Mukesh Kumar Soni

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Mukesh Kumar Soni episodes

  • प्रेमयोग भाग 4
    ।।४०।।
    मुर्झा न पाये जो कभी
    ऐसी है प्रेम की माला,
    जीवन है गुलबाग बना,
    जब से अपने पर डाला।
    ।।४१।।
    चुपके से आकर उसने,
    की है दिल की चोरी
    लिख डाली प्यार की लिपि,
    जो थी अभी तक कोरी।
    ।।४२।।
    सपनों में उनको देखूं,
    जाने कैसी है निद्रा
    प्रेम सुधा बरसाए
    ऐसी उनकी है मुद्रा।
    ।।४३।।
    पाषाण बने कोई दिल से
    कैसे प्यार को जाने
    फूलों सा जिनका दिल हो,
    बस वही प्यार को माने।
    ।।४४।।
    लहराये बलखाये,
    जैसे हो कोई सरिता
    होठों से अपने हँस - हँस,
    देती है मुझको कविता।
    ।।४५।।
    कोई भी उत्सव हो मगर,
    दिल को खुशी नहीं है
    उनकी हँसी जहाँ है
    मेरी खुशी वही है।
    ।।४६।।
    फूलों की झड़ी लग जाये
    जब भी मुझसे वो बोले,
    जो हाथ रखे मेरे मन पे,
    धरती-अम्बर सब डोले।
    ।।४७।।
    फूलों की हो बगियाँ,
    और उसमें फूल नहीं हो
    वह प्यार-प्यार है कैसा,
    जिसमें शूल नहीं हो।
    ।।४८।।
    हाँ,कह सकते इसको हो
    यह प्यार नहीं, धोखा है!
    पर हमने तो सच मानो
    जन्नत इसमें देखा है।
    ।। ४९।।
    यह खेल है जाने कैसा
    जिसको कभी न जीता
    कौन सफल हो पाया,
    क्या राधा - क्या सीता !
    ।।५०।।
    खुशबू जाने कैसी है
    उनके कोमल तन का
    एक खेल बना है अब तो
    मेरे इस चंचल मन का।
    ।।५१।।
    जीवन के आपाधापी में,
    साथी कब ऐसे मिलते हैं,
    सदियों से बंजर धरती पर,
    जो फूल बन खिलते हैं।
    ।।५२।।
    कभी अन्त नहीं हो पाता
    जाने कैसी है क्रीड़ा
    मधुर-मधुर है होती
    यह मंद प्रेम की पीड़ा ।
    3 min
  • प्रेम योग भाग 3
    ।।२७।।
    हँस-हँस कर, रो-रो कर
    करता हूँ उनसे बातें।
    अब उनकी ही यादों में,
    कटती है अपनी रातें।
    ।।२८।।
    वह खूब घड़ी थी शायद
    जब हमसे वे मिले थे
    तब मेरे भी बगियाँ में
    कुछ सुन्दर फूल खिले थे।
    ।।२९।।
    हँसने रोने की उनकी,
    हर एक अदा है निराली,
    आकर जरा तो देखो
    है वो कितनी भोली-भाली।
    ।।३०।।
    उनके श्यामल छवि का,
    हो गया हूँ मैं तो कायल,
    साधारण प्रेमी जैसा,
    मैं भी हुआ हूँ घायल।
    ।।३१।।
    कब सोचा था मैंने,
    एक ऐसा संसार मिलेगा,
    चाहत की फुलवारी होगी,
    मुझको भी प्यार मिलेगा।
    ।।३२।।
    जाने अनजाने ही सही,
    सबको हो जाता है,
    कोई भा जाता है,
    और प्रेम योग होता है।
    ।।३३।।
    सौ दोष देखकर फिर भी,
    एक दोष मान न पाऊँ,
    सांसों में भर-भर उनको,
    मैं बस गाता जाऊँ।
    ।। ३४।।
    कभी हँसकर, कभी बलखाकर,
    बाहों से लिपट जाती है,
    और कभी इतराती,
    वह दूर चली जाती है ।
    ।।३५।।
    मीठी-मीठी बातों की
    करती वह कितनी वर्षा
    सोच-सोच उन बातों को,
    जाता मन फिर से हर्षा ।
    ।।३६।।
    उनकी सुन्दरता ने ही तो
    विकसित किया कला को,
    मैं मस्त हुआ फिरता हूँ
    पी कर इस प्याला को।
    ।।३७।।
    सब कुछ उनको दे डाला,
    जीवन के सुख को हर कर
    वह चाहे तो सजाले इनको
    अपने दामन में भर कर।
    ।।३८।।
    परिचित तो नहीं लगे थे,
    जब आये थे जीवन में,
    जाने फिर कैसे-कैसे
    समा गये इस मन में ।
    ।।३९।।
    सपनों में आकर मेरे,
    वह मुझे जगा देती है,
    आँखों से भर-भर प्याली,
    वह मुझे पिला देती है।
    3 min
  • प्रेम योग भाग 2
    ।।१४।।
    अलकों-पलकों की कथाएँ,
    कहूँ क्या मैं सबको,
    मैं रोज गगन छूता हूँ
    मिला हूँ जब से उनको।
    ।।१५।।
    सुनाने को सुना मैं दू पर
    कौन सुनेगा यह कहानी?
    बात ही कुछ ऐसी है
    जैसे हो बहता पानी।
    ।।१६।।
    कैसे मैं सुनाऊँ सबको,
    अपनी यह प्रेम कहानी,
    कोई प्रमाण नहीं है,
    न है कोई भी निशानी।
    ।।१७।।
    दुविधा के उन क्षणों में,
    जब मैंने उनको देखा,
    तब से उनको है माना,
    अपने जीवन की रेखा।
    ।।१८।।
    उनकी आँखें अब हर पल,
    मुझको घेरा करती है
    कुछ जानी कुछ अनजानी,
    सैकड़ों बातें करती है।
    ।।१९।।
    अब मेरे शून्य हृदय में,
    बस उनका है डेरा,
    हर पल उनको मैं देखूँ,
    चाहे हो शाम-सबेरा।
    ।।२०।।
    मेरे मानस के पट पर,
    एक उनकी छवि है छाई,
    हँस कर क्या वो आई,
    मुझको कवि बनाई।
    ।।२१।।
    दिवस खुश-नुमा है लगता,
    उनके बस आ जाने से,
    सातों सूर है बजती,
    केसों के लहराने से।
    ।।२२।।
    व्यथित हृदय की गाँठें,
    एक-एक छूट जाती है,
    पास मेरे लहरा कर,
    जब-जब वो आ जाती है।
    ।।२३।।
    हृदय खिल उठा ऐसे,
    जैसे बाग में कलियाँ,
    कोलाहल सा अब लगता,
    जीवन की हर एक गलियाँ।
    ।।२४।।
    उजड़ी है सारी नगरी,
    बसा एक मन मेरा,
    और मेरे इस मन में,
    बस उनका है डेरा ।
    ।।२५।।
    सागर की बोझिल लहरें,
    उठती है गिर जाने को,
    मैं रोज उठा करता हूँ,
    बस उनको पाने को।
    ।।२६।।
    कितनी बाते और कहूँ,
    अपने उस छाया की,
    हर पग पर है दीप जले,
    आने से उस काया की ।
    3 min
  • प्रेमयोग भाग 1
    ।।१।।
    प्रिय मिले जब से,
    आई जीवन में उमंग,
    फैल रही है जीवन में,
    धीरे-धीरे प्रेम रंग ।
    ।।२।।
    जान लिया मैंने भी तो,
    प्रेम का अद्भुत रहस्य
    दूर हो गयी जाने कैसे,
    मेरे जीवन का आलस्य।
    ।।३।।
    कैसे जाने वे आए,
    हृदय में मेरे एकाएक,
    हो उठा तन-मन पुलकित,
    होठों से जब किया अभिषेक।
    ।।४।।
    ले जायेगी जो मुझको,
    मिली मुझे अब वे राहें,
    पास आ गई मेरी मंजिल,
    डाली जब अपनी बाँहे।
    ।।५।।
    हर वो खुशियाँ पाई मैंने,
    की थी जो - जो अभिलाषा,
    बात दिलों की जान सका,
    जब जानी प्यार की परिभाषा।
    ।।६।।
    मैं ही मैं जीवन में था,
    कितना कलुषित था इतिहास,
    हुआ दूर अब सब तम मेरा,
    आये जो वो मेरे पास।
    ।।७।।
    जब से आए वो मेरे,
    दिल के सूनेपन मे,
    फूल कितने खिल गए,
    हाय! मेरे इस जीवन में।
    ।।८।।
    साथ का मेरे मत पूछो
    साथ बहुत मैंने पाया
    पर साथ मुझे उनके जैसा
    कहाँ किसी का कब भाया।
    ।।९।।
    चाह मुझे थी एक साथी की,
    हुई तलाश पूरी उसकी,
    रंगों-छन्दों में समाये जो,
    बनें मूरत जो सुकवि की।
    ।।१०।।
    जीवन का रूप सच्चा,
    अब प्रतिपल लगने लगा है
    रात-दिन आकर कोई
    नित स्वप्न में हँसने लगा है।
    ।।११।।
    साथ उनका मिला है जबसे,
    छूटा सभी से वास्ता,
    एक उन्हीं में जा बसी,
    मेरी, असीम, अटूट आस्था।
    ।।१२।।
    सारी जमी तो थी अपनी,
    अब अपना हुआ आकाश,
    नित-नित होने लगा अब,
    मेरे जीवन का विकास।
    ।।१३।।
    अपने होठों से जब-जब
    उसने है मुस्काया
    दिल के कोने-कोने में
    मैंने उनको है पाया।
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    3 min
  • नाम
    कौन नहीं चाहता
    उसका नाम हो जाए?
    जिंदगी में एक हंसी
    मुकाम हो जाए ।
    पर!
    पर यह पानी पीने जैसी तो चीज नहीं
    भला कैसे यह कठिन काम हो जाए।
    समय के पास समय नहीं कि
    सभी का सुने
    सभी का हो जाए
    और सभी के लिए
    कुछ पद दे जाए।
    आकाश में असंख्य तारे हैं
    जिनमें सूर्य भी एक है
    क्या संभव है,
    सभी तारे सूर्य हो जाए ?
    और यदि ऐसा हो भी जाए
    तो सारी सृष्टि खाक हो जाए।
    क्या संभव है
    सभी का नाम हो जाए?
    MUKESH KUMAR SONI
    NET Qualified in Yoga
    M.A. in Yoga,M.A. in Hindi,
    Post Graduate in Yoga and Naturopathy
    M-9836783469,9088102430
    1 min
  • हिंसा
    स्टेशन के नीचे
    एक कौवा
    एक मरे चूहे को
    नोच रहा था।
    तभी ऊपर खड़ा मैं
    एक कविता सोच रहा था।
    ना जाने क्या था!
    जिसे विस्मय से देख रहा था।
    नोचता नोचता उबता
    उसका मन।
    सोचता सोचता मैं
    पड़ गया
    जाने किस उलझन?
    कितना अंतर था
    हम दोनों की करनी में।
    लेकिन कुछ तो था,
    जो गलत था।
    कौवा हिंसा कर रहा था,
    मैं उसे देख खड़ा था।
    पर कोई था।
    जो बेचारा!
    बेजान पड़ा था।
    MUKESH KUMAR SONI
    NET Qualified in Yoga
    M.A. in Yoga,M.A. in Hindi,
    Post Graduate in Yoga and Naturopathy
    M-9836783469,9088102430
    2 min
  • दीवाने
    कदम भले ही छोटे अपने
    मन को विस्तार बनाएंगे।
    लक्ष्य को अपने पाने को 
    आगे ही बढ़ते जाएंगे।
    पंथ में जितना क्रन्द मिले 
    नहीं कभी घबराएंगे हैं ।
    कभी नहीं पैरों को अपने 
    फिर से पीछे लाएंगे।
    समय को बहुमूल्य समझ 
    कभी नहीं हम गवाएंगे।
    अपने मस्ती में हम होंगे
    फक्कड़ मस्त कहाएंगे।
    मंजिल पर अपने जाने को 
    हर पल आतुर हो गाएंगे।
    आज नहीं तो कल ही सही 
    हम दीवाने पहुंच ही जाएंगे।
    MUKESH KUMAR SONI
    NET Qualified in Yoga
    M.A. in Yoga,M.A. in Hindi,
    Post Graduate in Yoga and Naturopathy
    M-9836783469,9088102430
    2 min
  • मेरा गांव
    अब मैं बचपन को छोड़ 
    चालीस का हो चला 
    और देखते ही देखते 
    बचपन का आनंद 
    खो चला। 
    वह बागों में जाकर 
    खेलना भी लुप्त हुआ 
    वह गुल्ली और डंडा भी 
    ना जाने कहां गुप्त हुआ?
    घीस्सू,मुन्ना और राजू 
    अब वहां रहे ही नहीं 
    चुपके से कहां चले गए?
    किसी से कहें ही नहीं। 
    आम के पेड़ पुराने भी 
    नहीं कहीं अब दिखे 
    हम सखा मिलजुलकर 
    फल जिसके कभी थे चखे। 
    बागों में वह भरा कोलाहल 
    ना जाने कहां चला गया?
    किसकी न जाने आह लगी?
    किससे न जाने छला गया?
    भूल सकता है कैसे कोई 
    सूर काका को?
    उनके कहानियों के जिन
    और उनके आका को। 
    चिड़ियों का मधुर कलरव 
    अब सुनाई नहीं देती 
    एक तितली दूर-दूर तक
    दिखाई नहीं देती।
    आज भी वह बूढ़ा पीपल 
    अपने ही जगह खड़ा है 
    पर उसके नीचे
    वह हंसते छोटे-छोटे बच्चे कहां है?
    खेत खलिहान ही हर पल
    ठिकाना होता था 
    गाय-भैंसों को तो चराना
    एक बहाना होता था।
    कितना सुंदर और अच्छा 
    था मेरा वह गांव 
    छाई रहती थी जहां 
    बस अमिया की मीठी छाव।
    इतना बदलाव 
    मेरे गांव का हुआ कैसे?
    परिवर्तन का यह बीज 
    इतनी जल्दी! बुआ कैसी?
    MUKESH KUMAR SONI
    NET Qualified in Yoga
    M.A. in Yoga,M.A. in Hindi,
    Post Graduate in Yoga and Naturopathy
    M-9836783469,9088102430
    3 min
  • अबला नारी
    सोई है सड़क पर
    एक नारी बेहाल।
    दे रही छाया उसे है
    एक आम की डाल।
    इधर-उधर बिखरे हैं उसके
    जाने क्यों सारे बाल?
    खुदरी है कहीं कहीं
    उसकी श्यामल छाल।
    पांव में दिखता है पायल
    पर कहां है उसमें ताल?
    थोड़ा पास ही पड़ा है
    उसका छोटा टूटा थाल।
    पास ही उसके बिलख रहा है
    उसका प्यारा लाल।
    स्तन से सटी है
    जिसकी कोमल गाल।
    क्या दशा है नारी की
    हाय कैसा है काल।
    कौन है दोषी इसका
    किसकी है यह चाल?
    देखो-देखो यही तो है
    अबला नारी की  हाल। 
    MUKESH KUMAR SONI
    NET Qualified in Yoga
    M.A. in Yoga,M.A. in Hindi,
    Post Graduate in Yoga and Naturopathy
    M-9836783469,9088102430
    2 min
  • वह आदमी था
    दूर-दूर कितना भी देखा,
     जो दिखा वह आदमी था।
     ढूंढ कर मुझको मिला जो,
    वह भी मुझसा आदमी था।
    जाता मैं आखिर कहां,
    हर जगह तो आदमी था।
    कुछ पल रहा साथ जिसकेे,
    वह तो सहमा आदमी था।
    मुझको दिया जो ख्वाब सुंदर,
    एक सजीला आदमी था।
    तोड़ा जो ख्वाबों को मेरे,
    संघ दिल वह आदमी था।
    दे दिया मुझको सहारा,
    वह रहम दिल आदमी था।
    राह को खंदक किया जो,
    बेरहम वह आदमी था।
    बात मेरी अच्छी लगी तो
    हंस दिया वह आदमी था।
    जब भी मैं प्रतिकूल बोला,
    तिल मिलाया आदमी था।
    मिल गया था साथ जिसका,
    वह तो प्यारा आदमी था।
    छोड़कर तन्हा किया जो,
    बेवफा वह आदमी था।
    MUKESH KUMAR SONI
    NET Qualified in Yoga
    M.A. in Yoga,M.A. in Hindi,
    Post Graduate in Yoga and Naturopathy
    M-9836783469,9088102430.
    2 min

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