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पू स्वामिनि अमितानन्दजी एक सुन्दर प्रेरक कहानी सुना रही हैं जहाँ एक राजा जो की अपने कार्य में बहुत अच्छा था लेकिन साथ साथ वो काना भी था। उसे अपनी एक ऐसी तस्वीर बनवाने की इच्छा हुई जो वो अपने महान पूर्वजों के चित्रों की गैलरी में टांग सके। अनेकों चित्रकार आये लेकिन ज़्यदातर सब सोचने लगे की काने राजा के चित्र में तो कानापना तो दिखाना ही पड़ेगा तो अच्छा चित्र कैसे बनायें ? लेकिन फिर भी एक ऐसा चित्रकार आया जिसने अपने चित्रकारी से काने राजा का ऐसा चित्र बनाया जहाँ पर दोष दोष ही नहीं रहा और शेष अच्छे उभर के आ गयी। कैसा था वह चित्र - इस कहानी में सुने।
एक गांव के पास एक महात्माजी रहा करते थे। उनका स्वभाव बहुत ही शांत और सरल था। उनको क्रोध भी कभी नहीं आता था। एक बार कुछ दुष्ट स्वभाव के व्यक्तियों ने सोचा की चलो कुछ ऐसा किया जाए जिससे इन महात्माजी को क्रोध आ जाये और उनके सम्मान में कमी आ जाये। वे सब एक बार उनकी कुटिआ में गए और उन पर अनेकों निराधार आरोप लगाने लगे, लेकिन महात्माजी शांत रहे और उनकी बातों की उपेक्षा करते हुए उनका आतिथ्य भी करते नज़र आये। उनके व्यवहार से वे सब अत्यंत प्रभावित हुए और उनके ज्ञान और स्वभाव से शिक्षा और प्रेरणा प्राप्त कर अपने-अपने घर वापस गए।
सोक्रेटस नाम के ग्रीस के एक बहुत महान दार्शनिक थे, वे बहुत कुरूप थे। एक बार वे अपने कमरे में बैठ कर आईने में अपना चेहरा देख रहे थे, तभी एक शिष्य कमरे में आया और अपने गुरु को आईने में अपना चेहरा देखते हुए देखा। वो कुछ बोलो तो नहीं लेकिन कुछ मुस्कराने अवश्य लगा, किसे सोक्रेटस ने देख लिया। उन्होंने समझाते हुए उससे कहा की तुम सोच रहे होंगे की हम अपना चेहरा शीशे में क्यों देख रहे हैं। हमें पता ही की हमारा चेहरा कुछ कुरूप है, लेकिन हम तब भी अपना चेहरा शीशे में प्रतिदिन अवश्य देखते हैं, और अपने मन में यह संकल्प लाते हैं की हमें जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे हमारे चेहरे की कुरूपता गौण हो जाये। शिष्य को अपने गुरु के विचार बहुत अच्छे लगे, और वो पूछता है की गुरूजी 'फिर तो सुन्दर चेहरे वालों को अपना चेहरा नहीं देखना चाहिए', तब उन्होंने आगे उसको एक और सकारात्मक दृष्टी प्रदान करी। यह सब आप इस सूंदर सी प्रेरक कथा में पू स्वामिनी समतानंदजी से सुनिए।
एक बार एक ट्रेन में एक महात्माजी यात्रा कर रहे थे। उनके पास में ही एक और सज्जन बैठे थे। स्वामीजी को देख कर उन सज्जन में आदर के साथ उनसे कुछ चर्चा प्रारम्भ करी और अन्योन्य परिचय के बाद उन्होंने आजकल के युवाओं के बारे में उनके विचार जानने चाहे। महाराज जी ने कहा की हमें कोई समस्या नहीं दिखती है - सब अच्छा है। तब उस व्यक्ति ने कहा की हमें तो लगता है की आजकल के युवा बहुत स्वछन्द हो गए हैं, बहुत मनमर्जी करते हैं, बड़ों की आज्ञा नहीं मानते हैं, और फिर उन्होंने अपने ही लड़के के बारे में बताया की वो कुछ ऐसा ही हो गया है। हम क्या करें? कुछ समय तक तो उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया, फिर जब उस व्यक्ति ने अपना पान-का-मसाला निकला तो उसको निमित्त बनाकर महाराज जी ने जो कहा तब उस व्यक्ति को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया। उन्होंने क्या बताया यह आप इस सुन्दर प्रेरक कहानी में पू स्वामिनी अमितानन्द जी से सुने।
एक बार एक व्यक्ति श्री रामानुजाचार्य जी के पास गया और उनसे निवेदन किया की प्रभु हमें अपना शिष्य बना लीजिये। आचार्यश्री ने पूछा की पहले यह बताओ की तुमने जीवन में किसी से प्रेम किया है? उसने बोला - नहीं महाराज, हमने किसी भी सांसारिक सम्बन्ध से प्रेम नहीं किया है, हम तो परमात्मा से ही प्रेम करना चाहते हैं। महाराज जी ने उसको अपना शिष्य बनाने से मन कर दिया। क्यों? यह इस सुन्दर सी प्रेरक कहानी में आप पू स्वामिनी पूर्णानन्द जी से सुनिए।
एक चाभी वाले की दुकान में एक हथौड़ा था और बहुत सारी चाभियाँ। एक बार हथोड़े ने एक छोटी से चाभी से पूछा की 'बहन तुम इतने से जिद्दी से ताले को कैसे इतनी आसानी से खोल देती हो जबकि हमें तो बहुत सरे प्रहार करने पड़ते हैं '। तो चाभी ने कहा की तुम्हारे प्रहारों से ताला खुलता नहीं टूट जाता है, लेकिन हम ताला तोड़ते नहीं हैं बल्कि उसके अन्दर उसके हृदय में प्रवेश करते हैं और जब उससे निवेदन करते हैं तो वो स्वतः खुल जाता है।
ऐसा कौन सा कुआँ है जो इतना गहरा है की उसमे से कोई निकल नहीं सकता? राजा ने आदेश दिया की ऐसा कुआ शीघ्र खोजो नहीं तो दंड मिलेगा। राज पंडित खूमते-फिरते जंगल गया और वहां उसे एक गडरिया मिला जिसने जिज्ञासा प्रगट करी कि आप कि क्या समस्या है, तो उन्होंने उसे बताया। फिर गडरिया ने क्या बताया की उस राजपुरोहित को अपना उत्तर मिल गया - वो सब आप इस सुन्दर सी प्रेरक कहानी में पू स्वामिनी अमितानन्द जी से सुनिए।
एक गांव में एक महात्मा जी आये थे और वे अपने सत्संग में कह रहे थे भगवान् ही असली कर्ता-धर्ता हैं वे ही जगत के पालनहार है। उनकी ही कृपा से हम सब खाते-पीते हैं। बगैर उनकी इच्छा के एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। वहीँ पर एक नास्तिक इंसान भी बैठा था। उसने बोलै की महाराज आपकी इन बातों पर हमें विश्वास नहीं होता है। हम सब तो खुद कमाते और खाते हैं - इसमें भगवान् कहाँ से आ गए ? अगर हम नहीं खायेंगें तो क्या भगवान् हमें खिलायेंगें ? हम आपकी इस बात की खुद परीक्षा करना चाहेंगे। उसने अगले ही दिन अपनी तरफ से कुछ नहीं खाने की ठान ली और मन ही मन भगवान् को चुनौती दी की आज हम देखते हैं की आप हमें कैसे खाना खिलाते हैं। फिर क्या हुआ और अंततः उसको भगवान् ने कैसे खाना खिलाया = यह सब आप इस शिक्षाप्रद कहानी में पू स्वामिनी पूर्णानन्दजी से सुने।
एक बार श्री आदि शंकराचार्य जी अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे तब उन्होंने देखा की एक आदमी एक गाय को रस्सी में बंधे खींचते हुए ले जा रहा था। तब उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा की बताओ इन दोनों में स्वामी कौन है? क्या गाय बंधी है या व्यक्ति ? तब शिष्यों ने बिना हिचक के बोले की - व्यक्ति स्वामी है और गाय बंधी है। तब आचार्य ने गाय के गले से रस्सी खोल दी, और गाय भागने लगी और उसका मालिक इस घटना क्रम से स्तब्ध होकर गाय के पीछे उसको पकड़ने के लिए भागने लगा। तब आचार्य ने वो ही प्रश्न फिर से पूछा - अब बताओ की कौन किससे बंधा है? तब आचार्यश्री ने अपने शिष्यों को समझाया की वास्तविक बंधन स्थूल नहीं मानसिक होता है। कई बार हमें बहार से किसी ने नहीं पकड़ा है तब भी हम बंधे होते हैं।
एक राजा अपने राज्य में वेश बदल कर रात को खुद घूमते हुए राज्य की स्थिति पर नज़र रखा करता था। एक बार उनसे रात को कुछ अज्ञात लोगों को शहर में घूमते हुए देखा। चोरों ने भी उसे देखा और पूछा की तुम कौन हो ? राजा ने कहा की हमें अपना ही भाई समझो। तब चोरों ने कहा - चलो बहुत अच्छा, तुम भी हमारे साथ चलो, हम सब मिलकर यहाँ के राजा के घर चोरी करने चलते हैं। तुम हमें रास्ता बताओ, हमें जो भी मिलेगा हम सब मिलकर बाट लेंगे। तो राजा चल पड़ा, अपने ही महल में चोरों को लेकर। बाद में क्या हुआ - ये सब आप इस रुचिकर और सुन्दर कहानी में पू स्वामिनी अमितानन्द जी से सुनिए।
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