सोक्रेटस नाम के ग्रीस के एक बहुत महान दार्शनिक थे, वे बहुत कुरूप थे। एक बार वे अपने कमरे में बैठ कर आईने में अपना चेहरा देख रहे थे, तभी एक शिष्य कमरे में आया और अपने गुरु को आईने में अपना चेहरा देखते हुए देखा। वो कुछ बोलो तो नहीं लेकिन कुछ मुस्कराने अवश्य लगा, किसे सोक्रेटस ने देख लिया। उन्होंने समझाते हुए उससे कहा की तुम सोच रहे होंगे की हम अपना चेहरा शीशे में क्यों देख रहे हैं। हमें पता ही की हमारा चेहरा कुछ कुरूप है, लेकिन हम तब भी अपना चेहरा शीशे में प्रतिदिन अवश्य देखते हैं, और अपने मन में यह संकल्प लाते हैं की हमें जीवन में ऐसे कर्म करने चाहिए जिससे हमारे चेहरे की कुरूपता गौण हो जाये। शिष्य को अपने गुरु के विचार बहुत अच्छे लगे, और वो पूछता है की गुरूजी 'फिर तो सुन्दर चेहरे वालों को अपना चेहरा नहीं देखना चाहिए', तब उन्होंने आगे उसको एक और सकारात्मक दृष्टी प्रदान करी। यह सब आप इस सूंदर सी प्रेरक कथा में पू स्वामिनी समतानंदजी से सुनिए।