तकल्लुफ़ बरतरफ़ – चन्द्र भान कैफ़ी देहलवी

                    १

                    तकल्लुफ़ बरतरफ़ तश्रीफ़ रखिये बादा ख़ारौ में

                    जहां का ग़म ग़लत हो जाए गा अए शैख़ यारौं में

                    २

                    दुर-ए अश्क-ए नदामत चुन लिये शान-ए करीमी ने

                    मेरे मौला ने रख ली आब्रू परहेज़ गारौं में

                    ३

                    चमन-ज़ारौं मे जिस लाले पे बुल्बुल दाग़ खाता था

                    वो लाला है मेरे दाग़-ए जिगर की यादगारौं में

                    ४

                    मय-ए कौसर मिलेगी जब मिलेगी अब तो अए वा’एज़

                    बहार आई है जल्से हो रहे हैं बादा-ख़ारौं में

                    ५

                    मय-ए गुलरंग की तासीर से खिंच खिंच के अए कैफ़ी

                    मेरे घर की तरफ़ भी आ निकल्ते हैं बहारौं में

                     

                    मुंशी चंद्र भान माथुर कैफ़ी देहलवी (xxxx-१९४१)। उन की प्रारंभिक शिक्षा एक मिशन स्कूल में हुई, लेकिन वो छोटी उम्र से ही उर्दू, फ़ारसी और विशेष रूप से कविता की ओर आकर्षित थे, और जो भी शे’र सुनते उसे याद कर लेते थे। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन में भाग लिया और सभाओं में कई देशभक्तिपूर्ण नज़्में लिखीं और सुनाईं। वो एक स्कूल में फ़ारसी और उर्दू के उस्ताद थे और ‘हमारी ज़बान’ नामक द्वि-साप्ताहिक पत्रिका के संपादक रहे। उन का बहुत सा कलाम खो गया। उन के एक शागिर्द, शीश चंद्र तालिब देहलवी ने उन के निधन के दस साल बाद उन का कलाम एकत्र करके प्रकाशित किया। उन्होंने शास्त्रीय शैली में शास्त्रीय विषयों पर ग़ज़लें लिखीं और कई राष्ट्रीय नज़्में भी लिखीं।

                    १

                    तकल्लुफ़ बरतरफ़ तश्रीफ़ रखिये बादा-ख़ारौ में

                    जहां का ग़म ग़लत हो जाए गा अए शैख़ यारौं में

                     

                    औपचारिकता (formality) को अलग रखिये, शराब पीने वालौं में अप का स्वागत है, पधारिये। अए शैख़ ज़िन्दगी का सारा दुख दूर हो जाएगा जो दोस्तौं/यारौं के साथ बैठ कार शराब पियोगे। यहां ये भी कहा जाए के “तकल्लुफ़ बरतरफ़ का पहला प्रयोग है। इस शे’र के साथ साथ ये महावरा भी ख़ूब लोकप्रिय हो गया।

                    २

                    दुर-ए अश्क-ए नदामत चुन लिये शान-ए करीमी ने

                    मेरे मौला ने रख ली आब्रू परहेज़ गारौं में

                     

                    शा’एर/शराबी परहेज़ करने वालौं के साथ बैठा है और उसे अपने चलन पर खेद/पछतावा है। इस से उस के आंसू निकल पढे हैं। भगवान की कृपा इतनी शानदार है के आंसू को मोती कह कर उठा लिये और गुनहगार की दूसरौं के सामने इज़्ज़त रख ली। मोहम्मद एक़्बाल ने भी कहा था —

                    मोती समझ के शान-ए करीमी ने चुन लिये

                    आंसू जो थे मेरे अरक़-ए इन्फ़े’आल के

                    ३

                    चमन-ज़ारौं मे जिस लाले पे बुल्बुल दाग़ खाता था

                    वो लाला है मेरे दाग़-ए जिगर की यादगारौं में

                     

                    उर्दू शा’एरी में गुल-ओ-बुल्बुल का प्यार शिक्षात्मक/मिसाल माना जाता है। यहा लाला (tulip)-ओ-बुल्बुल कहा गया है, लैकिन बात वही है। सय्याद/शिकारी ने बुल्बुल को पिंजरे में बंद कर रक्खा है और वो लाले से दूरी की बजह से दुखी है – उस के दिल पर दाग़ है। शा’एर के दिल पर भी वैसी ही यादौं का दाग़ है।

                    ४

                    मय-ए कौसर मिलेगी जब मिलेगी अब तो अए वा’एज़

                    बहार आई है जल्से हो रहे हैं बादा-ख़ारौं में

                     

                    कहा जाता है के मरने के बाद, क़यामत के बाद, जन्नत में जाने पर शराब का नदियां मिलेंगी। कौसर जन्नत की एक नदी का नाम है। शा’एर बा’एज़ से कहता है के वो होगा तो देखा जाएगा। जब तक प्रतीक्षा/इन्तेज़ार करने का क्या ज़रूरत है। यहां अब बहार आई है और शराब पीने वालौं के जल्से/जमघट लगे हैं। क्यूं न अब ही इन के साथ जुढ कर शराब पी जाए।

                    ५

                    मय-ए गुलरंग की तासीर से खिंच खिंच के अए कैफ़ी

                    मेरे घर की तरफ़ भी आ निकल्ते हैं बहारौं में

                     

                    महबूब कभी आशिक़ के घर की ओर नहीं आता। आने का वा’दा करता है लैकिन पूरा नहीं करता। लाल शराब का असर ऐसा है और यूं बहार आई है के वो आकर्षित हो कर आ भी जाता है।

                     

                    takalluf bartaraf-chandr bhan kaifi dehlavi

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                    takalluf bartaraf tashriif rakhiye baada-KhwaaroN meN
                    jahaaN ka Gham-Ghalat ho jaa’ega aye shaiKh yaaroN meN
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                    dur-e ashk-e nadaamat chun liye shaan-e karimi ne
                    mere maula ne rakh lii aabru7 parhez-gaaroN8 meN
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                    chaman-zaaroN meN jis laal’e pe bulbul daaGh-khaata tha
                    vo laala hai mer’e daaGh-e jigar ki yaadgaaroN meN
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                    mai-e kausar mil’egi jab mil’egi ab to aye vaa’ez
                    bahaar aa’ii hai jals’e ho rah’e haiN baada-KhwaaroN meN
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                    mai-e gulraNg ki taasiir se khinch khinch ke aye kaifi
                    mer’e ghar ki taraf bhi aa nikalte haiN bahaaroN meN

                    munshi chandr bhaan maathur kaifi dehlavi (xxxx-1941).  His early education was in a mission school, but he was inclined towards urdu and faarsi and particularly poetry from an early age, memorizing any sh’er that he heard.  He participated in the swadeshi movement and wrote and recited many patriotic nazm in rallies.  He taught faarsi and urdu in a school and was editor of a bi-weekly magazine called ‘hamaari zabaan’.  Much of his work was lost.  One of his shaagird, shiish chandr taalib dehlavi, collected and published it ten years after his death.  He wrote Ghazal in classical style on classical themes and also wrote many nationalistic nazm.

                    1
                    takalluf1 bartaraf2 tashriif3 rakhiye baada-KhwaaroN4 meN
                    jahaaN ka Gham-Ghalat5 ho jaa’ega aye shaiKh yaaroN6 meN

                    1.formality 2.dismiss, set aside 3.(please) sit down 4.wine-drinkers, revelers 5.an expression meaning ‘forget worries’ 6.friends

                    O, shaiKh, set aside all formalities, you are welcome to sit down with revelers in the tavern.  You will forget all sorrows of the world among friends.

                    2
                    dur1-e ashk2-e nadaamat3 chun liye shaan4-e karimi5 ne
                    mere maula6 ne rakh lii aabru7 parhez-gaaroN8 meN

                    1.pearls 2.tears 3.regret, begging forgiveness 4.grandeur, dignity 5.benvolence 6.lord 7.respect, reputation 8.abstainers, observers of rules

                    The grandeur of his benevolence, picked/selected my tears of regret as if they were pearls.  My lord saved my dignity among all the abstainers i.e. god forgave him his sins because he begged forgiveness.  Said mohammed iqbal ….

                    moti samajh ke shaan-e kariimi ne chun liye
                    qatr’e jo th’e mer’e araq-e infe’aal ke
                    Valuing as pearls, the grandeur of magnanimity picked
                    Drops that were but tears of my remorse
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                    chaman-zaaroN1 meN jis laal’e2 pe bulbul daaGh-khaata3 tha
                    vo laala hai mer’e daaGh-e jigar ki yaadgaaroN4 meN

                    1.gardens 2.tulip 3.an expression meaning ‘reveiving the wound of love’ i.e. pining for the love of 4.memories

                    In urdu verse the bulbul and rose (and in this case) the bulbul and tulip are lovers.  In its bridsong the bulbul pines for the love of the rose (tulip) while the bird catcher cages the bulbul and the flower-picker picks the rose (tulip).  Thus, the tulip for which the bulbul used to pine in love, is also among the memories of the wound of the heart of the poet.

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                    mai1-e kausar2 mil’egi jab mil’egi ab to aye vaa’ez3
                    bahaar aa’ii hai jals’e ho rah’e haiN baada-KhwaaroN4 meN

                    1.wine 2.river (of wine) in heaven 3.preacher 4.revelers, patrons of the tavern

                    We will get the river of wine in paradise whenever we get it (sometime in the distant and uncertain future) but now, it is spring, and wine drinkers are gathered to celebrate, O, preacher.

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                    mai1-e gulraNg2 ki taasiir3 se khinch4 khinch ke aye kaifi
                    mer’e ghar ki taraf bhi aa nikalte haiN bahaaroN meN

                    1.wine 2.rose coloured 3.effect 4.pull, attraction

                    Normally the beloved stays away from the poet/lover and definitely from his house.  But sometimes in spring, because of the attractive effect i.e. temptation of rose coloured wine, she sometimes ventures towards his house.

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                    0 min
                  • Ghazal-KhwaaN ho gaya-Zhaang Shixuan inteKhaab aalam

                    https://urdushahkar.org/wp-content/uploads/2026/08/iaaZhSh-Ghazal-KhwaaN-ho-gaya-audio.mp3

                    Recitation

                    • اُردو
                    • تشریح
                    • देवनागरी
                    • व्याख्या
                    • Roman
                    • Explanation
                    • غزل  خواں  ہو  گیا  ۔  انتخاب  عالمؔ  ژانگ  شی  شوان

                      ۱

                      عشق  کی  رُت  میں  بپا  کیسا  یہ  طوفاں  ہو  گیا

                      لہلاتا  باغ،  پَل  بھر  میں  ویراں  ہو  گیا

                      ۲

                      عشق  کو  نابود  کرنا  اتنا  اسان  بھی  نہیں

                      بیج  دفنایا  گیا،  پودا  نمایاں  ہو  گیا

                      ۳

                      نور  ہوتا  ہے  جہاں،  سایہ  بھی  ہوتا  ہے  وہاں

                      ایک  دل  جب  خوش  ہوا،  اِک  دل  پریشاں  ہو  گیا

                      ۴

                      موت  ہوتی  ہے  دیے  کی  نور  کی  لیکن  نہیں

                      جب  ستارے  بجھ  گئے  سورج  فروزاں  ہو  گیا

                      ۵

                      غالباً  چینی  سے  بھی  شیریں  ہے  اُردو  دیکھیے

                      چین  کا  عالمؔ  بھی  اب  اس  میں  غزل  خواں  ہو  گیا

                       

                      انتخابِ عالم—ژانگ شی شوان (۱۹۳۳۔۲۰۲۶)، بیجنگ، چین۔ شی شوان کا اُردو میں ترجمہ “انتخابِ عالم” ہوتا ہے، اسی لیے انہوں نے یہ تخلُّص چُنا۔ وہ ایک چینی شہری، کلاسک شاعری کے دلدادہ عالِم اور خود بھی ایک شاعر تھے۔ جب وہ صحافت (journalism)  کے طالب علم تھے، تب انہیں اُردو کے ایک سخت کورس میں بھیج دیا گیا اور پاک-چین تعلقات کو بہتر بنانے کی ذمّہ داری دی گئی۔ وہ اُردو میں مہارت حاصل کرتے گئے، اُردو شاعری میں ان کی دلچسپی بڑھی اور انہوں نے بہت مطالعہ کرنا شروع کیا۔ ۱۹۷۰ کی دہائی میں، انہوں نے پاکستان سے آئے ہوئے شاعر منظر حسین رازی سے علمِ عروض (شاعری کے اوزان) سیکھا۔ اُنہیں پاکستان کی بیجنگ فارن اسٹڈیز یونیورسٹی میں پڑھانے کی دعوت دی گئی، جہاں اپنا کام مکمل کر کے وہ ۱۹۸۶ میں بیجنگ واپس آ گئے۔ اس کے بعد کچھ عرصے کے لیے ان کا اُردو شاعری اور تہذیب سے رابطہ ٹوٹ گیا، لیکن بیجنگ میں پاکستانی سفارت خانے کے مشاعروں میں شرکت کی وجہ سے یہ رابطہ دوبارہ بحال ہو گیا۔ ان کا کلام پاکستان کے ادبی رسالوں میں چھپتا رہا۔ اُنہوں نے فیض احمد فیضؔ کے مجموعہ کلام کا چینی زبان میں ترجمہ بھی کیا۔ پاکستان اکیڈمی آف لیٹرز نے ان کا سارا کلام جمع کر کے ۱۹۹۵ میں ان کا ایک دیوان شائع کیا۔

                      ۱

                      عشق  کی  رُت  میں  بپا  کیسا  یہ  طوفاں  ہو  گیا

                      لہلاتا  باغ،  پَل  بھر  میں  ویراں  ہو  گیا

                       

                      شاعر  محبت  کے  موسم  (بہار)  میں  آنے  والے  ایک  اچانک  طوفان  یا  آفت  پر  افسوس  کر  رہا  ہے۔  ایک  ہنستی  کھیلتی،  ہری  بھری  زندگی  یا  ایک  خوشی  سے  بھرپور  دل  (جسے  لہراتے  ہوئے  باغ  سے  تشبیہ  دی  گئی  ہے)  دیکھتے  ہی  دیکھتے،  صرف  ایک  پل  میں  اُجڑ  کر  ویران  ہو  گیا۔  یہ  آفت  کیا  تھی  اور  اتنی  بڑی  تبدیلی  اتنے  کم  وقت  میں  کیسے  آ  گئی؟  شاعر  نے  یہ  بات  ہمارے  تصوُّر  پر  چھوڑ  دی  ہے۔  لیکن  اس  کی  ایک  ممکنہ  وجہ  یہ  ہو  سکتی  ہے  کہ  رقیب  (عاشق  کا  دشمن)  محبوب  کا  دل  جیتنے  میں  کامیاب  ہو  گیا  ہو۔

                      ۲

                      عشق  کو  نابود  کرنا  اتنا  آساں  بھی  نہیں

                      بیج  دفنایا  گیا،  پودا  نمایاں  ہو  گیا

                       

                      سچی  محبت  کو  پوری  طرح  ختم  کرنا  یا  مٹانا  (نابود  کرنا)  اتنا  آسان  نہیں  ہوتا۔  بالکل  اسی  طرح  جیسے  مٹی  میں  بیج  کو  دفن  کرنے  سے  وہ  ختم  نہیں  ہوتا،  بلکہ  زمین  کو  پھاڑ  کر  ایک  پودے  کی  شکل  میں  باہر  نکل  آتا  ہے  اور  سب  کو  نظر  آنے  لگتا  ہے۔  محبت  کو  جتنا  دبانے  کی  کوشش  کی  جائے،  وہ  اتنی  ہی  زیادہ  کھل  کر  سامنے  آتی  ہے۔

                      ۳

                      نور  ہوتا  ہے  جہاں،  سایہ  بھی  ہوتا  ہے  وہاں

                      ایک  دل  جب  خوش  ہوا،  اِک  دل  پریشاں  ہو  گیا

                       

                      یہ  شعر  عاشق  اور  رقیب  کے  بیچ  چلنے  والے  روایتی  کھیل  کو  خوبصورتی  سے  بیان  کرتا  ہے۔  محبت  کی  دنیا  میں  محبوب  کی  توجّہ  ایک  محدود  روشنی  کی  طرح  ہے؛  وہ  جہاں  چمکتی  ہے،  وہاں  ایک  سایہ  بھی  ضرور  بنتا  ہے۔  جب  رقیب  محبوب  کا  دل  جیت  لیتا  ہے،  تو  اس  کی  دنیا  تو  خوشی  کی  روشنی  (نور)  سے  چمک  اُٹھتی  ہے،  لیکن  ٹھیک  اُسی  لمحے  ناکام  عاشق  دل  ٹوٹنے  کے  اندھیرے  اور  سائے  (پریشانی)  میں  ڈوب  جاتا  ہے۔  یہاں  ایک  کا  دل  تبھی  آباد  ہو  سکتا  ہے  جب  دوسرے  کا  دل  برباد  ہو۔

                      ۴

                      موت  ہوتی  ہے  دیے  کی،  نور  کی  لیکن  نہیں

                      جب  ستارے  بجھ  گئے  سُورج  فروزاں  ہو  گیا

                       

                      یہ  شعر  شاعر  کی  موت  اور  اس  کے  ادبی  سرمائے  کی  بقا  کے  بارے  میں  ایک  گہری  بات  کہتا  ہے۔  یہ  بالکل  انتخاب  عالم  کے  اسی  دوسرے  شعر  کی  عکاسی  کرتا  ہے

                      ٹوٹ  جاتا  ہے  قلم،  حرف  مگر  رہتا  ہے

                      پاؤں  چلتے  ہیں،  مگر  نقش  ٹھہر  جاتا  ہے

                      دیا  دراصل  شاعر  کے  مآدی  جسم  کی  علامت  ہے  جسے  ایک  دن  بجھنا  اور  مرنا  ہی  ہے۔  لیکن  اس  کا  نور  یعنی  اس  کی  شاعری  اور  خیالات  کی  روشنی  لافانی  ہے،  اسے  بجھایا  نہیں  جا  سکتا۔  شاعر  خود  بھلے  ہی  ستاروں  کی  طرح  اوجھل  ہو  جائے،  لیکن  اس  کے  الفاظ  ایک  چمکتے  ہوئے  سورج  کی  طرح  ابھر  کر  سامنے  آتے  ہیں۔

                      ۵

                      غالباً  چینی  سے  بھی  شیریں  ہے  اُردو  دیکھیے

                      چین  کا  عالمؔ  بھی  اب  اس  میں  غزل  خواں  ہو  گیا

                       

                      یہ  آخری  شعر  شاعرانہ  ذہانت  کا  ایک  بہترین  نمونہ  ہے،  جس  میں  اُردو  زبان  کی  مِٹھاس  کو  شاندار  خراجِ  تحسین  پیش  کیا  گیا  ہے۔  شاعر  نے  اپنی  بات  ثابت  کرنے  کے  لیے  بہت  خوبصورت  الفاظ  کا  کھیل  (wordplay)  کیا  ہے۔  پہلے  اُنہوں  نے  لفظ  “چینی”  کا  استعمال  کیا،  جس  کے  ایک  ساتھ  تین  مطلب  نکلتے  ہیں:  شکر،  چینی  زبان،  یا  چین  کا  باشندہ۔  ان  کا  کہنا  ہے  کہ  اُردو  شاید  شکر  یا  ان  کی  اپنی  مادری  زبان  سے  بھی  زیادہ  میٹھی  ہے۔  کیوںکہ  مادری  زبان  سے  موازنہ  کیا  ہے،  لفظِ  غالباً  سے  تھوڑی  سے  نرمی  آ  گئی  ہے۔  دوسرا،  انہوں  نے  اپنے  تخلص  “عالم”  کے  لفظی  معنی  کا  فائدہ  اٹھایا  ہے،  جس  کا  مطلب  “عالم”  (اسکالر/پڑھا  لکھا  شخص)  بھی  بنتا  ہے۔  اردو  کے  اس  سحر  کی  سب  سے  بڑی  دلیل  وہ  خود  ہیں:  یعنی  چین  کا  ایک  عالم  (عالمِ  چین)  اس  زبان  کے  عشق  میں  ایسا  گرفتار  ہوا  کہ  اب  وہ  اس  میں  غزلیں  لکھ  رہا  ہے۔

                       

                      ग़ज़ल ख़्वाँ हो गया — इन्तेख़ाब आलम ज़्शांग शिश्वान

                      १

                      इश्क़ की रुत में बपा कैसा ये तूफ़ाँ हो गया

                      लहलहाता बाग़, पल भर में वीराँ हो गया

                      २

                      इश्क़ को नाबूद करना इतना आसाँ भी नहीं

                      बीज दफ़्नाया गया, पौधा नुमायाँ हो गया

                      ३

                      नूर होता है जहाँ, साया भी होता है वहाँ

                      एक दिल जब ख़ुश हुआ, एक दिल परेशाँ हो गया

                      ४

                      मौत होती है दिये की, नूर की लेकिन नहीं

                      जब सितारे बुझ गए सूरज फ़रोज़ाँ हो गया

                      ५

                      ग़ालिबन चीनी से भी शीरीं है उर्दू देखिए

                      चीन का आलम भी अब इस में ग़ज़ल-ख़्वाँ हो गया

                       

                      इन्तेख़ाब आलम—ज़्शांग शिश्वान (१९३३-२०२६), बेजिंग, चीन। ‘शिश्वान’ का उर्दू में मतलब होता है ” इन्तेख़ाब आलम”, इसीलिए उन्होंने ये तख़ल्लुस (उपनाम) चुना। वो एक चीनी नागरिक, क्लासिकल शा’एरी के शौक़ीन विद्वान और ख़ुद भी एक कवि थे। जब वो पत्रकारिता (journalism) के छात्र थे, तब उन्हें उर्दू के एक कड़े कोर्स में भेज दिया गया और पाक-चीन संबंधों को बेहतर बनाने का काम सौंपा गया। वो उर्दू में माहिर होते गए, उर्दू शा’एरी में उनकी दिलचस्पी बढ़ी और उन्होंने बहुत पढ़ना शुरू कर दिया। १९७० के दशक में, उन्होंने पाकिस्तान से आए कवि मंज़र हुसैन राज़ी से इल्म-ए-अरूज़ (शा’एरी के नियम और व्याकरण) सीखा। उन्हें Beijing Foreign Studies University की तरफ़ से पाकिस्तान में पढ़ाने के लिये आमंत्रित किया गया था। अपना assignment पूरा कर के वो १९८६ में बेजिंग लौट आए, जिस की वजह से कुछ समय के लिये उन का उर्दू शा’एरी और संस्कृति से संपर्क टूट गया। लेकिन बेजिंग में पाकिस्तानी दूतावास के मुशा’एरों में हिस्सा लेने से ये संपर्क फिर से ज़िंदा हो गया। उन का काम पाकिस्तान की पत्रिकाओं में छपता रहा। उन्होंने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कविताओं के संग्रह का चीनी भाषा में अनुवाद भी किया। Pakistan Academy of Letters ने उन के काम को इकट्ठा किया और १९९५ में उनका एक दीवान (काव्य-संग्रह) प्रकाशित किया।

                      १

                      इश्क़ की रुत में बपा कैसा ये तूफ़ाँ हो गया

                      लहलहाता बाग़, पल भर में वीराँ हो गया

                      कवि मोहब्बत के मौसम (बहार) में आने वाले एक अचानक तूफ़ान या आफ़त पर अफ़्सोस कर रहा है। एक हँसती-खेलती, हरी-भरी ज़िंदगी या एक ख़ुशी से भरपूर दिल (जिसे लहलहाते हुए बाग़ से तुलना की गई है) देखते ही देखते, सिर्फ़ एक पल में उजड़ कर वीरान हो गया। ये आफ़त क्या थी और इतना बड़ा बदलाव इतने कम समय में कैसे आ गया? कवि ने ये बात हमारी कल्पना पर छोड़ दी है। लेकिन इस की एक मुमकिन वजह ये हो सकती है के रक़ीब (कवि का प्रतिद्वंदी) महबूब का दिल जीतने में कामयाब हो गया हो।

                      २

                      इश्क़ को नाबूद करना इतना आसाँ भी नहीं

                      बीज दफ़्नाया गया, पौधा नुमायाँ हो गया

                       

                      सच्ची मोहब्बत को पूरी तरह ख़त्म करना या मिटाना (नाबूद करना) इतना आसान नहीं होता। बिल्कुल उसी तरह जैसे मिट्टी में बीज को दफ़्न करने से वो ख़त्म नहीं होता, बल्के ज़मीन को फाड़ कर एक पौधे की शक्ल में बाहर निकल आता है और सब को साफ़ दिखने (नुमायाँ होने) लगता है। मोहब्बत को जितना दबाने की कोशिश की जाए, वो उतनी ही ज़्यादा खुल कर सामने आती है।

                      ३

                      नूर होता है जहाँ, साया भी होता है वहाँ

                      एक दिल जब ख़ुश हुआ, एक दिल परेशाँ हो गया

                       

                      ये शे’र प्रेमी और रक़ीब (प्रतिद्वंदी) के बीच चलने वाले क्लासिक खेल को ख़ूबसूरती से दिखाता है। मोहब्बत की दुनिया में महबूब की तवज्जो (affection) एक सीमित रौशनी की तरह है; वो जहाँ चमकती है, वहाँ एक परछाई (साया) भी ज़रूर बनती है। जब रक़ीब महबूब का दिल जीत लेता है, तो उस की दुनिया तो ख़ुशी की रौशनी (नूर) से चमक उठती है, लेकिन ठीक उसी पल नाकाम प्रेमी अँधेरे और परेशानी के साए में डूब जाता है। यहाँ एक का दिल तभी आबाद हो सकता है जब दूसरे का दिल बर्बाद हो।

                      ४

                      मौत होती है दिये की, नूर की लेकिन नहीं

                      जब सितारे बुझ गए सूरज फ़रोज़ाँ हो गया

                       

                      ये शे’र कवि की मृत्यु और उस की कलात्मक विरासत (legacy) की अमरता के बारे में एक गहरी बात कहता है। यह बिल्कुल इंतिख़ाब आलम के उसी दूसरे शे’र को दर्शाता है के

                      टूट जाता है क़लम, हर्फ़ मगर रहता है

                      पाँव चलते हैं, मगर नक़्श ठहर जाता है

                      दिया दर’अस्ल कवि के शरीर का प्रतीक है जिसे एक दिन बुझना और मरना ही है। लेकिन उस का नूर यानी उस की कविता और विचारों की रोशनी अमर है, उसे बुझाया नहीं जा सकता। कवि ख़ुद भले ही सितारों की तरह आँखों से ओझल (बुझ) हो जाए, लेकिन उस के शब्द एक चमकते हुए सूरज (सूरज फ़रोज़ाँ) की तरह उभर कर सामने आते हैं।

                      ५

                      ग़ालिबन चीनी से भी शीरीं है उर्दू देखिए

                      चीन का आलम भी अब इस में ग़ज़ल-ख़्वाँ हो गया

                       

                      ये आख़िरी शे’र कवि का शब्दौं के खेल का एक बेहतरीन नमूना है, जिस में उर्दू भाषा की मिठास की शानदार प्रशंसा की गई है। कवि ने अपनी बात साबित करने के लिए बहुत ही चतुरता से शब्दों का खेल (wordplay) किया है। पहले उन्हों ने शब्द “चीनी” का इस्तेमाल किया, जिस के एक साथ तीन मतलब निकलते हैं: शक्कर, चीनी भाषा, या चीन वासी। उन का कहना है के उर्दू शा’एद शक्कर या उन की अपनी मातृभाषा से भी ज़्यादा मीठी (शीरीं) है। दूसरा, उन्होंने अपने तख़ल्लुस “आलम” के लिखित और ध्वन्यात्मक (phonetic) रूप का फ़ा’एदा उठाया है, जिस का मतलब “आलिम” (विद्वान/स्कॉलर) भी बनता है। उर्दू के इस जादू का सबसे बड़ा सुबूत वो ख़ुद हैं: यानी चीन का एक आलिम (विद्वान) इस भाषा के प्यार में ऐसा गिरफ़्तार हुआ के अब वो इसी में ग़ज़लें लिख रहा है।

                       

                      Ghazal KhwaaN ho gaya — inteKhaab aalam-Zhaang Shixuan

                      1
                      ishq ki rut me’N bapa kaisa ye toofaaN ho gaya
                      lahlahata baaGh, pal bhar me’N viiraaN ho gaya
                      2
                      ishq ko naabood karna itna aasaaN bhi nahiN
                      biij dafnaaya gaya, pauda numayaaN ho gaya
                      3
                      noor hota hai jahaaN, saaya bhi hota hai vahaaN
                      ek dil jab Khush hua, ek dil pareshaaN ho gaya
                      4
                      maut hoti hai diye ki, noor ki lekin nahiN
                      jab sitaar’e bujh gaye sooraj farozaaN ho gaya
                      5
                      Ghaaliban chiini se bhi shiiriiN hai urdu dekhiye
                      chiin ka aalam bhi ab is me’N Ghazal-KhwaaN ho gaya

                      inteKhaab aalam-Zhang Shixuan (1933-2026), Beijing, China.  Shixuan translated in urdu means inteKhaab aalam, hence the taKhallus.  He was a Chinese national, scholar interested in classical poetry, poet.  When he was still a student of journalism, he was reassigned to an intensive urdu study course and tasked with developing China-pakistan relationships.  He became proficient in urdu, interested in urdu shaa’eri and started reading a lot.  In the 1970s he learned arooz from visiting pakistani shaa’er manzar husain razi.  He was invited to teach at the Beijing Foreign Studies University in pakistan, finished his assignment and returned to beijing in 1986, causing him to loose contact with urdu shaa’eri and culture, which was revived by participation in mushaa’era in the pakistani embassy in beijing.  His work was published in magazines in pakistan.  He also translated faiz ahmed faiz’s collection into Chinese.  The Pakistan Academy of Letters collected his work and published a diivaan in 1995.

                      1
                      ishq ki rut me’N bapa kaisa ye toofaaN ho gaya
                      lahlahata baaGh, pal bhar me’N viiraaN ho gaya

                      The poet laments a sudden storm/disaster in the season of love. A thriving, green, and happy life or a happy heart (portrayed as a blooming garden) was unexpectedly devastated and turned into a desolate wasteland in just a single moment.  What was this disaster and how could such a change happen in just a minute/short time.  The poet leaves it to us to imagine.  One likely candidate is that the rival won the beloved’s heart.

                      2
                      ishq ko naabood karna itna aasaaN bhi nahiN
                      biij dafnaaya gaya, pauda numayaaN ho gaya

                      It is not easy to completely destroy or suppress (or render it non-existent-naabood) true love. Just like burying a seed in the dark soil only causes it to break through the earth and sprout and keep growing into an obvious plant/tree, trying to suppress love only makes it manifest more strongly.

                      3
                      noor hota hai jahaaN, saaya bhi hota hai vahaaN
                      ek dil jab Khush hua, ek dil pareshaaN ho gaya

                      This verse beautifully illustrates the classic, zero-sum game between the lover and the rival (raqiib). In the universe of romance, the beloved’s affection is a finite light; where it shines, it creates an inevitable shadow. When the rival wins the beloved’s heart, his world is instantly illuminated with joy (noor), but that very same moment casts the rejected lover into the dark, anxious shadow of heartbreak (pareshaaN). One heart cannot celebrate a victory in love without another being completely ruined.

                      4
                      maut hoti hai diye ki, noor ki lekin nahiN
                      jab sitaar’e bujh gaye sooraj farozaaN ho gaya

                      This verse serves as a profound metaphor for mortality of the poet and immortality of his artistic legacy, perfectly mirroring the sentiment in another she’r of inteKhaab aalam …

                      TooT jaata hai qalam, harf magar rahta hai
                      paa’uN chalt’e haiN, magar naqsh Thah’r jaata hai
                      … that “the pen breaks, but the word endures.” The diya (lamp) represents the physical body of the poet, which must eventually burn out and face death. However, its noor (light)—the poet’s creative and intellectual legacy—is immortal and cannot be extinguished. The poet himself may fade like the stars but his words emerge as the  everlasting, radiant sun (sooraj farozaaN).
                      5
                      Ghaaliban chiini se bhi shiiriiN hai urdu dekhiye
                      chiin ka aalam bhi ab is me’N Ghazal-KhwaaN ho gaya

                      The final verse is a masterclass in poetic wit, delivering a profound compliment to the immense sweetness of urdu. The poet uses a clever double wordplay to prove his point. First, he plays on “chiini,” which simultaneously means sugar, the Chinese language, and a Chinese person—suggesting urdu may be (Ghaaliban) even sweeter than sugar or his own native tongue. Second, he exploits the visual and phonetic duality of “aalam“, which is both his taKhallus (pen name) and the arabi/urdu word for a scholar aalim. As ultimate proof of urdu‘s intoxicating charm, he points to himself: a scholar from China (chiin ka aalim) who has been so completely conquered by the language that he has transitioned to a passionate composer of its Ghazals.

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                    • fikr ka haasil kah’eN jis’e-raghupati sahay firaaq gorakhpuri

                      https://urdushahkar.org/wp-content/uploads/2026/08/rsfg-fikr-ka-haasil-kaheN-jise-audio.mp3

                      Recitation

                      • اُردو
                      • تشریح
                      • देवनागरी
                      • व्याख्या
                      • Roman
                      • Explanation
                      • فِکر  کا  حاصِل  کہیں  جسے  ۔  رگھوپتی  سہائے  فراقؔ  گورکھ  پوری

                        ۱

                        ایک  ایک  یاد  عمر  کا  حاصل  کہیں  جسے

                        وہ  خَلوتِ  خیال  کہ  محفل  کہیں  جسے

                        ۲

                        تابندگیِ  فکر  کے  اس  آئینے  میں  دیکھ

                        اپنا  جمال  تیرا  مقابل  کہیں  جسے

                        ۳

                        ملتی  ہو  تو  خرید،  دو  عالم  کو  بیچ  کر

                        وہ  کائناتِ  دردِ  نہاں  دِل  کہیں  جسے

                        ۴

                        ہم  بحرِ  عشق  تیر  تو  جائیں  مگر  نہیں

                        ایسا  کوئی  کنارہ  کہ  ساحل  کہیں  جسے

                        ۵

                        لہرا  رہی  ہیں  گردش  خوں  میں  حقیقتیں

                        وہ  کون  زندگی  ہے  کہ  باطل  کہیں  جسے

                        ۶

                        آتا  ہے  کون  جانب  گلزار  دوش  پر

                        وہ  زُلف  حلقہ  حلقہ  سلاسل  کہیں  جسے

                        ۷

                        اکثر  ملا  ہے  مجھ  کو  سرِ  منزلِ  حیات

                        تیرا  خیال  راہ  میں  حائل  کہیں  جسے

                        ۸

                        پہنائے  دو  جہاں  میں  کہاں  ہے  تیرے  سوا

                        اے  دل  کوئی  مقام  کہ  منزل  کہیں  جسے

                        ۹

                        ہیں  اہلِ  حُسن  زیبِ  کمر  دشنۂ  دودم

                        اتنا  نہیں  ہے  کوئی  کہ  قاتل  کہیں  جسے

                        ۱۰

                        لطفِ  بیاں  سکوت  میں  بھی  نطق  تو  وہ  ہے

                        تیری  نگاہِ  ناز  کا  قائل  کہیں  جسے

                        ۱۱

                        اے  سوزِ  سازِ  غم  وہ  زرِ  داغِ  دل  لٹائیں

                        ہاں  اس  عیارِ  ناز  کے  قابل  کہیں  جسے

                        ۱۲

                        ہُوں  بے  نیازِ  غم  مگر  اِس  دل  کو  کیا  کروں

                        سارے  جہاں  کے  درد  میں  شامِل  کہیں  جسے

                        ۱۳

                        واعظ  نے  علم  کو  بھی  کھڑا  سر  کے  بل  کیا

                        ایسا  پڑھا  لکھا  ہے  کہ  جاہل  کہیں  جسے

                        ۱۴

                        دھوکا  نہ  دے  تجھے  مری  درماندگی  کہیں

                        میں  وہ  شکستہ  پا  ہوں  کہ  منزل  کہیں  جسے

                        ۱۵

                        جذبِ  نہاں  کی  رو  سے  توجہ  تو  بس  وہ  ہے

                        خالِ  رُخِ  صبیح  پہ  مائل  کہیں  جسے

                        ۱۶

                        وہ  اِک  خیال  کاش  کہ  لفظوں  میں  ڈھل  سکے

                        سنجیدگی  کی  فِکر  کا  حاصل  کہیں  جسے

                        ۱۷

                        تحسینِ  اہلِ  فن  کے  لیے  کر  رہا  ہوں  پیش

                        آساں  حدیثِ  عشق  کہ  مشکل  کہیں  جسے

                        ۱۸

                        دیکھیں  گے  اس  غزل  میں  دھڑکتا  ہوا  وہ  دل

                        رعنائیِ  خیال  کا  بسمل  کہیں  جسے

                        ۱۹

                        میری  نوا  ہے  ماتمِ  یک  شہرِ  آرزو

                        یعنی  فراقؔ  اہل  جہاں  دل  کہیں  جسے

                         

                        رگھوپتی سہائے فراقؔ گورکھپوری (۱۸۹۶۔۱۹۸۲) کے والد گورکھ پرشاد ایک زمیندار اور پیشے سے وکیل تھے، جو ‘عبرت’ تخلص کے ساتھ شاعری بھی کرتے تھے۔ فراقؔ نے گھر پر ہی اُردو اور فارسی کی تعلیم حاصل کی۔ اُن کی پہلی غزل ۲۰ سال کی عمر میں اُس وقت سامنے آئی جب وہ کالج کے طالب علم تھے، اور اُسے منشی پریم چند کے مشورے اور تاثر پر شائع کیا گیا۔ سینٹرل کالج الٰہ آباد سے بی۔اے مکمّل کرنے کے بعد وہ ملک کی سیاست میں عملی طور پر شامل ہو گئے۔ ۱۹۲۰ میں اُنہیں گرفتار کیا گیا اور انہوں نے ۱۸ ماہ جیل میں گزارے۔ کچھ عرصے تک اُنہوں نے کانگریس پارٹی کے لیے کام کیا، لیکن آزادی کے بعد سیاست سے کنارہ کشی اِختیار کر لی۔ ۱۹۳۰ میں انہوں نے آگرہ یونیورسٹی سے انگریزی ادب میں ایم۔اے کا امتحان پاس کیا اور الٰہ آباد یونیورسٹی میں انگریزی کے لیکچرر مقرر ہو گئے۔ ان کی گھریلو زندگی ایک ناخوشگوار شادی اور بیٹے کی خودکشی کی وجہ سے کافی تلخ اور تکلیف دہ رہی۔ اُنہیں متعدد اعزازات سے نوازا گیا—۱۹۶۱میں ساہتیہ اکادمی ایوارڈ، ۱۹۶۸ء میں سوویت نہرو ایوارڈ، پدم بھوشن، اور گیان پیٹھ ایوارڈ، ۱۹۸۱ میں غالب ایوارڈ۔ غالبؔ کی غزل، تجھ سا کہیں جسے، کی زمین میں ہونے کی وجہ سے اِسے غالبؔ نقشِ قدم سے منسلک کیا گیا ہے۔

                        ۱

                        ایک  ایک  یاد  عمر  کا  حاصل  کہیں  جسے

                        وہ  خَلوتِ  خیال  کہ  محفل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  (یا  غم  زدہ  عاشق)  زندگی  بھر  کی  جمع  شُدہ  یادوں  پر  غور  کرتا  ہے  اور  اُنہیں  زندگی  کی  اصل  کمائی  یا  حاصل  قرار  دیتا  ہے۔  تنہائی  میں  خیالات  کا  غلبہ  (خلوتِ  خیال)  ان  محفوظ  یادوں  سے  اس  قدر  بھر  جاتا  ہے  کہ  وہ  تنہائی  بھی  ایک  بھیڑ  بھری  مجلس  یا  محفل  کا  روپ  دھار  لیتی  ہے۔

                        ۲

                        تابندگیِ  فکر  کے  اس  آئینے  میں  دیکھ

                        اپنا  جمال  تیرا  مقابل  کہیں  جسے

                         

                        یہ  شعر  خود  شناسی  کی  ایک  دعوت  ہے۔  انسان  سے  خطاب  کرتے  ہوئے  شاعر  اُسے  روشن  فکری  (تابندگیِ  فکر)  کے  آئینے  میں  دیکھنے  کا  مشورہ  دیتا  ہے۔  اس  آئینے  میں  انسان  کو  اپنی  اصل  قدر  و  قیمت  اور  شان  (جمال)  اپنے  سامنے  (مقابل)  نظر  آئے  گی۔

                        ۳

                        ملتی  ہو  تو  خرید،  دو  عالم  کو  بیچ  کر

                        وہ  کائناتِ  دردِ  نہاں  دِل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  کا  کہنا  ہے  کہ  “دل”  کی  قیمت  دونوں  جہان  ۔  مآدی  اور  روحانی  ۔  سے  زیادہ  ہے۔  اگر  یہ  مل  سکے  تو  سب  کچھ  بیچ  کر  بھی  اسے  خرید  لو۔  یہ  “دل”  کیا  ہے؟  چھپے  ہوئے  درد  کی  ایک  پوری  کائنات  (کائناتِ  دردِ  نہاں)۔  شاعر  ایک  حساس  اور  درد  مند  دل  کی  بڑی  قدر  کرتا  ہے،  اور  یہاں  اشارہ  ہے  کہ  یہ  دل  دوسروں  کے  دکھ  درد  کو  محسوس  کرنے  کی  صلاحیت  رکھتا  ہے۔

                        ۴

                        ہم  بحرِ  عشق  تیر  تو  جائیں  مگر  نہیں

                        ایسا  کوئی  کنارہ  کہ  ساحل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  کہتا  ہے  کہ  اِنسان  عشق  کے  سمندر  (بحرِ  عشق)  میں  تیر  تو  سکتا  ہے،  لیکن  یہ  جدّوجہد  کبھی  ختم  ہونے  والی  نہیں۔  عشق  ایک  ایسا  بے  کنار  سمندر  ہے  جس  کا  کوئی  ساحل  نہیں  جہاں  پہنچ  کر  انسان  سُستا  سکے۔  یہ  اس  بات  کو  مضبوط  کرتا  ہے  کہ  منزل  سے  زیادہ  سفر  خود  اہم  ہے۔  ایک  ذرا  گہرا  نقطۂ  نظر  یہ  بھی  ہے  کہ  ساحل  دراصل  جمود  اور  بے  عملی  کی  جگہ  ہے۔  عشق  کے  سمندر  میں  ساحل  پر  بیٹھ  کر  تماشائی  بننے  کی  اجازت  نہیں؛  یہاں  آپ  کو  کودنا/ڈوبنا  پڑے  گا،  عمل  کرنا  پڑے  گا  اور  مسلسل  جدوجہد  کرنی  پڑے  گی۔

                        ۵

                        لہرا  رہی  ہیں  گردشِ  خوں  میں  حقیقتیں

                        وہ  کون  زندگی  ہے  کہ  باطل  کہیں  جسے

                         

                        زندگی  کی  تلخ  اور  سچّی  حقیقتیں  اِنسان  کے  خون  کی  گردش  کے  طوفان  میں  لہرا  رہی  ہیں۔  شاعر  کا  مطالبہ  ہے  کہ  ہم  زندگی  کے  سچے  اور  سخت  مرحلوں  کا  بلا  خوف  سامنا  کریں۔  وہموں،  جھوٹے  دلاسوں  اور  خود  فریبیوں  (باطل)  میں  پناہ  لے  لینا  ایک  بے  مقصد  زندگی  ہے  ۔  اور  ایسی  زندگی  کا  بھی  کیا  جینا؟

                        ۶

                        آتا  ہے  کون  جانبِ  گلزار  دوش  پر

                        وہ  زُلف  حلقہ  حلقہ  سلاسل  کہیں  جسے

                         

                        یہاں  شعر  کا  انداز  روایتی  اور  عاشقانہ  ہے،  جو  غزل  کی  روایت  کے  مطابق  بالکل  جائز  ہے  کیونکہ  ہر  شعر  اپنی  جگہ  ایک  مُکمّل  مضمون  ہوتا  ہے۔  روایتی  استعاروں  کا  استعمال  کرتے  ہوئے  شاعر  اپنے  محبوب  کو  بستان/گلزار  کی  طرف  آتے  ہوئے  دکھاتا  ہے،  جس  کے  کندھوں  پر  زلفیں  بکھری  ہوئی  ہیں  اور  اس  کا  ہر  حلقہ  عاشق  کے  لیے  زنجیر  کی  کڑیوں  (سلاسل)  کی  طرح  ہے۔

                        ۷

                        اکثر  ملا  ہے  مجھ  کو  سرِ  منزلِ  حیات

                        تیرا  خیال  راہ  میں  حائل  کہیں  جسے

                         

                        زندگی  کے  سفر  کے  بالکل  آغاز  (سرِ  منزلِ  حیات)  پر  ہی  شاعر  کو  ایک  بڑی  رکاوٹ  (حائل)  کا  سامنا  ہوتا  ہے:  اور  وہ  ہے  محبوب  کی  یاد  یا  اس  کا  خیال  (تیرا  خیال)۔  پچھلے  شعر  کی  زنجیروں  (سلاسل)  کا  تسلسل  برقرار  رکھتے  ہوئے،  محبوب  کا  خیال  مسافر  کے  لئے  اپنے  مقصدِ  حیات  کی  طرف  بڑھنے  سے  پہلے  ہی  دنیاوی  لگاؤ  اور  جذباتی  اُلجھنوں  میں  جکڑے  جانے  کا  اندیشہ  ہے۔  یہاں  محبوب  کے  خیال  سے  مراد  تمام  دنیاوی  اور  ذاتی  تعلقات  بھی  لیا  جا  سکتا  ہیں۔

                        ۸

                        پہنائے  دو  جہاں  میں  کہاں  ہے  تیرے  سوا

                        اے  دل  کوئی  مقام  کہ  منزل  کہیں  جسے

                         

                        اپنے  ہی  دل  سے  مخاطب  ہو  کر  شاعر  کہتا  ہے  کہ  دونوں  جہان  کی  اتنی  بڑی  وسعت  (پہنائے  دو  جہاں)  میں  دل  کے  علاوہ  کوئی  سچّی  جگہ  یا  منزل  نہیں  ہے۔  دل  (یعنی  عالمگیر  محبت)  ہی  اس  کائنات  کا  اصل  مرکز  اور  نقطہ  پرکار  ہے۔

                        ۹

                        ہیں  اہلِ  حُسن  زیبِ  کمر  دشنۂ  دودم

                        اتنا  نہیں  ہے  کوئی  کہ  قاتل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  دیکھتا  ہے  کہ  خوبصورت  لوگ  (اہلِ  حسن)  اپنی  کمر  پر  سجاوٹ  کے  لیے  دو  دھاری  خنجر  (دشنۂ  دو  دم)  باندھے  پھرتے  ہیں۔  لیکن  یہ  صرف  ایک  دکھاوا  یا  ادا  ہے؛  ان  میں  سے  کسی  کے  اندر  بھی  اتنا  دم  یا  سچا  ارادہ  نہیں  کہ  وہ  واقعی  کسی  کا  قتل  کر  سکے  یا  سچا  “قاتل”  کہلا  سکے۔

                        ۱۰

                        لطفِ  بیاں  سکوت  میں  بھی  نطق  تو  وہ  ہے

                        تیری  نگاہِ  ناز  کا  قائل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  سچّی  گفتگو  یا  بیاں  (نطق)  اُسے  مانتا  ہے  جو  مکمّل  خاموشی  (سکوت)  میں  بھی  اپنا  اثر  دکھائے۔  اصل  بات  چیت  تو  محبوب  کی  نگاہِ  ناز  کی  ہے،  جو  بغیر  کچھ  کہے  بھی  عاشق  کو  اپنا  قائل  کر  لیتی  ہے  اور  دل  میں  اُتر  جاتی  ہے۔

                        ۱۱

                        اے  سوزِ  سازِ  غم  وہ  زرِ  داغِ  دل  لٹائیں

                        ہاں  اس  عیارِ  ناز  کے  قابل  کہیں  جسے

                         

                        غم  کے  نغمے  کی  تڑپ  (سوزِ  سازِ  غم)  سے  خطاب  کرتے  ہوئے  شاعر  کہتا  ہے  کہ  دل  کے  زخموں  کی  دولت  (زرِ  داغِ  دل)  کو  لٹا  دینا  چاہیے۔  لیکن  یہ  جذباتی  سرمایا  صرف  اور  صرف  اس  خاص  ہستی—یعنی  محبوب—پر  نچھاور  ہونا  چاہیے  جو  سچّے  ناز  و  ادا  کے  معیار  (عیارِ  ناز)  پر  پورا  اترتی  ہو۔

                        ۱۲

                        ہُوں  بے  نیازِ  غم  مگر  اِس  دل  کو  کیا  کروں

                        سارے  جہاں  کے  درد  میں  شامِل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  ذاتی  غم  و  الم  سے  خود  کو  الگ  تھلگ  (بے  نیاز)  محسوس  کرتا  ہے،  لیکن  وہ  اپنے  دل  کی  فطرت  کو  نہیں  بدل  سکتا۔  یہ  دل  خود  بخود  پوری  دنیا  کے  انسانوں  کے  دکھ  درد  (سارے  جہاں  کے  درد)  کو  اپنے  اندر  سمیٹ  لیتا  ہے  اور  ان  کا  شریک  بن  جاتا  ہے۔  جیسا  کہ  امیر  مینائی  نے  بھی  کہا  تھا

                        خنجر  چلے  کسی  پہ  تڑپتے  ہیں  ہم  امیرؔ

                        سارے  جہاں  کا  درد  ہمارے  جگر  میں  ہے

                        ۱۳

                        واعظ  نے  علم  کو  بھی  کھڑا  سر  کے  بل  کیا

                        ایسا  پڑھا  لکھا  ہے  کہ  جاہل  کہیں  جسے

                         

                        یہ  ظاہری  اور  سخت  گیر  واعظ  پر  ایک  طنز  ہے۔  اپنی  تمام  تر  پڑھائی  لکھائی  کے  باوجود،  واعظ  نے  اپنے  تنگ  نظر  اور  غیر  فطری  افکار  سے  علم  کا  حلیہ  بگاڑ  دیا  ہے  (سر  کے  بل  کھڑا  کر  دیا  ہے)،  جس  کی  وجہ  سے  وہ  پڑھا  لکھا  ہونے  کے  باوجود  ایک  جاہل  کے  برابر  ہی  ہے۔

                        ۱۴

                        دھوکا  نہ  دے  تجھے  مری  درماندگی  کہیں

                        میں  وہ  شکستہ  پا  ہوں  کہ  منزل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  خبردار  کرتا  ہے  کہ  اس  کی  تھکن  اور  بے  بسی  (درماندگی)  کو  سفر  کی  ناکامی  نہ  سمجھا  جائے۔  اس  کی  یہ  ٹوٹی  ہوئی  حالت  (شکستہ  پا)  سفر  کے  درمیان  کوئی  رکاوٹ  نہیں،  بلکہ  اس  راستے  میں  خود  کو  پوری  طرح  مِٹا  دینے  کا  لازمی  نتیجہ  ہے۔  چونکہ  باہر  کوئی  ٹھہری  ہوئی  منزل  نہیں  ہے،  اس  لیے  سچی  تلاش  کی  راہ  میں  حاصل  ہونے  والی  یہ  تھکن  اور  حالت  ہی  اصل  منزل  بن  جاتی  ہے۔

                        ۱۵

                        جذبِ  نہاں  کی  رو  سے  توجہ  تو  بس  وہ  ہے

                        خالِ  رُخِ  صبیح  پہ  مائل  کہیں  جسے

                         

                        ظاہری  طور  پر  عاشقانہ  لگنے  کے  باوجود،  یہ  شعر  سچّی  توجّہ  اور  لگن  کی  تعریف  کرتا  ہے۔  روشن  چہرے  پر  تِل  (خالِ  رخِ  صبیح)  کو  ایک  مرکزی  نقطے  کی  علامت  بناتے  ہوئے،  شاعر  کہتا  ہے  کہ  سچّی  توجّہ  زبردستی  یا  فرضی  ذِمّہ  داری  سے  پیدا  نہیں  کی  جا  سکتی۔  اصل  توجّہ  تو  وہ  ہے  جو  اندرونی  کشِش  اور  سچّے  جذبے  (جذبِ  نہاں)  کی  رَو  میں  خود  بخود  کسی  ایک  نقطے  پر  قائم  ہو  جائے۔

                        ۱۶

                        وہ  اِک  خیال  کاش  کہ  لفظوں  میں  ڈھل  سکے

                        سنجیدگی  کی  فِکر  کا  حاصل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  اس  بات  پر  افسوس  اور  الجھن  کا  اظہار  کرتا  ہے  کہ  کسی  گہرے  اور  سنجیدہ  فکر  (سنجیدگی  کی  فکر)  کے  نچوڑ  یا  حاصل  کو  لفظوں  کے  روپ  میں  ڈھالنا  کتنا  مشکل  ہے۔  وہ  خواہش  کرتا  ہے  کہ  کاش  وہ  خاص  خیال  لفظوں  میں  آ  سکے،  لیکن  زبان  کی  محدودیت  اور  سطحی  پن  کے  باعث  اتنی  گہری  فکر  کو  بیان  کرنا  بے  حد  دشوار  ہے۔  جیسا  کہ  غالب  نے  بھی  اپنے  فارسی  شعر  میں  خیالات  کو  الفاظ  میں  ڈھالنے  کی  مشقت  کا  ذکر  کیا  ہے۔

                        غالبؔ  نہ  بود  شیوۂ  من  قافیہ  بندی

                        ظلمیست  کہ  بر  کلک  و  ورق  میکُنم  اِمشب

                        ۱۷

                        تحسینِ  اہلِ  فن  کے  لیے  کر  رہا  ہوں  پیش

                        آساں  حدیثِ  عشق  کہ  مشکل  کہیں  جسے

                         

                        عشق  کا  بیان  اور  اس  کے  مسائل  (حدیثِ  عشق)  اپنی  جگہ  بے  حد  گہرے  اور  مشکل  ہیں۔  لیکن  شاعر  اس  مشکل  بات  کو  بہت  سادہ  اور  آسان  زبان  (آساں  حدیث)  میں  ڈھال  کر  فن  کے  ماہرین  (اہلِ  فن)  کے  سامنے  پیش  کر  رہا  ہے،  تاکہ  وہ  اُس  کی  اس  مہارت  کی  داد  اور  تحسین  دے  سکیں۔

                        ۱۸

                        دیکھیں  گے  اس  غزل  میں  دھڑکتا  ہوا  وہ  دل

                        رعنائیِ  خیال  کا  بسمل  کہیں  جسے

                         

                        شاعر  کا  دعویٰ  ہے  کہ  قاری  کو  اِس  غزل  میں  ایک  دھڑکتا  ہوا  دل  ملے  گا۔  یہ  دل  شاعرانہ  سوچ  اور  خیال  کی  بے  پناہ  خوبصورتی  (رعنائیِ  خیال)  کا  بِسمل  (زخمی  یا  قربان  ہوا)  ہے۔  یہ  وہی  خیال  ہے  جسے  پچھلے  شعر  میں  لفظوں  میں  ڈھالنا  مشکل  ہو  رہا  تھا،  اور  یہ  غزل  اسی  گہرے  خیال  کے  اثر  سے  زخمی  دل  کی  ایک  جیتی  جاگتی  تصویر  ہے۔

                        ۱۹

                        میری  نوا  ہے  ماتمِ  یک  شہرِ  آرزو

                        یعنی  فراقؔ  اہل  جہان  دل  کہیں  جسے

                         

                        مقطع  میں  فراقؔ  اس  بات  کو  دہراتے  ہیں  کہ  الفاظ  اِنسان  کے  اندرونی  جذبات  کو  پوری  طرح  بیان  کرنے  سے  قاصر  ہیں۔  ان  کی  شاعری  یا  آواز  (نوا)  دراصل  اِنسانی  خواہشات  اور  آرزوؤں  کے  دیار  کا  ایک  ماتم  ہے۔  جسے  باقی  دنیا  سادگی  سے  “دل”  کہہ  دیتی  ہے،  شاعر  کے  نزدیک  وہ  انسان  کی  انہیں  تڑپتی  ہوئی  آرزوؤں  اور  گہرے  جذبات  کا  نام  ہے۔

                         

                        फ़िक्र का हासिल कहें जिसे – रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी

                        १

                        एक एक याद उम्र का हासिल कहें जिसे

                        वो ख़लवत-ए ख़याल के महफ़िल कहें जिसे

                        २

                        ताबिंदगी-ए फ़िक्र के इस आईने में देख

                        अपना जमाल तेरा मुक़ाबिल कहें जिसे

                        ३

                        मिलती हो तो ख़रीद, दो आलम को बीच कर

                        वो का’एनात-ए दर्द-ए नेहाँ दिल कहें जिसे

                        ४

                        हम बहर-ए इश्क़ तैर तो जाएँ मगर नहीं

                        ऐसा कोई किनारा के साहिल कहें जिसे

                        ५

                        लहरा रही हैं गर्दिश-ए ख़ूँ में हक़ीक़तें

                        वो कौन ज़िंदगी है के बातिल कहें जिसे

                        ६

                        आता है कौन जानिब-ए गुलज़ार दोश पर

                        वो ज़ुलफ़ हल्क़ा हल्क़ा सलासिल कहें जिसे

                        ७

                        अक्सर मिला है मुझ को सर-ए मंज़िल-ए हयात

                        तेरा ख़याल राह में हा’एल कहें जिसे

                        ८

                        पहना-ए दो जहाँ में कहाँ है तेरे सिवा

                        अए दिल कोई मक़ाम के मंज़िल कहें जिसे

                        ९

                        हैं अहल-ए हुस्न ज़ेब-ए कमर दश्ना-ए दो-दम

                        इतना नहीं है कोई के क़ातिल कहें जिसे

                        १०

                        लुत्फ़-ए बयाँ सुकूत में भी नुत्क़ तो वो है

                        तेरी निगाह-ए नाज़ का क़ा’एल कहें जिसे

                        ११

                        अए सोज़-ए साज़-ए ग़म वो ज़र-ए दाग़-ए दिल लुटाएँ

                        हाँ इस अयार-ए नाज़ के क़ाबिल कहें जिसे

                        १२

                        हूँ बे-नियाज़-ए ग़म मगर इस दिल को क्या करूं

                        सारे जहाँ के दर्द में शामिल कहें जिसे

                        १३

                        वा’एज़ ने इल्म को भी खड़ा सर के बल किया

                        ऐसा पढ़ा लिखा है के जाहिल कहें जिसे

                        १४

                        धोका न दे तुझे मेरी दरमांदगी कहीं

                        मैं वो शिकस्ता-पा हूँ के मंज़िल कहें जिसे

                        १५

                        जज़्ब-ए नेहाँ की रौ से तवज्जोह तो बस वो है

                        ख़ाल-ए रुख़-ए सबीह पे मा’एल कहें जिसे

                        १६

                        वो एक ख़याल काश के लफ़्ज़ों में ढल सके

                        संजीदगी की फ़िक्र का हासिल कहें जिसे

                        १७

                        तहसीन-ए अहल-ए फ़न के लिये कर रहा हूँ पेश

                        आसाँ हदीस-ए इश्क़ के मुश्किल कहें जिसे

                        १८

                        देखेंगे इस ग़ज़ल में धड़कता हुआ वो दिल

                        रा’नाई-ए ख़याल का बिस्मिल कहें जिसे

                        १९

                        मेरी नवा है मातम-ए यक शहर-ए आर्ज़ू

                        यानी फ़िराक़ अहल-ए जहाँ दिल कहें जिसे

                         

                        रघुपति सहाए फ़िराक़ गोरखपुरी (१८९६-१९८२) के पिता गोरख प्रसाद एक ज़मींदार और पेशे से वकील थे, जो ‘इब्रत’ तख़ल्लुस से शा’एरी भी करते थे। फ़िराक़ ने घर पर ही उर्दू और फ़ारसी की पढ़ाई की। उन की पहली ग़ज़ल २० साल की उम्र में तब रची गई जब वो कॉलेज के छात्र थे, और मुंशी प्रेमचंद के कहने पर प्रकाशित हुई। सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद से बी.ए. करने के बाद वो देश की राजनीति में सक्रिय हो गए। १९२० में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और उन्होंने १८ महीने जेल में बिताए। कुछ समय तक उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिये काम किया, लेकिन आज़ादी के बाद राजनीति छोड़ दी। १९३० में उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की परीक्षा पास की और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेज़ी के लेक्चरर बन गए। उन का घरेलू जीवन एक दुखद शादी और बेटे की आत्महत्या के कारण काफ़ी कष्टदायक रहा। उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया—१९६१ में साहित्य अकादमी; १९६८ में सोवियत नेहरू पुरस्कार, पद्म भूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार; तथा १९८१ में ग़ालिब पुरस्कार। ग़ालिब की ग़ज़ल तुझ सा कहें जिसे की ज़मीन में होने के कारण इसे ग़ालिब नक़्श-ए क़दम से जोढा गया है।

                        १

                        एक एक याद उम्र का हासिल कहें जिसे

                        वो ख़लवत-ए ख़याल के महफ़िल कहें जिसे

                         

                        शा’एर (या आशिक़) अपनी पूरी ज़िंदगी में जमा हुई यादों पर विचार करता है और उन्हें अपनी पूरी ज़िंदगी की असली कमाई या हासिल बताता है। तन्हाई में इन विचारों (ख़लवत-ए ख़याल) इन सँजोई हुई यादों से इस क़दर भर जाती है के अकेले-पन में सोच भी लोगों से भरी हुई किसी महफ़िल की तरह काम करने लगती है।

                        २

                        ताबिंदगी-ए फ़िक्र के इस आईने में देख

                        अपना जमाल तेरा मुक़ाबिल कहें जिसे

                         

                        ये शे’र आत्म-साक्षात्कार (self-realization) का एक आमंत्रण (invitation) है। अपने इंसान साथियों को संबोधित करते हुए शा’एर उन्हें रौशन सोच/समझ (ताबिंदगी-ए फ़िक्र) के आईने में देखने के लिये कहता है। उस आईने में इंसान की असली क़द्र, मूल्य और शान (जमाल) उनके अपने सामने (मुक़ाबिल) साफ़ नज़र आएगी।

                        ३

                        मिलती हो तो ख़रीद, दो आलम को बीच कर

                        वो का’एनात-ए दर्द-ए नेहाँ दिल कहें जिसे

                         

                        शा’एर का मानना है के “ये चीज़” दोनों दुनिया—भौतिक और आध्यात्मिक—से ज़्यादा क़ीमती है। अगर ये कहीं मिल सके, तो दोनों दुनिया बेच कर भी इसे ख़रीद लो। ये “चीज़” क्या है? छुपे हुए दर्द की का’एनात (का’एनात-ए दर्द-ए नेहाँ), जिसे दिल कहते हैं। शा’एर एक संवेदनशील (sensitive) और महसूस करने वाले दिल की बहुत बड़ी क़द्र करता है, और यहाँ इशारा है के ये दूसरों के दर्द को गहराई से महसूस करता है।

                        ४

                        हम बहर-ए इश्क़ तैर तो जाएँ मगर नहीं

                        ऐसा कोई किनारा के साहिल कहें जिसे

                         

                        शा’एर कहता है के इंसान प्यार के समंदर (बहर-ए इश्क़) में तैर तो सकता है, लेकिन ये कोशिश कभी ख़त्म न होने वाली है। इश्क़ एक ऐसा असीम फैलाव है जिस का कोई किनारा या साहिल नहीं जहाँ पहुँच कर इंसान रुक सके। ये इस बात को मज़्बूत करता है के मंज़िल से ज़्यादा सफ़र ख़ुद अहम है। एक थोड़ा कड़ा दृष्टिकोण (perspective) ये भी है के साहिल निष्क्रियता या सुस्ती की जगह है। इश्क़ के समंदर में ऐसा कुछ नहीं है—आप को कूदना होगा, डूबना होगा और लगातार संघर्ष करना होगा। आप साहिल पर बैठ कर सिर्फ़ तमाशा देखने वाले नहीं बन सकते।

                        ५

                        लहरा रही हैं गर्दिश-ए ख़ूँ में हक़ीक़तें

                        वो कौन ज़िंदगी है के बातिल कहें जिसे

                         

                        ज़िंदगी की सच्ची और कठोर सच्चाइयाँ (हक़ीक़तें) इंसान के ख़ून के तूफ़ान और बहाव (गर्दिश-ए ख़ून) के अंदर लहरा रही हैं। शा’एर मांग करता है के हम ज़िंदगी के बिल्कुल सच्चे और कड़े अनुभवों का सामना करें। आरामदेह वहमों और ख़ुद-फ़रेबी (बातिल) में छुप जाना एक बनावटी और झूठी ज़िंदगी जीना है—और ऐसी ज़िंदगी का भी क्या जीना?

                        ६

                        आता है कौन जानिब-ए गुलज़ार दोश पर

                        वो ज़ुलफ़ हल्क़ा हल्क़ा सलासिल कहें जिसे

                         

                        यहाँ रंग-रूप बिल्कुल पारंपरिक और रोमानी अंदाज़ की तरफ़ बदलता है। ग़ज़ल में इस की पूरी इजाज़त है क्यूंके हर शे’र अपने आप में एक अलग और पूरा विचार होता है। पारंपरिक दृश्यों का इस्तेमाल करते हुए शा’एर किसी (महबूब) को बाग़ की तरफ़ आते हुए देखता है; उसके कंधों पर ज़ुल्फ़ें बिखरी हैं, जिन की हर कड़ी (हल्क़ा-हल्क़ा) आशिक़ को बाँधने वाली ज़ंजीरों (सलासिल) की तरह लगती है।

                        ७

                        अक्सर मिला है मुझ को सर-ए मंज़िल-ए हयात

                        तेरा ख़याल राह में हा’एल कहें जिसे

                         

                        ज़िंदगी के सफ़र की बिल्कुल शुरुआत या दहलीज़ पर ही (सर-ए मंज़िल-ए हयात), शा’एर को रास्ते में एक बहुत बड़ी रुकावट (हा’एल) मिलती है: महबूब का वो ख़याल या छवि जो दिमाग़ से नहीं निकलती (तेरा ख़याल)। पिछले शे’र की ज़ंजीरों (सलासिल) से जोड़ते हुए, महबूब की याद इंसान को उस के जीवन का असली काम शुरू होने से पहले ही दुनियावी लगाव और भावनात्मक उलझनों में जकड़ने का ख़तरा पैदा करती है। यहाँ महबूब के ख़याल का व्यापक अर्थ सभी दुनियावी और स्वार्थी जुड़ावों से है।

                        ८

                        पहना-ए दो जहाँ में कहाँ है तेरे सिवा

                        अए दिल कोई मक़ाम के मंज़िल कहें जिसे

                         

                        अपने ही दिल से बात करते हुए शा’एर कहता है के दोनों दुनिया के इतने बड़े फैलाव (पहना-ए दो-जहाँ) में, दिल के अलावा कोई असली जगह या मंज़िल नहीं है। ये दिल (यानी इंसानियत और सर्वव्यापी प्रेम) ही इस पूरी हस्ती का सब से बड़ा और अंतिम केंद्र है।

                        ९

                        हैं अहल-ए हुस्न ज़ेब-ए कमर दश्ना-ए दो-दम

                        इतना नहीं है कोई के क़ातिल कहें जिसे

                         

                        शा’एर देखता है के सुंदर लोग (अहल-ए हुस्न) सिर्फ़ दिखावे के लिये अपनी कमर पर दोधारी कटार (दश्ना-ए दो-दम) सजाए घूमते हैं। लेकिन ये सिर्फ़ एक बनावटी अदा है; उन में से किसी के अंदर भी इतना इरादा या क्षमता नहीं है के वो सचमुच किसी का क़त्ल कर सकें या असली “क़ातिल” कहला सकें।

                        १०

                        लुत्फ़-ए बयाँ सुकूत में भी नुत्क़ तो वो है

                        तेरी निगाह-ए नाज़ का क़ा’यल कहें जिसे

                         

                        शा’एर असली बात-चीत या आवाज़ (नुत्क़) उसे मानता है जो बिल्कुल ख़ामोशी (सुकूत) में भी अपना कहना कह दे। असली अभिव्यक्ति (expression) तो महबूब की उस नज़ाकत भरी नज़र (निगाह-ए नाज़) की है, जो बिना एक भी शब्द बोले आशिक़ को अपना क़ा’एल कर लेती है और हिला कर रख देती है।

                        ११

                        अए सोज़-ए साज़-ए ग़म वो ज़र-ए दाग़-ए दिल लुटाएँ

                        हाँ इस अयार-ए नाज़ के क़ाबिल कहें जिसे

                         

                        ग़म के संगीत की तड़प (सोज़-ए साज़-ए ग़म) को पुकारते हुए शा’एर कहता है के दिल के ज़ख़्मों की जमा-पूंजी (ज़र-ए दाग़-ए दिल) को लुटा देना चाहिए। ये भावनात्मक दौलत पूरी तरह से और सिर्फ़ उसी एक को दी जानी चाहिए जो असली सुंदरता और नज़ाकत के उच्च मानदंड (‘अयार-ए नाज़) पर खरी उतरती हो—यानी वही ख़ास महबूब।

                        १२

                        हूँ बे-नियाज़-ए ग़म मगर इस दिल को क्या करूं

                        सारे जहाँ के दर्द में शामिल कहें जिसे

                         

                        शा’एर ख़ुद अपने व्यक्तिगत दुखों से अलग-थलग और बेपरवाह महसूस करता है (बे-नियाज़-ए ग़म), फिर भी वो अपने दिल के स्वभाव को नहीं बदल सकता। ये दिल अपने आप पूरी दुनिया के इंसानों के सामूहिक दुख और पीड़ा (सारे जहाँ के दर्द) को अपने अंदर सोख लेता है और उस में शरीक हो जाता है। जैसा के अमीर मीनाई ने कहा था:

                        ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम अमीर

                        सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

                        १३

                        वा’एज़ ने इल्म को भी खड़ा सर के बल किया

                        ऐसा पढ़ा लिखा है के जाहिल कहें जिसे

                         

                        रूढ़िवादी धर्मोपदेशक (वा’एज़) पर एक सीधा हमला। अपनी तमाम किताबी पढ़ाई और अक्षरों के ज्ञान के बावजूद, वा’एज़ अपनी संकीर्ण (narrow) और अप्राकृतिक (unnatural) व्याख्याओं से ज्ञान का पूरा रूप ही बिगाड़ देता है (उसे सर के बल खड़ा कर देता है), जिस से वो व्यवहार में किसी अनपढ़-अज्ञानी (जाहिल) के बराबर ही हो जाता है।

                        १४

                        धोका न दे तुझे मेरी दरमांदगी कहीं

                        मैं वो शिकस्ता-पा हूँ के मंज़िल कहें जिसे

                         

                        शा’एर/खोजी चेतावनी देता है के उस की शारीरिक थकावट और लाचार हालत (दरमांदगी) को मंज़िल तक न पहुँच पाने की नाकामी समझने की भूल न की जाए। उस की ये टूटी हुई हालत (शिकस्ता-पा) रास्ते में आया कोई टूटना या रुकना नहीं है, बल्के इस खोज के रास्ते में पूरी तरह समर्पित हो जाने का अनिवार्य (essential) और अंतिम नतीना है। चूँके बाहर कोई ठहरी हुई मंज़िल नहीं है, इस लिये इस निरंतर खोज की प्रक्रिया से मिली ये थकावट ही असली मंज़िल बन जाती है—और खोजने वाले की ये स्थिति ही मंज़िल को दर्शाती है।

                        १५

                        जज़्ब-ए नेहाँ की रौ से तवज्जोह तो बस वो है

                        ख़ाल-ए रुख़-ए सबीह पे मा’एल कहें जिसे

                         

                        ऊपरी तौर पर रोमानी लगने से अलग, ये शे’र सच्चे ध्यान और एकाग्रता (तवज्जोह) की परिभाषा देता है। एक रौशन चेहरे पर काले तिल (ख़ाल-ए रुख़-ए सबीह) को एक अकेले, गहरे केंद्र के रूप में इस्तेमाल करते हुए, शा’एर कहता है के असली ध्यान ज़बरदस्ती या बाहरी कर्तव्य से पैदा नहीं किया जा सकता। इस के बजाए, सच्चा ध्यान (बस वो है) एक क़ुद्रती और अंदरूनी घटना है—जो केवल छुपी हुई अंदरूनी खिंचाव और तड़प (जज़्ब-ए नेहाँ) की लहर से पैदा होती है।

                        १६

                        वो एक ख़याल काश के लफ़्ज़ों में ढल सके

                        संजीदगी की फ़िक्र का हासिल कहें जिसे

                         

                        शा’एर अपनी ये तड़प और लाचारी ज़ाहिर करता है के काश वो ख़ास विचार (वो एक ख़याल)—जो गहरी, गंभीर सोच (संजीदगी की फ़िक्र) का निचोड़ है—शब्दों में साफ़-साफ़ ढाला जा सके। शा’एर अपनी इस कुंठा (frustration) को ज़ाहिर कर रहा है के वो या कोई भी इंसान इतने गहरे विचारों को शब्दों के सतहीपन में पूरी तरह नहीं ढाल सकता। ग़ालिब ने विचारों को शब्दों में ढालने की इसी कठिनाई को इस तरह कहा था:

                        ग़ालिब नबुवद शेवा-ए मन क़ाफ़िया-बंदी

                        ज़ुल्मीस्त के बर किल्क ओ वरक़ मीकुनम इमशब

                        १७

                        तहसीन-ए अहल-ए फ़न के लिये कर रहा हूँ पेश

                        आसाँ हदीस-ए इश्क़ के मुश्किल कहें जिसे

                         

                        सच्चे प्यार और मानवीय भावनाओं की बात (हदीस-ए इश्क़) स्वभाव से ही बहुत गहरी, जटिल (complex) और समझने में कठिन (मुश्किल) होती है। मैं इस जटिल बात को एक आसान और सीधी कहानी (आसाँ हदीस) के रूप में पेश कर रहा हूँ, ताके कला के पारखी और उस्ताद लोग (अहल-ए फ़न) इसे समझ सकें और इस की दाद ओ प्रशंसा (तहसीन) दे सकें।

                        १८

                        देखेंगे इस ग़ज़ल में धड़कता हुआ वो दिल

                        रा’नाई-ए ख़याल का बिस्मिल कहें जिसे

                         

                        शा’एर का दावा है के इस ग़ज़ल में पाठकों को एक धड़कता हुआ दिल मिलेगा। ये दिल शा’एरी की कल्पना की विशाल सुंदरता और गरिमा (रा’नाई-ए ख़याल) से ज़ख़्मी या क़ुर्बान हुआ (बिस्मिल) शिकार है। ये वही विचार/कल्पना है जिसे पिछले शे’र में शब्दों में ढालना बेहद कठिन लग रहा था। ये ग़ज़ल उस विचार की विशालता का एक ज़ख़्मी और जीवित रूप है।

                        १९

                        मेरी नवा है मातम-ए यक शहर-ए आर्ज़ू

                        यानी फ़िराक़ अहल-ए जहाँ दिल कहें जिसे

                         

                        अंतिम शे’र में, फ़िराक़ अपनी अंदरूनी गहरी भावनाओं को ज़ाहिर करने में शब्दों के अधूरेपन को बयान करना जारी रखते हैं। उन की शा’एराना आवाज़ (नवा)—जो वास्तव में उन की ग़ज़ल है—इंसानी ख़्वाहिशों और आर्ज़ूओं की दुनिया का एक मातम (शोक) है। बाक़ी दुनिया जिसे सहजता से “दिल” कह देती है, शा’एर के लिये वही दिल इस इच्छा का रूप है—जो शा’एराना सोच और इंसानी इच्छाओं की भव्यता से घाएल हुआ बिस्मिल है।

                         

                        fikr kaa haasil kah’eN jis’e – raghupati sahaa’e firaaq gorakhpuurii

                        1
                        aek aek yaad ‘umr kaa haasil kah’eN jis’e
                        vo Khalvat-e Khayaal keh mahfil kah’eN jis’e
                        2
                        taabindagii-e fikr ke iss aa’iine meN dekh
                        apnaa jamaal teraa muqaabil kah’eN jis’e
                        3
                        miltii ho to Khariid, do ‘aalam ko b’ech kar
                        vo kaa’enaat-e dard-e nihaaN dil kah’eN jis’e
                        4
                        ham bahr-e ‘ishq ta’er to jaa’eN magar nahiiN
                        aisaa ko’ii kinaara keh saahil kah’eN jis’e
                        5
                        lahraa rahii haiN gardish-e KhuuN meN haqiiqateN
                        vo kaun zindagi hai keh baatil kah’eN jis’e
                        6
                        aataa hai kaun jaanib-e gulzaar dosh par
                        vo zulf halqa-halqa salaasil kah’eN jis’e
                        7
                        aksar milaa hai mujh ko sar-e manzil-e hayaat
                        teraa Khayaal raah meN haa’el kah’eN jis’e
                        8
                        pahnaa-e do jahaaN meN kahaaN hai ter’e sivaa
                        aye dil ko’ii maqaam keh manzil kah’eN jis’e
                        9
                        haiN ahl-e husn zeb-e kamar dashna-e do-dam
                        itnaa nahiiN hai ko’ii keh qaatil kah’eN jis’e
                        10
                        lutf-e bayaaN sukuut meN bhii nutq t’o vo hai
                        terii nigaah-e naaz kaa qaa’el kah’eN jis’e
                        11
                        aye soz-e saaz-e Gham vo zar-e daaGh-e dil luTaa’eN
                        haaN iss ‘eyaar-e naaz ke qaabil kah’eN jis’e
                        12
                        huuN be-niyaaz-e Gham magar iss dil ko kyaa karuuN
                        saar’e jahaaN ke dard meN shaamil kah’eN jis’e
                        13
                        vaa’ez ne ‘ilm ko bhii khaRaa sar ke bal kiyaa
                        aisaa paRhaa likhaa hai keh jaahil kah’eN jis’e
                        14
                        dhoka na de tujh’e merii darmaandagii kahiiN
                        maiN vo shikasta-paa huuN keh manzil kah’eN jis’e
                        15
                        jazb-e nehaaN kii rau se tavajjoh to bas vo hai
                        Khaal-e ruKh-e sabiih pe maa’el kah’eN jis’e
                        16
                        vo ek Khayaal kaash keh lafzoN meN Dhal sak’e
                        sanjiidagii kii fikr kaa haasil kah’eN jis’e
                        17
                        tahsiin-e ahl-e fan ke li’e kar rahaa huuN pesh
                        aasaaN hadiis-e ‘ishq keh mushkil kah’eN jis’e
                        18
                        dekheNge iss Ghazal meN dhaRaktaa huaa vo dil
                        raa’naa’ii-e Khayaal kaa bismil kah’eN jis’e
                        19
                        merii navaa hai maatam-e yak shahr-e aarzuu
                        yaa’nii firaaq ahl-e jahaaN dil kah’eN jis’e

                        raghupati sahaa’e firaaq gorakhpuri (1896-1982). His father gorakh prasaad was a landlord and practiced law and was a poet using the taKhallus ibrat. firaaq studied urdu and faarsi at home.  His first Ghazal was composed at the age of 20, when he was college student, and published at the urging of munshi premchand.  After his BA from Central College Allahabad he became involved in the country’s politics. He was arrested in 1920 and spent 18 months in prison. He worked for some time for the Congress party but after independence, discontinued politics.  In 1930, he passed the MA examination in English Literature from Agra University and became a lecturer in English in Allahabad University.  His domestic life was troubled with a bad marriage and suicide of his son.  He received multiple awards – 1961, sahitya akademi; 1968, Soviet Nehru, padma bhushan, gyaan piiTh; 1981 Ghalib award.  This is in the zamiin of Ghalib‘s tujh saa kah’eN jis’e and is linked to Ghalib naqsh-e qadam.

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                        aek aek yaad ‘umr kaa haasil kah’eN jis’e
                        vo Khalvat-e Khayaal keh mahfil kah’eN jis’e

                        The poet/forlorn lover reflects on the accumulation of memories over a lifetime, describing them as the true earnings or value haasil of life ‘umr. Solitary contemplation (Khalvat-e Khayaal) becomes so crowded with these preserved memories that it functions like a crowded gathering (mahfil).

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                        taabindagii-e fikr ke iss aa’iine meN dekh
                        apnaa jamaal teraa muqaabil kah’eN jis’e

                        This sh’er is an invitation to self-realization.  Addressing fellow humans, the poet invites them to look into the mirror of enlightened reason (taabindagii-e fikr). In that mirror, their true worth/glory (jamaal) will appear will appear before (muqaabil) you.

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                        miltii ho to Khariid, do ‘aalam ko b’ech kar
                        vo kaa’enaat-e dard-e nihaaN dil kah’eN jis’e

                        The poet suggests that “it” is more valuable than both worlds … the material and the spiritual.  If you can find it, buy it.  What is “it”.  The universe of hidden pain-kaa’enaat-e dard-e nehaaN, which is called the heart.  The poet places great value on a feeling/sensitive heart.  It is implied that it is sensitive to the pain of others.

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                        ham bahr-e ‘ishq ta’er to jaa’eN magar nahiiN
                        aisaa ko’ii kinaara keh saahil kah’eN jis’e

                        The poet observes that one could swim through the ocean of love (bahr-e ‘ishq), but the effort is bound to be endless. Love is an infinite expanse that possesses no boundary, edge, or landing shore (saahil) at which a person can arrive.  This reinforces the thought that the journey is more important than the destination.  A slightly more aggressive interpretation suggests that the shore is a place of inactivity/passivity.  There is no such thing available in the ocean of love bahr-e ‘ishq, you have to dive in, get involved, struggle continuously.  You are not allowed to be a spectator from the shore.

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                        lahraa rahii haiN gardish-e KhuuN meN haqiiqateN
                        vo kaun zindagi hai keh baatil kah’eN jis’e

                        Realities (haqiiqateN) are tossing and surging lahraa rahii haiN within the turbulent storm of human blood (gardish-e KhuuN). The poet demands that we confront the raw, unvarnished challenges of lived experience. To retreat into comfortable illusions and self-deception (baatil) is to live an unauthentic life—and what kind of life is that?

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                        aataa hai kaun jaanib-e gulzaar dosh par
                        vo zulf halqa-halqa salaasil kah’eN jis’e

                        This appears to be a complete change in tone towards the romantic/conventional.  This is allowed in a Ghazal since each sh’er stands on its own.  Using traditional visual imagery, the speaker describes someone (the beloved) approaching the garden; resting on her shoulder are locks of hair zulf with each curl halqa-halqa appearing like links of a chain or fetters (salaasil) intended for the lover.

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                        aksar milaa hai mujh ko sar-e manzil-e hayaat
                        teraa Khayaal raah meN haa’el kah’eN jis’e

                        At the very onset or threshold of life’s journey (sar-e manzil-e hayaat), the poet encounters an obstacle (haa’el) blocking the path: the haunting obsession or image of the beloved (teraa Khayaal). Linking back to the chains (salaasil) of the previous couplet, the thought of the beloved threatens to trap the traveler in worldly attachments and emotional entanglement before his life’s work can even begin.  Here the thought of the beloved should be generalized to mean all worldly/selfish attachments.

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                        pahnaa-e do jahaaN meN kahaaN hai ter’e sivaa
                        aye dil ko’ii maqaam keh manzil kah’eN jis’e

                        Addressing his own heart, the poet states that across the vast expanse of both worlds (pahnaa-e do jahaaN), there is no true location or destination (manzil) except the heart itself. The heart (universal love) remains the ultimate reference point in existence.

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                        haiN ahl-e husn zeb-e kamar dashna-e do-dam
                        itnaa nahiiN hai ko’ii keh qaatil kah’eN jis’e

                        The poet observes that the beautiful (ahl-e husn) carry two-edged daggers (dashna-e do-dam) at their waists as ornaments. However, this is mere posture; none of them has the genuine intent (itna nahiiN hai ko’ii) or capacity to act as a true killer (qaatil).

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                        lutf-e bayaaN sukuut meN bhii nutq t’o vo hai
                        terii nigaah-e naaz kaa qaa’el kah’eN jis’e

                        The speaker defines true eloquence (nutq) as communication that occurs even in absolute silence (sukuut). Real expression belongs to the beloved’s coquettish glance (nigaah-e naaz), which convinces (qaa’el) and moves the lover without spoken words.

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                        aye soz-e saaz-e Gham vo zar-e daaGh-e dil luTaa’eN
                        haaN iss ‘eyaar-e naaz ke qaabil kah’eN jis’e

                        Addressing the passion of sorrow’s music (soz-e saaz-e Gham), the speaker calls for spending/offering the wealth of the heart’s wounds (zar-e daaGh-e dil). This emotional currency should be given freely to the one who meets the high standard or criteria (‘eyaar) of true elegance naaz i.e., the beloved.

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                        huuN be-niyaaz-e Gham magar iss dil ko kyaa karuuN
                        saar’e jahaaN ke dard meN shaamil kah’eN jis’e

                        The speaker personally feels detached from/de-sensitized to persal grief (be-niyaaz-e Gham), yet cannot alter the nature of his heart. The heart instinctively absorbs and shares in the collective suffering of the entire world (saar’e jahaaN ke dard).  Said amiir minaaii …

                        Khanjar chal’e kisi pe taRapt’e haiN ham amiir
                        saar’e jahaaN ka dard hamaar’e jigar meN hai 
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                        vaa’ez ne ‘ilm ko bhii khaRaa sar ke bal kiyaa
                        aisaa paRhaa likhaa hai keh jaahil kah’eN jis’e

                        A direct critique of the orthodox preacher (vaa’ez). Despite his formal literacy and schooling, the preacher twists knowledge upside down through rigid, unnatural interpretations, making him functionally equivalent to an ignorant person (jaahil).

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                        dhoka na de tujh’e merii darmaandagii kahiiN
                        maiN vo shikasta-paa huuN keh manzil kah’eN jis’e

                        The poet/seeker warns against misinterpreting his physical exhaustion and helpless state (darmaandagii) as a failure to arrive. His broken condition (shikasta-paa) is not an interruption or a breakdown along the way, but the necessary, inevitable outcome of absolute commitment to the journey. Because there is no static external finish line, the weariness earned through the process of total seeking becomes the true destination (manzil) and the seeker’s state represents that destination.

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                        jazb-e nehaaN kii rau se tavajjoh to bas vo hai
                        Khaal-e ruKh-e sabiih pe maa’el kah’eN jis’e

                        Beyond its surface appearance as a romantic trope, the couplet defines the nature of authentic focus and undivided devotion (tavajjoh). Using the beauty spot on a radiant face (Khaal-e ruKh-e sabiih) as a metaphor for a single, compelling focal point, the poet asserts that true concentration cannot be artificially manufactured or forced by external duty. Instead, genuine (bas vo hai – it is only that) focus is an organic, involuntary event—an absolute absorption driven solely by a deep, internal current of hidden passion (jazb-e nehaaN).

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                        vo ek Khayaal kaash keh lafzoN meN Dhal sak’e
                        sanjiidagii kii fikr kaa haasil kah’eN jis’e

                        The poet expresses a wish that a specific abstract thought vo ek Khayaal – the culmination of rigorous, serious reflection (sanjiidagii kii fikr) – could be successfully translated into explicit human words (lafzoN meN Dhal sake) and in such words as can be called the essence of serious reflection.  The poet is expressing his exasperation that he/no one can mould serious reflection into the superficiality of words.  Ghalib expresses his difficulty in casting thoughts/conception into words thus …

                        Ghalib nabuvad sheva-e man qaafiya bandi
                        zulmiist ke bar kilk o varaq meekunam imshab
                        O, Ghalib, it is not my practice to do word-smithing
                        It is cruelty that I visit on pen and paper tonight
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                        tahsiin-e ahl-e fan ke li’e kar rahaa huuN pesh
                        aasaaN hadiis-e ‘ishq keh mushkil kah’eN jis’e

                        The discourse on true love and human passion (hadiith-e ‘ishq) is inherently dense, complex, and difficult to grasp (mushkil kah’eN jis’e).  I am presenting (pesh kar rahaa huN) a more direct and simple story (aasaan hadiis) so that you may appreciate and offer tahsiin.

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                        dekheNge iss Ghazal meN dhaRaktaa huaa vo dil
                        raa’naa’ii-e Khayaal kaa bismil kah’eN jis’e

                        The poet claims that in this Ghazal, readers will find a beating heart. This heart is described as a victim or sacrifice (bismil) brought down by the overwhelming grace and beauty of poetic imagination (raa’naa’ii-e Khayaal).  This is the same thought/imagination that was so difficult to cast into words in the previous sh’er.  The Ghazal is a wounded reflection of the grandeur of that thought.

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                        merii navaa hai maatam-e yak shahr-e aarzuu
                        yaa’nii firaaq ahl-e jahaaN dil kah’eN jis’e

                        In the closing couplet, firaaq continues to express the inadequacy of words to reflect intense internal feelings.  His poetic voice (navaa) which is really his Ghazal is nothing but a lament for the domain of human desires. What the rest of the world casually calls “the heart” (dil) is, for the poet, the expression of this desire – the bismil of the grandeur of poetic thought/human desire.

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